शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

कैसा मिला है साथ

कैसा मिला है साथ

शीतल उष्ण मिल गए
जैसे तुम और हम
चक्र घूम कर बता रहा
कभी खुशी या गम
जो पिघला वह ठोस हुआ
जीवन अनबुझ राज
पतझर की लीला बड़ी
बजा बसन्त का साज
सूर्य बिना वह कुछ नहीं
चँदा का मन जान रहा
कहाँ तपन घट जाएगी
सूरज को भी भान रहा
एक दूजे बिन हैं अधूरे
पर मिलन की राह नहीं
अवनी अम्बर को देखो
क्षितिज की है थाह नहीं
विभा दिनकर मिलें कहाँ
सन्ध्या ने यह तय किया
आस निराश के मध्य जमी
आस्था ने सब कुछ जय किया
प्रीत मीत की हुई शाश्वत
बिना मिले दो तृप्त हुए
राधा कान्हा दूर दूर
प्रेम रूप संक्षिप्त हुए
कैसा मिला है साथ
मिले, पर हुए न पूरे
बना रहा अहसास
एक दूजे बिन हैं अधूरे
-ऋता शेखर 'मधु'




सभी बहनों सखियों को करवा चौथ की मंगलकामनाएं!! 🌹🌹🌝🌹🌹

बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

अस्तित्व

"अस्तित्व"
दिल की धड़कन बन्द होती सी महसूस हो रही थी। मैंने झटपट मशीन निकाली और कलाई पर लगाया। नब्ज रेट वाकई कम था।
"ओह, क्या तुम मुझे कुछ दिनों की मोहलत दे सकती हो प्रिय", मैंने डूबते स्वर में उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।
"तुम्हारे पास समय की कमी नहीं थी। पर अब ऐसा क्या है जो तुम करना चाहती हो।" उसने मेरा हाथ छुड़ाते हुए कहा।
"मैं पन्नों को समेट रही हूँ। कुछ बाकी हैं जो अंत में लगाने हैं। बस उतना वक्त दे दो मुझे।मैं अपने भाव संसार को देना चाहती हूँ," निवेदन का भाव आ गया था मेरी आवाज़ में।
"प्रिय सहगामिनी, आज तुम्हारी आयु पूरी हो रही। बस इच्छाशक्ति ही हम दोनों को साथ रख सकती है। वादा करो अब समय गंवाए बिना अपना कार्य पूरा करोगी।"
"वादा करती हूँ, वादा करती हूँ..." चीखते हुए कहा मैंने।
"तब लो, मैं पुनः तुम्हारे शरीर में समाहित हो रही"
मुझे लगा कि धड़कन अब सामान्य हो रही थी।
उफ्फ़...बिना आत्मा के हमारा सांसारिक अस्तित्व कुछ नहीं। अब अपने अस्तित्व को पन्नो पर शीघ्र ही समेटना होगा।
--ऋता

बुधवार, 18 सितंबर 2019

मेरा हिन्दुस्तान, जग में बहुत महान है - सोरठे


सोरठे - हिन्दी पखवारा विशेष छंद

मेरा हिन्दुस्तान, जग में बहुत महान है।
हिन्दी इसकी जान, मिठास ही पहचान है।।

व्यक्त हुए हैं भाव, देवनागरी में मधुर।
होता खास जुड़ाव, कविता जब सज कर मिली।।

कोमलता से पूर्ण, अपनी हिन्दी है भली।
छोटे बड़े अपूर्ण, ऐसे तो न भेद करे।।

होता है व्यायाम, मूर्धा तालू कण्ठ का।
लेती क्ष त्र ज्ञ से काम, द्वि एकल जब साथ हुए।।

जब भी लगे हलन्त, व्यंजन स्वर से हो अलग।
जुटकर वर्णों के अंत, नवल वर्ण की नींव रखे।।

अपनी भाषा छोड़, क्यों इत उत दोलन करे।
जनमानस को जोड़, सद्भावों के पथ रचो।।

आत्मसात हो नित्य, वर्तनी शुद्धता से बढ़े।
हिन्दी का साहित्य, नित नए सोपान गढ़े।।

-- ऋता शेखर 'मधु'

सोमवार, 9 सितंबर 2019

लगता नया नया हर पल है

गीत
जाना जीवन पथ पर चलकर
लगता नया नया हर पल है

धरती पर आँखें जब खोलीं
नया लगा माँ का आलिंगन
नयी हवा में नयी धूप में
नये नये रिश्तों का बंधन

शुभ्र गगन में श्वेत चन्द्रमा
लगता बालक सा निश्छल है

नया लगा फूलों का खिलना
लगा नया उनका झर जाना
मौसम की आवाजाही में
फिर से बगिया का भर जाना

आम्रकुंज की खुशबू पाकर
बढ़ती कोयल में हलचल है
लगा नया लहरों का आना
आकर फिर से वापस जाना

नए नए सीपों को चुनकर
गहराई की थाह लगाना
करे नहीं परवाह पंक की
खिलता नया नया शतदल है

है नवीन लेखन की बातें
नया सफर नयी मुलाकातें
हर दिन का सूरज नया नया
नया स्वप्न ले आतीं रातें

नए इरादे नयी समस्या
नया ढूँढता कोई हल है

ऋता शेखर म
धु

रविवार, 1 सितंबर 2019

तुझको नमन

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सबको राह दिखाने वाले
हे सूर्य! तुझको नमन

नित्य भोर नारंगी धार
आसमान पर छा जाते
खग मृग दृग को सोहे
ऐसा रूप दिखा जाते
आरती मन्त्र ध्वनि गूँजे
तम का हो जाता शमन

हर मौसम की बात अलग
शरद शीतल और जेठ प्रचंड
भिन्न भिन्न हैं ताप तुम्हारे
पर सृष्टि में रहे अखंड
उज्ज्वलता के घेरे में
निराशा का होता दमन

जितना वेग तपन का धरते
उतना ही नीरद भर देते
बूँदों में वापस आकर के
तन मन की ऊष्मा हर लेते
साँझ ढले पर्वत के पीछे
शनै शनै करते गमन
हे सूर्य! तुझको नमन !

ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 31 अगस्त 2019

सोरठे

सोरठे

स्वप्न हुए साकार, जब कर्म की राह चले।
गंगा आईं द्वार, उनको भागीरथ मिले ।।1

नारी का शृंगार, बिन्दी पायल चूड़ियाँ।
पहन स्वप्न का हार, नभ मुठ्ठी में भर चलीं।।2

नन्हें नन्हें ख़्वाब, नन्हों के मन में खिले।
बोझिल हुए किताब, ज्यों ज्यों वे वजनी हुए।।3

लिए हाथ में हाथ, पथिक चले चुपचाप दो।
मिला बड़ों का साथ, स्वप्न सभी पूरे हुए।।4

धूप छाँव का सार, शनै शनै मिलता गया।
सपनों का संसार, मन बगिया में जा बसा।।5

सपनों में अवरोध, पैदा जब कर दे जगत।
हटा हृदय से क्रोध, चले चलो निज राह पर।6

पाना हो सुख चैन, समय प्रबंधन कीजिये।
शयन काल है रैन, दिन में व्यर्थ न लीजिये।।7

लिख लिख प्रभु के गीत, हर्षित होती लेखनी।
कर कान्हा से प्रीत, अक्षर अक्षर जी उठे।।8

धन दौलत को जोड़, जाने क्या सुख पा रहे।
जाना है तन छोड़, याद इसे रखना पथिक।।9

झुके झुके से नैन, जाने कितना कुछ कहे।
झूठ करे बेचैन, या प्रीत के गीत गहे।।10

परम् सत्य है सत्व, जीवन जीने के लिए।
उन्हें मिले देवत्व, करुण भाव में जो बहे।।11
--ऋता शेखर' मधु'

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

धुँधली आँख-लघुकथा

धुँधली आँख

चारो तरफ ॐ कृष्णाय नमः की भक्तिमय धूम मची हुई थी। देवलोक में बैठे कृष्ण इस कोशिश में लगे थे कि किसी की पुकार अनसुनी न रह जाये। कृष्ण के बगल में बैठे सुदामा मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
" रहस्यमयी मुस्कान तो हमारे अधरों पर विराजमान रहती है मित्र, आज आपने क्यों यह मुस्कान धारण किया है?"
"कुछ नहीं मित्र, आज मेरा मन हो रहा कि मैं भी धरती पर जाऊँ और आपकी महिमा देखूँ।"


" तो देर किस बात की प्रिय सुदामा, चलिये"

धरती पर पहुँचकर कृष्ण , कृष्ण ही बने रहे किन्तु सुदामा ने खुद का अवतरण इस प्रकार किया कि वे जहाँ जायें, उस घर के मालिक के दोस्त के रूप में दिखें।

धरती शंखध्वनि से गुंजायमान थी। दीपकों ने अपनी लौ स्थिर रखा था क्योंकि दीये में घी प्रचूर मात्रा में था।कृष्ण के बालरूप की सज्जा का तो कहना ही क्या था।कृष्ण-राधा का भी अद्भुत श्रृंगार था। कृष्ण के भोग की जितनी गिनती की जाए वह कम ही होनी थी।

कृष्ण सुदामा एक घर के सामने रुक गए। कृष्ण को भी मसखरी सूझी। उन्होंने बालक का रूप धारण कर लिया।

"कोई है, कोई है" सुदामा ने आवाज लगाई।

अन्दर से गृहस्वामी निकले जिनकी रईसी उनकी साजसज्जा बता रही थी।

"क्या है, क्यों आवाज लगा रहे हो। कान्हा की आरती का समय हो गया है भाई, अभी वापस जाओ।"

"मेरा बच्चा कई दिनों से भूखा है, कुछ खाने को दीजिये।" खुले दरवाजे से माखन, दही की हांडी देखते हुए सुदामा ने कहा।

"अभी क्या दूँ, सब कुछ भोग में चढ़ा हुआ है"

"मित्र, मैं राघव हूँ, मैं तो तुम्हें देखते ही पहचान लिया था।मैं चाहता था कि तुम मुझे स्वयं पहचानो। अभी मेरी माली हालत ठीक नहीं, बच्चा भूखा है।" सुदामा ने विनीत भाव से कहा।

गृहस्वामी की आंखों में क्षण भर की पहचान उभरी।
" पर मैं नहीं पहचान पा रहा। क्या मेरे वैभव से आकर्षित होकर आए हो।"

"नहीं,धरती पर शोर मचा है कि कृष्ण भाव के भूखे हैं। हम अपनी वही भूख मिटाने आये थे।" कृष्ण सुदामा ने असली रूप धारण कर गृहस्वामी को अचंभित कर दिया।

"मित्र कृष्ण, जो भी आपके नाम की टेर लगा रहे उनमें कितनों ने आपके सद्गुणों को अपनाया है, बस यही दिखाना था। जो जीते जागते बाल गोपाल को धुँधली आँखों से देख रहे वे आपका अनुकरण कैसे कर पाएँगे।"

रहस्यमयी मुस्कान अब भी सुदामा के अधरों पर थिरक रही थी।

--ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

अपनी अपनी नौकरी-लघुकथा



अपनी अपनी नौकरी

सरकार की ओर से जमींदारी प्रथा खत्म हो चुकी थी।फिर भी लोकेश बाबू जमींदार साहब ही कहलाते थे।उनके सात बेटे शहर में रहकर पढ़ाई करते और लोकेश बाबू मीलों तक फैले खेत की देखरेख और व्यवस्था में लगे रहते। धीरे धीरे सातों बेटे ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और पदाधिकारी बनते गए। लोकेश बाबू को यह चिंता सताने लगी कि गाँव के जमीन जायदाद की देखभाल कौन करेगा। सब शहर में रहकर नौकरी करना चाहते थे।एक बार उन्होंने यही बात सभी बेटों के सामने रखी।उनमें एक बेटा गाँव में रहकर देखभाल के लिए तैयार हो गया। जब वे जीवित थे तो सभी बेटों को पैदावार का कुछ हिस्सा भेज दिया करते थे। जमींदार साहब को गए पाँच वर्ष बीत चुके थे।अब किसी को कुछ भी नहीं भेजा जाता था।

आज अचानक छोटे भाई उमेश को देख गाँव वाले भाई सोमेश को बहुत खुशी हुई। दोनों भाई देर तक हरियाली भरे खेतों में घूमते रहे। घूमते घूमते उमेश ने दिल की बात बता ही दी।
"भैया, पिताजी के जाने के बाद हमलोगों को खेत का कुछ भी नहीं मिल रहा। लगता ही नहीं कि हम खेतिहर परिवार से हैं।"
"देखो बाबू, जैसे तुमलोग शहर में रहकर नौकरी करते हो तो मैं तो तुम्हारी नौकरी के पैसे से कुछ नहीं माँगता। खेती ही मेरी नौकरी है और पैदावार मेरी तनख्वाह। यदि तुम्हे पैदावार में हिस्सा चाहिए तो अभी इन बैलों को हल में जोतकर दिखा" । यह कहते हुए सोमेश ठठाकर हँस पड़ा।
"पिता जी की इच्छा का मान रखते हुए मैंने गाँव और खेती स्वीकार किया और तुमलोगों ने शहर और नौकरी। खेत की जमीन जब चाहे ले लेना। फिर उस पैदावार पर तुम्हारा हक होगा भाई मेरे"
उमेश मुस्कुरा दिया क्योंकि यही जवाब उसे शहर लौटकर बड़े भाइयों को देना था।
-अप्रकाशित
ऋता शेखर मधु

रविवार, 25 अगस्त 2019

छंद-सोरठा

सोरठा

हर पूजन के बाद, जलता है पावन हवन।
खुशबू से आबाद,खुशी बाँटता है पवन।।1

प्रातःकाल की वायु , ऊर्जा भर देती नई।
बढ़ जाती है आयु, मिट जाती है व्याधियाँ।।2

छाता जब जब मेह, श्यामवर्ण होता गगन।
भरकर अनगिन नेह, पवन उसे लेकर चला।।3

शीतल मंद समीर, तन को लगता है भला।
बढ़ी कौन सी पीर, विरहन के मन ही रही।।4

खत में लिखकर प्रेम,छोड़ गया खिड़की खुली।
सही नहीं है ब्लेम, उसे उड़ा ले जब हवा।।5

झूम उठी है डाल, हवा सहेली थी मिली।
देखो हुआ धमाल, पत्ते कुछ उड़ने लगे।।6

सुप्त हुई जब आग, छुपी हुई थी राख में।
सुना हवा का राग, धधक पड़ी वह जागकर।।7


पढ़े वेद जो चार, ज्ञानी माने यह जगत।
जिनमें भाव अपार, ईश उन्हें जाने भगत।8


जब बोते हैं फूल, खिलने से खुशबू खिले।
रोप रहे जो शूल, कैसे दिल से दिल मिले।।9

कर लालच का कर्म, अंतर्मन क्योंकर छले।
छोड़ नीति का धर्म, कहो मनु किस राह चले।10

पैसा हो या राम,जगत में दो भाव बड़े।
एक करे निष्काम,एक दिखावा में पड़े।।11
@ ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 21 जुलाई 2019

सबकी अपनी राम कहानी - गीत

सबकी अपनी राम कहानी
=================
जितने जन उतनी ही बानी
सबकी अपनी राम कहानी

ऊपर ऊपर हँसी खिली है
अंदर में मायूस गली है
किसको बोले कैसे बोले
अँखियों में अपनापन तोले
पाकर के बोली प्रेम भरी
आँखों में भर जाता पानी

मन का मौसम बड़ा निराला
पतझर में रहता मतवाला
दिखे चाँदनी कड़ी धूप में
झेले शूलों को पुष्प रूप में
जीत हार से परे हृदय में
भावों की है सतत रवानी

यही कोशिश हो कुछ न टूटे
आस बीज से कोंपल फूटे
भाव सरल हो जब निज मन का
सफ़र सुहाना हो जीवन का
जो सहता है वह पाता है
अनुभव की वह अकथ निशानी

सागर-घट की कथा पुरानी
बाहर पानी भीतर पानी
ज्यों ही टूटा ये घट तन का
मिलन हुआ ईश्वर से मन का
राधा कह लो मीरा कह लो
प्रीत गीत की हुईं दीवानी

जितने जन उतनी ही बानी
सबकी अपनी राम कहानी
--ऋता शेखर 'मधु'
20/06/19
श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्थी
वि0 सं0 २०७४

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

पत्र...किसके नाम?


फेसबुक पर एक समूह में पत्र लेखन प्रतियोगिता थी|

62 प्रविष्टियों में...अच्छे पत्रों में हमारे पत्र को भी रखा गया इसके लिए खुश हूँ 😊अब आप सब भी पढ़िए।

पुणे
29/06/2019
प्रिय रौशन,
सदा प्रसन्न रहो।
अपनी रौशनी को रौशन के रूप में स्वीकार करने में थोड़ा समय लगेगा। बड़े नाजों से तुम्हें पाला है रौशनी। जब तुमने जो चाहा, दिया। तुम मेरी बड़ी बेटी हो। हमारे यहाँ दो पीढ़ियों से लड़की का जन्म नहीं हुआ था। तुम्हारे जन्म पर तुम्हारे दादा लक्ष्मी के रूप में तुम्हें पाकर अति प्रसन्न थे और उन्होंने पूरे गाँव में लड्डू बँटवाए थे। दादी तो रोज नए फ्राक सिलकर पहनाती तुम्हें। जब तुम सात वर्ष की थी तो तुम्हें लड़कों वाले खेल पसन्द आते थे। गिल्ली डंडा और कंचे खेलने में तुम्हारी रुचि बढ़ने लगी थी। अब दादी के फ्राक तुम्हें पसन्द नहीं आते थे। तुम हमेशा पैंट शर्ट की ज़िद करने लगी थी। बाल भी छोटे कटवाए थे जिद करके। यह सब बातें सामान्य समझ कर हम निश्चिंत रहे। समय के साथ तुम बड़ी होती गयी और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहर चली गयी। पढ़ाई में अव्वल आती रही और कभी शिकायत का मौका नहीं दिया। तुम जब भी छुट्टियों में घर आती, अपनी प्रिय सहेली रूबी की ढेर सारी बातें करती। उसकी पसंद नापसन्द तुम्हारे लिए बहुत मायने रखती थी। हम इसे भी सामान्य समझ कर दो सहेलियों का प्रेम समझते रहे। एक बार तुम उसे लेकर घर आई तो तुम दोनों के व्यवहार से कुछ तो खटका था मन में, पर इसे वहम समझकर दिमाग से झटक दिया था। जब विवाह योग्य हुई तो मैंने लड़कों की लिस्ट तुम्हारे सामने रख दी। तुमने विवाह के प्रति अपनी अनिच्छा जताई। बहुत पूछने पर तुमने जो कहा, वह सुनकर मेरे और तुम्हारी मम्मी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
तुमने कहा था " मैं रूबी को जीवनसाथी बनाना चाहती हूँ, अब समलैंगिकों को साथ रहने का कानूनन अधिकार मिल गया है।" हम मूक रहकर सिर्फ तुम्हें देखते रहे। तुम बालिग और आत्मनिर्भर थी। अपना निर्णय लेने का अधिकार था तुम्हें, पर ये...। किसी भी चीज़ को किस्से कहानियों तक पढ़ना अलग बात होती है और खुद पर बीतना अलग।
लोग क्या कहेंगे...यह बात मन पर हावी होने लगी। दो दिनों के मानसिक उथलपुथल के बाद हमने इसे जैविक असमानता स्वीकार करते हुए समाज की परवाह छोड़ दी। तुम्हें डॉक्टर को दिखाया। अब फिर से भगवान ने एक अजूबे तथ्य से अवगत कराया। तुम्हारे शरीर में पुरुषों वाले अंग प्रत्यंग भी थे। कई जटिल प्रक्रियायों से गुजरते हुए आज तुम बेटा के रूप में सामने खड़ी हो। हम दामाद लाते, अब बहू लायेंगे।
रौशन, तुमने लड़की का जीवन भी जिया है।आशा है आगे उनके दर्द को भली भाँति समझ पाओगे।डॉक्टर ने कहा है कि ऐसे केस लाखों में एक होते हैं। समाज की परवाह न करना। हम तुम्हारे साथ हैं और रूबी को बहू के रूप में स्वीकार करते हैं । तुम दोनों की इज्जत पर कोई आँच नहीं आएगी।
हॉर्मोन्स की वजह से असामान्य लक्षण प्रकट होना ईश्वर प्रदत्त है बेटा, उनकी हँसी उड़ाने वालों को नासमझ समझ कर माफ़ कर देना।
बहुत प्यार
तुम्हारा पापा
...............
************
स्वरचित, अप्रकाशित, अप्रसारित
ऋता शेखर 'मधु'
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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

जिन काँधों पर चढ़कर झूले-ललित छंद


विधा- ललित छंद (सार छंद)...
16-12 पर यति अंत में वाचिक भार 22,
कुल चार चरण, दो-दो चरण में तुकांत अनिवार्य है.

नेह-सिक्त निर्मल धारा से , मिलती कंचन काया |
अम्बर जैसा प्यार पिता का, शीतल माँ का साया ||
जाने कितने दुख सुख सहकर, तिनका तिनका जोड़े|
ऊँची शिक्षा की खातिर ही, निज सपनों को तोड़े ||

जिन काँधों पर चढ़कर झूले, चौंसठ में झुकते हैं |
एक सहारा पाने को वे, पग पग पर रुकते हैं ||
सन्नाटों के मौन तिमिर में, दो निरीह जगते हैं |
टिक-टिक के संग श्वास-ध्वनि मिल, साथी सा लगते हैं ||2||

तन निःशक्त हुआ है जबसे, झेल रही लाचारी |
दूरभाष भी दूर पड़ा है, ले कैसे बेचारी ||
दवा मिली आहार नदारद, वह कैसे जीएगी |
डॉलर की अनकही कहानी, घूँट घूँट पीएगी ||3||


यूँ  देखो तो यह दुनिया बस, लगता है इक मेला |
पर जिनको तुम छोड़ गए हो, वह तो पड़ा अकेला ||
अनियंत्रित जीवन रेखा का, अनियंत्रण है जारी |
साहब बनकर घूम रहे हो, माँ बिस्तर पर हारी ||4||

आखें मूँद रही थी जब वह, तुम्हें कहाँ पाती थी |
चढ़कर दूजों के कंधों पर, मंजिल को जाती थी ||
मस्त रहो और स्वस्थ रहो तुम, आशिष देकर गाती|
यादों में जाकर जब लौटी, तर्पण अश्रु का लाती ||5||

तुम जग जीत चले थे लेकिन, जीते ना अपनो को |
गाँव द्वार को ठोकर मारे, लेकर निज सपनों को ||
छोड़ तिरंगा बने विदेशी, देश हुआ बेगाना |
अपने अपनो की खातिर तुम, लौट यहाँ फिर आना ||6||

----ऋता शेखर ‘मधु’

ग्रीष्म

ग्रीष्म ऋतु
============
ग्रीष्म की दुपहरिया
कोयल की कूक से
टूट गयी काँच सी

छत पर के पँखे
सर्र सर्र नाच रहे
हाथों में प्रेमचंद
नैंनों से बाँच रहे

निर्मला की हिचकियाँ
दिल में हैं खाँच सी

कोलतार पर खड़े
झुंड हैं मजूरों के
द्वार पर नाच रहे
बानर जमूरों के

लू की बड़ी तपन
खस में है आँच सी

चंदन की खुश्बू सा
खत भी है पास में
आएगा जवाब एक
प्रेम भी है आस में

विचारों की आँधियाँ
परख रहीं जाँच सी

गपशप की इमरती
ठहाकों में छन रही
आम की फाँकों पर
मेथी मगन रही

जीभ की ग्रंथियाँ
चटपटी कुलाँच सी

-ऋता शेखर ‘मधु’

रविवार, 30 जून 2019

जिन्दगी को सार देना-गीतिका

मनोरम छंद
मापनी-2122.2122
***************************
गीतिका
पदांत - देना
समांत- आर
***************************
जिन्दगी को सार देना
नेह को विस्तार देना

फूल की चाहत सभी को
शूल को भी प्यार देना

राह में फिसलन बहुत है
चाल को आधार देना

स्वप्न होते अनगढ़े से
कर्म से आकार देना

बोल मीठे भाव निश्छल
जाँचकर उद्गार देना

पेड़ पौधे हैं धरोहर
प्रेम से उपहार देना

जो करे कर्तव्य अपना
बिनकहे अधिकार देना

स्वरचित, अप्रकाशित
--ऋता शेखर 'मधु'

इस छंद के लिए मुझे फेसबुक समूह 'मुक्तक लोक' से सम्मान पत्र मिला है|

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सोमवार, 24 जून 2019

नलिन की वापसी - कहानी

नलिन की वापसी
   सुपर फ़ास्ट ट्रेन तीव्र गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ती जा रही थी| जनरल डब्बे की निचली बर्थ पर खिड़की के पास बैठी सुमेधा पवन के शीतल झोंकों का आनन्द ले रही थी| मन के भीतर की खुशियाँ चेहरे पर झलक रही थीं, कभी एक उदासी भी झलक जा रही थी| वह अपने प्यारे बेटे के साथ बनारस जा रही थी | बेटे नलिन ने बारहवीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी और साथ साथ आईआईटी भी निकाला था उसने| आगे की शिक्षा के लिए शिव के त्रिशूल पर टिकी नगरी वाराणसी में बीएचयू में दाखिला मिला था| वह उसे हॉस्टल छोड़ने जा रही थी| उसके बगल में बैठा नलिन चेतन भगट का नॉवेल ‘थ्री इडियट्स’ पढ़ने में तल्लीन था| उपन्यास पढ़ते हुए कभी उसके चेहरे पर मुस्कान भी आ जाती| सुमेधा ने यूँ ही पूछ लिया,”इस कहानी में क्या है नलिन?”

“तीन इडियट्स की कहानी जिन्होंने आईआईटी कॉलेज में नामांकन कराया है|”

“हा हा हा, आईआईटी वाले इडियट्स... अच्छा, तब तो तुम्हें मजा आ रहा होगा,”मुस्कुराती हुई सुमेधा पुनः बाहर के नजारे देखने लगी| ट्रेन की रफ़तार धीरे धीरे कम होने लगी थी| अगला स्टेशन शायद मुगलसराय था, जो अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन के नाम से जाना जाता है|

ट्रेन के रुकते ही कई यात्री उतर गए, कई चढ़े भी| साथ ही फल वाले, स्नैक्स वाले, पेपर सोप, ताला-चाबी वाले, चिनिया बादाम वाले भी चढ़ गए| शोर से पूरा डब्बा भर गया | चाय कॉफी की बिक्री दनादन होने लगी| सुमेधा और नलिन को इन सब चीज़ों से कोई मतलब नहीं था| नलिन अपने उपन्यास में उलझा रहा और सुमेधा स्टेशन के दृष्य देखने में लगी रही|

“मे आई सिट हियर...May I sit here,” फिरंगी टोन में पूछी गई इस बात से सुमेधा ने सामने देखा| एक गोरा चिट्ठा साधु सामने खड़ा था| एक नजर में ही सुमेधा ने उसके पूरे व्यक्तित्व का जायजा ले लिया| गेड़ुआ वस्त्र धारण किए हुए साधु में कहीं से भी भारतीय रूपरेखा की झलक नहीं थी सिवाय उस झोले के, जिसे उसने कंधे पर लटका रखा था|

“मे आई सिट हियर...क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”, इस बार वह सुमेधा की आँखों में आँखें डालकर पूछ रहा था|

“यस, ऑफ़ कोर्स...हाँ हाँ क्यों नहीं”, सुमेधा ने अपने पलथी लगाए पैरों को नीचे रखते हुए कहा|

वह सुमेधा के बगल में बैठ गया| तब तक नलिन ने एक उड़ती निगाह उस साधु पर डाली | उसके बाद वह फिर से अपने उपन्यास में डूब गया| सुमेधा भी बाहर देख रही थी| ट्रेन में अजनबियों से बातें करने का उसे कोई शौक नहीं था|

“इज़ ही योर सन ?”, नलिन को देखते हुए उसने सुमेधा से पूछा|

“यस..हाँ”, कहते हुए सुमेधा की नजर नलिन से मिली|

“व्हाट इज़ योर नेम यंग बॉय”, उसने नलिन से पूछा|

“नलिन, हिज़ नेम इज़ नलिन....कैन यू अंडरस्टैंड हिन्दी?”, नलिन के बजाय सुमेधा ने जवाब देने के साथ ही सवाल भी ठोक दिया| वह नहीं चाहती थी कि वह फिर से नलिन से कोई सवाल करे|

“हाँ, मैं हिन्दी समझता हूँ और बोल भी लेता हूँ|” मुस्कुराते हुए उसने कहा|

“ओके”, कहकर सुमेधा फिर से बाहर देखने लगी|

“नलिन का क्या अर्थ होता है”, वह चाहता कि बातचीत का सिलसिला कायम रहे|

“लोटस...कमल” सुमेधा को बोलना पड़ा क्योंकि यह बताने में कोई हर्ज़ नहीं था|

“वाउ, गुड नेम| लगता है आपलोग भी वाराणसी जा रहे| वहाँ पढ़ते हो क्या नलिन?”

नलिन ने उपन्यास पर से आखें उठाई,”हाँ”, कहकर फिर पढ़ने लगा|

“मैं फिलिपिन्स से आया हूँ,”यह कहकर वह क्षणभर को चुप रहा|

“तो मैं क्या करूँ”, सोचते हुए सुमेधा ने यह दिखाया जैसे उसे उसकी बातों में कोई दिलचस्पी न हो|

“मैंने श्रीमद्भागवद्गीता पढ़ी है| आई लाइक लॉर्ड कृष्णा| उन्होंने स्वयं के बारे में कहा है...ऋतुओं में मैं बसंत हूँ, वृक्षों में मैं बरगद हूँ और....” वह आगे कुछ कहता उसके पहले ही सुमेधा बोल पड़ी,”बरगद नहीं पीपल”

“ओह, सही कहा, भूल गया था मैं”, भूला था या जानबूझकर कर उसने गलत कहा, यह सुमेधा समझ नहीं सकी|

“अंकल, आपका नाम क्या है,” नलिन ने उपन्यास एक ओर रखते हुए पूछा|

“अंकल मत कहो, डैनियल कहो माय सन” कहते हुए उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई|

“हमारे भारत में बड़ों का नाम नहीं लेते अंकल”नलिन ने मुस्कुराते हुए कहा|

“ओ हो हो हो...”उसकी चालाक सी हँसी तैर गई|

“वैसे अंकल, डैनियल का अर्थ क्या होता है|”

“डैनियल मीन्स गॉड इज़ माय जज़, और जिसका न्याय स्वयं ईश्वर करें वह भी तो सच्चा न्यायकर्ता होगा न”, अपनी व्याख्या पर खुद ही मुग्ध होता हुआ वह बोल पड़ा|

सुमेधा ने नलिन की ओर देखकर आँखों ही आँखों मना किया कि वह आगे बात न करे| नलिन चुप बैठ गया|

किन्तु वह भी कहाँ मानने वाला था,”मुझे भारत के युवाओं मे बहुत ऊर्जा दिखती है| पढ़ाई हो या कोई भी क्षेत्र, हर जगह वे अपनी छाप छोड़ते हैं| मैं कई वर्षों से इसी समय भारत आता हूँ| मुझे अक्सर बीएचयू के विद्याथी मिलते हैं ट्रेन में|”

“मैं भी तो...”अचानक नलिन बोल पड़ा और जिस बात से सुमेधा डर रही थी वह हो गया|नलिन ने अनजाने में अपने कॉलेज का खुलासा कर दिया| उसने उस फिलिपियन साधु की ओर देखा| उसके होठों के कोने पर उभरी कुटिल मुस्कान से वह दहल गई|

“किस शहर से आ रहे हो....नलिन?,”नाम लेकर सवाल पूछना जैसे उसके अधिकार क्षेत्र में चला गया था|

“यह बताना मैं जरूरी नहीं समझती”, कहते हुए सुमेधा की रुखाई झलक गई|

“ओके, ओके, कोई बात नहीं”, अपनी ऊँची गोरी नाक को छूता हुआ कह रहा था|

सुमेधा बोल पढ़ी, “आपने गीता पढ़ी है तो यह भी जानते होंगे कि कृष्णा सर्वव्यापी हैं| वह आपको आपके देश में भी मिल जाएँगे| उनके लिए भारत आने की क्या जरूरत है|”

“कृष्णा के लिए अनुयायी बनाने का काम करता हूँ|”

“मतलब? कैसे अनुयायी बनाते हैं आप?”

“छोड़िये, ये मेरे और कृष्णा के बीच की बातें है, आप नहीं समझेंगी,”कहता हुआ वह उठने का उपक्रम करने लगा क्योंकि ट्रेन अब रुकने ही वाली थी|

सुमेधा और नलिन भी सामान ठीक करने लगे| स्टेशन पर वह पहले उतर गया था किन्तु वहीं पर खड़ा रहा| चूँकि हॉस्टल में रहने की बात थी तो सुमेधा ने टिन का एक बक्स लिया था जिसमें रोज के कपड़ो के अलावा गरम कपड़े भी थे| भारी बक्से को दोनों माँ बेटा मिलकर उतारने की कोशिश कर रहे थे कि उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया| सुमेधा ने कहना चाहा कि उसे मदद की आवश्यकता नहीं, किन्तु चुप रही और उसे बक्से को उतारने दिया| इस दौरान उस गोरे फिरंगी साधु के चेहरे की एक एक रेखा से कुटिलता टपक रही थी|

“उफ! मैं भी कितनी शक्की हूँ, वह मदद ही तो कर रहा है”, यह सोचकर सुमेधा मुस्कुरा दी|

“मैं दो महीने भारत में रहूँगा, फिर अगले साल आऊँगा” कहता हुआ उसने नलिन से हाथ मिलाया और सुमेधा की ओर मुड़कर नमस्कार की मुद्रा में खड़ा हो गया| सुमेधा ने जल्दी से नमस्कार किया और आगे बढ़ने लगी| पता नहीं क्यों किसी अनहोनी की आशंका से उसका मन बार बार उसे सावधान कर रहा था| आने वाले खतरे को भाँप लेने की उसकी अंतर्दृष्टि को परिवार में भी सभी लोग मानते थे|

बीएचयू पहुँचने पर गेस्टरूम में सुमेधा को जगह मिल गई| नलिन को भी हॉस्टल में जगह मिल गई| नलिन के रूममेट के रूप में सही मित्र को देखकर सुमेधा ने चयन किया| अगले दिन आँखों में नमी लिये वह वापस लौट आई| नलिन भी माँ से बिछड़ते हुए भावुक हो गया| नई जगह , नए दोस्त मिले|”

”कैसे एडजस्ट कर पाएगा” कभी वह घर से बाहर नहीं रहा रहा था तो सुमेधा की चिंता वाज़िब थी|

अपने शहर वापस आकर सुमेधा अपनी नौकरी में लग गयी| जिस दौर में नलिन बीएचयू गया था, उस दौर में हर हाथ में मोबाइल नहीं सजे रहते थे| वह जमाना था कि टेलिफोन बूथ पर जाकर एसटीडी कोड के साथ लैंडलाइन पर नम्बर लगाने होते थे| नलिन से बात करने के लिए ऑफ़िस के नम्बर पर फ़ोन लगाना होता था| फिर वे लोग नलिन को बुलाते तब बात हो पाती| शुरू के सप्ताह में लगातार सुमेधा ने नलिन से बात की| एक बार नलिन ने कहा,”माँ, किसी के घर से हर दिन फ़ोन नहीं आता| आप रोज़ फ़ोन करती हैं तो मेरे दोस्त मज़ाक बनाते हैं|”

“ठीक है नलिन, मैं सप्ताह में एक दिन कर लूँगी, या जब सुविधा हो तब तुम ही कर लेना”|

“ठीक है माँ, हर शनिवार को मेस ऑफ़ रहता है तो हमलोग बाहर लंका जाते हैं खाना खाने| मैं वहीं बूथ से बात कर लूँगा|”

“अपना ख्याल रखना बेटा”, कहकर सुमेधा ने फ़ोन रख दिया|

धीरे धीरे सुमेधा भी अपनी दिनचर्या में रमकर नलिन के बारे में थोड़ा कम सोचने लगी| किन्तु शनिवार को फोन का इन्तेजार अवश्य करती| दो महीने से सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था| अब नलिन का फर्स्ट सेमेस्टर होने वाला था तो नलिन ने कह दिया था कि वह फ़ोन न कर पाए तो सुमेधा चिन्ता न करे| एक शनिवार सुमेधा का मन नहीं माना तो उसने हॉस्टल के ऑफ़िस में फ़ोन किया| पता चला कि नलिन कमरे में नहीं, कहीं बाहर गया है| अगले रविवार भी वह बाहर था तो उससे बात नहीं हो सकी| परीक्षा के समय कहाँ घूम रहा है, किसी आशंका ने सुमेधा की नींद उड़ा दी| उसने उसी शाम को फिर से फ़ोन लगाया तो नलिन से बात हो गई|

“कहाँ गए थे नलिन?”सुमेधा ने पूछा|

“इस्कॉन टेंपल गया था माँ, कुछ दिन पहले कॉलेज के गेट पर वही ट्रेन वाले डैनियल मिले थे| उन्होंने ही कहा कि लॉर्ड कृष्णा का ध्यान लगाने से जिंदगी की कई बाधाएँ दूर हो जाती हैं|” ऐसा लग रहा था जैसे नलिन किसी ध्यानमग्न अवस्था में बोल रहा था| सुमेधा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई|

“अभी तुम्हारी परीक्षा है बेटा, कृष्णा भी उसी की मदद करते हैं जो पढ़ता है| उस डैनियल के चक्कर में मत पड़ो नलिन| वह इसी तरह युवा पीढ़ी को बहकाकर कृष्णा का अनुयायी बनाता है, यह अब मेरी समझ में आ रहा| इस बार वह मिले तो वहाँ जाने से मना कर देना|”

“पर माँ, वह शनिवार को गेट पर मिल जाते हैं और कहते हैं कि रविवार को हम सबको कुछ देर इस्कॉन में कृष्णा का ध्यान करना चाहिए|”

इन सब चीज़ों से दूर रहने वाला नलिन आज कैसी बातें कर रहा था| सुमेधा ने नलिन की परवरिश बहुत अच्छे संस्कार देकर की थी| उसकी उम्र के दूसरे बच्चे जहाँ देर रात तक बाहर रहते, नलिन ने कभी ऐसा नहीं किया था उसकी भाषा हमेशा शालीन रहती थी| रैगिंग के दौरान भी गाली न बोल पाने के कारण कई दिनों तक दोस्तों के बीच वह हँसी का पात्र बना रहा था किन्तु अडिग रहा| अभिभावक से दूर हुए बच्चे पर कृष्ण-भक्ति का नशा चढ़ाकर डैनियल आखिर धूर्तता कर ही गया|

“अगली बार मना करना नलिन”|

“शायद न कर पाऊँ”, शायद नलिन विवश था डैनियल के सामने|

“तुम क्या चाहते हो नलिन?”

“मैं नहीं जाना चाहता, पर कोई शक्ति है जो मुझे वहाँ जाने के लिए प्रेरित करती है माँ |”

“ठीक है, अगले रविवार तुम इस्कॉन जाना, मैं तुम्हें वहीं मिलूँगी किन्तु डैनियल को यह पता नहीं चलनी चाहिए”, खतरे को भाँपती हुई सुमेधा ने अगला कदम सोच लिया था|

“ठीक है माँ, आप आना जरूर”, नलिन की आवाज में राहत सी दिखी|

ट्रेन बनारस पहुँच चुकी थी| सुमेधा स्टेशन से सीधे इस्कॉन चली गई| “हरे रामा हरे कृष्णा” पर झूमते हुए कृष्ण के अनुयायियों का झुंड , जाने किस दुनिया में लीन था| अधिकतर विदेशी लग रहे थे| जाने किस शांति की तलाश थी उन्हें| बहुत सारे दुःख दर्द होंगे , तभी मन से वे उस लोक का विचरण कर रहे थे जहाँ उनका अवचेतन मन सब कुछ भूल जाना चाहता था| उन विदेशियों के बीच थे कुछ मासूम भारतीय चेहरे जो स्वेच्छा से तो नहीं ही आए होंगे| अठारह उन्नीस साल के भारतीय बच्चे अशांति के उस स्तर तक नहीं जाते कि उन्हें खुद को भूलना पड़े| उन्हें डैनियल जैसे साधुओं ने यहाँ आकर झूमने को प्रेरित किया होगा|

सुमेधा बेसब्री से नलिन का इन्तेजार कर रही थी|

कुछ देर बाद नलिन डैनियल के साथ आता हुआ दिखा| सुमेधा कृष्ण की प्रतिमा की ओर मुड़कर खड़ी हो गयी और हाथ जोड़कर ”ओम क्लीं कृष्णाय नमः”का जप करने लगी मानो अपने कान्हा को कह रही हो कि मैं हूँ न आपकी भक्ति के लिए|

कुछ देर बाद जब वह मुड़ी तो देखा कि नलिन उस झूमने वाले समूह का हिस्सा बना चुका है| सुमेधा की आँखें नम हो गयीं|

“अरे आप” कहता हुआ डैनियल सामने खड़ा था|

“मेरे बच्चे को बख्श दो डैनियल”, वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी|

“मैंने किया ही क्या है| संसार एक मायाजाल है, उस जाल से निकलने में मैं हेल्प करता हूँ और क्या”

“नहीं डैनियल, तुम्हें नहीं मालूम कि कितने घरों के अरमानों को ध्वस्त करते हो तुम| ये मासूम बच्चे जब अपने पेरेन्ट्स की छत्रछाया से दूर होते हैं तो नादान होते हैं| ईश्वर भक्ति में उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती इसलिये बात मान लेते हैं तुम्हारी| जीवन की मुख्य धारा से उन्हें अलग करने का प्रयास न करो|”

“अध्यात्म भी एक धारा है,” वह सुमेधा को आश्वस्त करना चाहता था|

“हर उम्र की धाराएँ अलग अलग होती हैं| अध्यात्म की धारा इन नादान बच्चों के लिए नहीं| क्या इस धारा में बहकर तुम खुश हो डैनियल? क्या तुम्हें अपने माता-पीता, भाई- बहन याद नहीं आते?”

अचानक वह कहीं खो गया| शायद अपने घरवालों को याद कर रहा था| उस वक्त वह भी वैसा ही मासूम दिख रहा था जैसे कि नलिन|

सुमेधा कहती जा रही थी,”मैं इसी धारा में अपने भाई को खो चुकी हूँ| घर और विवाह के प्रति उसकी विरक्ति ने हमारे घर को खोखला कर दिया| मुझसे मेरा बेटा मन छीनो डैनियल,” सुमेधा उस समय एक दयनीय याचक की तरह हाथ जोड़कर खड़ी थी|

अचानक डैनियल हँस पड़ा, “जाओ, तुम्हारा पुत्र तुम्हें वापस करता हूँ|”

“सिर्फ मेरा नहीं, इन सभी पढ़ने वाले बच्चों को छोड़ दो जो यहाँ बेसुध झूम रहे| मैं बाहर इन्तेजार कर रही”, कहकर सुमेधा बाहर निकल गई| कुछ देर बाद करीब दस बच्चों को लेकर वह बाहर आया| सभी बच्चों को सम्बोधित कर वह बोल रहा था,”अभी तुमलोगों की पढ़ने की उम्र है| कृष्ण भक्ति का यह मार्ग हमेशा खुला रहेगा| पहले माता पिता के सपनों को साकार करो बच्चों| जिस देश में ऐसी माँएँ हों वहाँ के बच्चों को मुख्यधारा से अलग नहीं किया सकता|”

सुमेधा सभी बच्चों को लेकर चली| कुछ दूर जाकर वह और नलिन पीछे मुड़े| डैनियल वहीं खड़ा उनलोगों को देख रहा था| दोनो ने वहीं से हाथ हिलाया, डैनियल ने भी हाथ हिलाकर उन्हें विदाई दी और मंदिर की ओर मुड़ गया|

अप्रकाशित और मौलिक

ऋता शेखर ‘मधु’

२९/०३/२०१९



यह कहानी है उन युवाओं की जो जीवन की मुख्य धारा से जाने अनजाने अलग हो जाते हैं|

शनिवार, 22 जून 2019

मल्लिका व अनंग शेखर छंद

मल्लिका छंद

21 21 21 21....(212 121 21)
1
दूब से मिलें गणेश।
प्रेम ने किया प्रवेश।।
दान मान ज्ञान संग।
श्वाँस श्वाँस मे उमंग।।
2
है जिया उदास आज।
वीतराग छेड़ साज।।
मंद मंद है समीर।
क्यों पपीहरा अधीर?।।
3
सिंधु में हजार सीप।
पास एक आस दीप।।
हाथ मे लिए गुलाब।
छंद की नई किताब।।
--ऋता शेखर मधु

अनंग शेखर छंद
12 (लघु गुरु) की सोलह आवृत्तियाँ... दो दो पंक्तियों के अंत तुकांत
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
सुनील आसमान में, घिरी घटा सुहावनी,पलाश झूमते रहे, मयूर नाचने लगे।
लता बनी लुभावनी, हवा हुई सुवासिनी,निशीथ प्रीत पात को, चकोर बाँचने लगे।।
गुलाल पीत रंग के ,पराग फूल से झरे ,विनीत बूँद श्रावणी, कली कली सँवारती।
सफ़ेद फेन धारती, हिमाद्रि से बही नदी,जटा हठात छोड़ती, हरी धरा पखारती ।।
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
--ऋता शेखर मधु

आप अच्छे हो - लघुकथा







लघुकथा-पितृदिवस पर आप अच्छे हो 

"निभा, कहाँ है हमारी लाडली बिटिया। देखो!हम तुम्हारे लिए क्या लाये हैं।" घर में घुसते ही नीलेश ने बड़े प्यार से तेज आवाज़ में कहा । सामने विभा खड़ी थी। उसने इशारे से बताया कि निभा अपने कमरे में है। आज दोपहर में निभा का बारहवीं के रिजल्ट आया था। उसका प्रतिशत सहपाठियों के मुकाबले काफ़ी कम था। जब से रिजल्ट आया था, वह आंखों में आँसू लिए बैठी थी। दिन का खाना भी नहीं खाया था उसने। उसकी मम्मी विभा ने नीलेश को फ़ोन करके सब बातें बतायी। 
"अरे, मेरी बिटिया कहाँ है" नीलेश ने बिल्कुल उसी अंदाज में कहा जैसे बचपन में वह बेटी के साथ खेला करता था और सामने देखकर भी नहीं देखने का नाटक किया करता था। निभा ने अपना सिर ऊपर नहीं किया। वैसे ही मूर्तिवत बैठी रही। 
"निभा, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ" कहते हुए नीलेश ने नन्हा सा टेड्डी निकाला और सामने रख दिया। निभा ने उदास नजर टेड्डी पर डाली। पहले की बात रहती तो वह नीलेश के गले लग जाती। 
"निभा, देखो मैं पटीज़ लाया हूँ और आइसक्रीम भी वही जो फ्लेवर तुम्हें पसन्द है।" यह कहकर उसने दोनों चीज़ें निभा के सामने रख दीं। 
"पापा, प्लीज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैंने आपके उम्मीदों को तोड़ा है। आपने मुझे हर सुविधा दी, और देखिए मैं कितनी नालायक निकली।" "मेरी बेटी और नालायक, कभी नहीं। मुझे सिर्फ तुम चाहिए बेटा। तुमने प्रयास किया वही हमारे लिए बहुत है...अब चलो, हमलोग जश्न मनाते हैं। विभा, इधर आ आओ" कहते हुए नीलेश ने निभा के मुंह में बड़ा सा चम्मच डाल दिया आइसक्रीम वाला। 
एकसाथ इतनी ठंडा आइसक्रीम मुंह में जाते ही वह उठकर पापा के गले लग कर जोर से रो पड़ी। नीलेश ने उसे रो लेने दिया।अब वह नन्हीं बच्ची नहीं थी जो फुसल जाती। नमी नीलेश की आँखों में भी उतरी पर वह खुशी बिटिया को वापस पा लेने की थी। 
अचानक निभा धीरे से बोली,"आप बहुत अच्छे हो पापा" निभा की गम्भीर आवाज ने नीलेश को अंदर से रुला दिया। --ऋता शेखर मधु

रविवार, 12 मई 2019

मातृदिवस

कल माँ पर लिखा...आज एक माँ लिखेगी ।

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

लेखनी थामी जब हाथों में
वे ब्लॉग बनाकर खड़े रहे
ममा को तुक की कमी न हो
शब्दों के व्यूह में पड़े रहे
shabdvyuh.com

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

जिसे फ़िजूलखर्च कहते हम
जरूरत उसको बतलाते हैं
थ्री जी से हम खुश थे बन्धु
वे फाइव जी दिलवाते हैं

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

हम जब देखे चादर अपनी
ट्रेन टिकट कटवा लाए
उनको दिखती सुविधा माँ की
बुकिंग प्लेन में करवाये

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

देख मायूसी चेहरे पर
घण्टों घण्टों बतियाते हैं
सिर रख करके गोदी में
बच्चे बन हठियाते हैं

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

तबियत जब जब नासाज़ हुई
रसोई उन्हीं के हाथ हुई
आती बिटिया खाना लेकर
जैसे मेरी माँ साथ हुई

हम उनके दिलों में रहते हैं
इसको वे कहते नहीं
उनके काम बताते हैं

ईश्वर से विनती है इतनी
आशीषों के फूल बिछा देना
आँचल की छाँव रहेगी मेरी
तुम बस धूल हटा देना
उनके सतरंगी सपनों में
सुगन्धित पवन मिला देना
बच्चे माँ के धन दौलत हैं
उनपर रक्षा कवच चढ़ा देना
😍😍😘😘
© ऋता शेखर 'मधु'
#mothersday

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

अभिनंदन राम का


अभिनंदन राम का

भारत की माटी ढूँढ रही
अपना प्यारा रघुनंदन

भारी भरकम बस्तों में
दुधिया किलकारी खोई
होड़ बढ़ी आगे बढ़ने की
लोरी भी थक कर सोई

महक उठे मन का आँगन
बिखरा दो केसर चंदन

वर्जनाओं की झूठी बेड़ी
ललनाएँ अब तोड़ रहीं
अहिल्या होना मंजूर नहीं
रेख नियति की मोड़ रहीं

विकल हुई मधुबन की बेली
राह तके सिया का वंदन

बदल रहे बोली विचार
आक्षेप बढ़े हैं ज्यादा
हे! धनुर्धारी पुरुषोत्तम
लौटा लाओ अब मर्यादा

श्रीराम जन्म के सोहर में
पुलक उठे हर क्रंदन

हर बालक में राम छुपे हों
हर बाला में सीता
चरण पादुका पूजें भाई
बहनें हों मन प्रीता

नवमी में हम करें राम का
धरती पर अभिनंदन
--ऋता शेखर 'मधु'

धरती को ब्याह रचाने दो

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धरती को ब्याह रचाने दो
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धरती ब्याह रचाती है
पीले पीले अमलतास से
हल्दी रस्म निभाती है
धानी चुनरी में टांक सितारे
गुलमोहर बन जाती है
देखो, धरती ब्याह रचाती है।


आसमान के चाँद सितारे
उसके भाई बन्धु हैं
लहराते आँचल पर निर्मल
बहता जाता सिंधु है
ओढ़ चुनरिया इंद्रधनुष की
देखो, धरती ब्याह रचाती है।

बने पुजारी सप्तऋषि
ऋचाएँ वेद सुनाती हैं
नन्दन कानन में वृक्ष लताएं
झूम झूम लहराती हैं
छुईमुई बन कर सिमटी हुई
देखो, धरती ब्याह रचाती है।

इंसानों ने छीन लिया है
उसकी ठंडी छाया को
खेतों में वह ढूँढ रही
स्वर्ण फसल की काया को
वहाँ खड़े भवनों में धरती
कैसे ब्याह रचाएगी ।

मखमली गलीचे दूर्वा के
धूमिल पड़े सड़कों के नीचे
पवन बसन्ती धुआँ धुआँ है
कलियाँ सूखीं अँखियाँ मीचे
वन्दनवार फिर कहाँ बनेंगे
सुमन-हार कहाँ से लाएगी

इंसानों!
लौटा दो सुषमा उसकी
पृथ्वी को स्वर्ग बनाने दो
हम सब नाचेंगे बन बाराती
धरती को ब्याह रचाने दो।
--ऋता

रविवार, 21 अप्रैल 2019

जागो वोटर जागो

जागो वोटर जागो

अपने मत का दान कर, चुनना है सरकार।
इसमें कहीं न चूक हो, याद रहे हर बार।।
याद रहे हर बार, सही सांसद लाना है।
जो करता हो काम, उसे ही जितवाना है।
सर्वोपरि है देश, जहाँ पलते हैं सपने।
'मधु' उन्नत रख सोच, चुनो तुम नेता अपने।।१

जिम्मेदारी आपकी, चुनने की सरकार।
सजग भाव से लीजिये, अपना यह अधिकार।।
अपना यह अधिकार, भला क्योंकर खोना है।
देकर अपना वोट, वहाँ शामिल होना है।
पक्की कर लो 'ऋता', चुनावी हिस्सेदारी।
चुनने की सरकार, हमारी जिम्मेदारी।।२

जागो नेता देश के, खूब बजाओ ढोल।
जी भर-भर के खोल दो, इक दूजे की पोल।।
इक दूजे की पोल, बड़ी लगती है प्यारी।
भाषाओं की लोच, निरीह लगे बेचारी।
त्यागो 'मधु' आलस्य को, वोट देने को भागो।
दो झूठों को सीख, देश की जनता जागो।।३

जनशासन में वोट का, सबको है अधिकार|
योग्य पात्र को तौलकर, बटन दबाओ यार||
बटन दबाओ यार, यही है भागीदारी |
दलबदलू के साथ ,न करना रिश्तेदारी|
स्वयं रहे जो नेक, निभाता वह अनुशासन|
'ऋता' है खुशनसीब, यहाँ पायी जनशासन||४

सारे नेता भ्रष्ट हैं, रखें न ऐसी सोच|
प्रजा कुशल है जौहरी, कहाँ रहे फिर लोच||
कहाँ रहे फिर लोच, परख कर लायें हीरा|
ढूँढ निकालें आप, उष्ट के मुँह से जीरा|
'मधु', तुम जाओ बूथ, वोट दो सुबह सवारे|
रखो न ऐसी सोच, भ्रष्ट हैं नेता सारे ||
--ऋता शेखर 'मधु' 

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

आखिर ऐसा क्यों हुआ,समझाओ श्रीमान


गुलमोहर खिलता गया, जितना पाया ताप |
रे मन! नहीं निराश हो, पाकर के संताप |।१

उसने रौंदा था कभी, जिसको चींटी जान।
वही सामने है खड़ी, लेकर अपना मान।।२

रटते रटते कृष्ण को, राधा हुई उदास।
चातक के मन में रही, चन्द्र मिलन की आस।।३

रघुनन्दन के जन्म पर, सब पूजें हनुमान।
आखिर ऐसा क्यों हुआ,समझाओ श्रीमान।।४

आलस को अब त्याग कर, करो कर्म से प्यार।
घिस-घिस कर तलवार भी, पा जाती है धार।।५

जीवन है बहती नदी, जन्म मृत्यु दो कूल।
धारा को कम आँक कर, पाथर करता भूल।।६

ऋता




रविवार, 6 जनवरी 2019

ऐसा है उपहार कहाँ......

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ऐसा है उपहार कहाँ......

नया वर्ष तम सारे हर ले
ऐसा है उपहार कहाँ
चले संग जो सदा हमारे
वह जीवन का सार कहाँ
धरती की ज्वाला ठंडी हो
नदिया में वह धार कहाँ
बिन डगमग जो पार उतारे
वैसी है पतवार कहाँ
उठे हाथ जो सदा क्षमा को
ऐसे रहे विचार कहाँ
एक बात जो सर्वम्मत हो
वह सबको स्वीकार कहाँ
बिन बोले जो समझे सबकुछ
बहता है वह प्यार कहाँ
कोई न भूखा सो पाए
जग में वह भंडार कहाँ
अहसास हृदय को छू जाए
लेखन में व्यापार कहाँ
सिर्फ प्रीत के शब्द मिलें
होता ऐसा हर बार कहाँ
मन बन जाये रमता जोगी
मनु, सुन्दर संसार यहाँ।
-ऋता शेखर मधु