जाने अनजाने
कई सपने
हमारे इर्द-गिर्द
मँडराने लगते हैं
कुछ सपने
जो हमारी पहुँच में होते हैं
उन्हें पूरा करने के लिए
हम जी जान लगा देते हैं
पर जरूरी तो नहीं
सब कुछ
प्राप्य की ही श्रेणी में हो
अथक प्रयासों के बावजूद
कुछ सपने पूरे होने के
आसार नजर नहीं आते|
लोमड़ी जानती थी
वह अंगूर नहीं पा सकती
तो उसने कह दिया
अंगूर खट्टे हैं
नर्तकी जानती थी
वह अच्छा नाच नहीं सकती
उसने आँगन को ही टेढ़ा कहकर
राहत की साँस ली
तो दो जुमले बने
“अंगूर
खट्टे हैं”
“नाच न
जाने आँगन टेढ़ा”
इनका प्रयोग हम
किसी का मखौल उड़ाने के लिए ही करते हैं
अब इस तरह से सोचते हैं
परिश्रम किया
फल मिला तो ठीक है
सफल न हुए
तो अंगूर को खट्टा, या
आँगन को टेढ़ा कहने में
हर्ज़ ही क्या है
यह कहकर हम
इस अपराधबोध से
मुक्ति तो पा सकते हैं
कि हम इस काबिल ही नहीं कि
अपने सपने पूरे कर सकें
दार्शनिकता का यह निराला अंदाज
हमें कभी निराश नहीं होने देगा|
ऋता शेखर “मधु”
