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गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

परी देश की शहज़ादी





परी देश की शहज़ादी
दूर देश से आई थी
मधुर-मधुर सी थिरकन को
पांवों में भरकर लाई थी
मंद स्मित मुस्कानों को
होठों से छलकाई थी
मिश्री सी वाणी की उसने
रागिनी फैलाई थी
दौड़-दौड़ घर उपवन में
तितली सी हरषायी थी
पापा-मम्मी की प्यारी बिटिया
अपने घर की धड़कन थी
वक्त को पर लगे होते
अब वह प्यारी दुल्हन थी|

आँखों में रंगीले ख़्वाब लिए
सोने के पिंजड़े में कैद हुई
पायल की बेड़ी ऐसी बंधी
थिरकन उसकी थम  गई
व्यंग्य बाणों से बिंध-बिंध कर
होठों पर मायूसी थी
तान नहीं,
ताने सुन-सुन कर
स्वर में अब खामोशी थी
अब भी वह सुंदर लगती थी
पर सोन तीलियों से टकरा-टकरा
पंख टूट गए थे उसके
अरमानों के चीथड़े चुनती
अब वह सुखी गृहिणी थी|

ऋता शेखर मधु

दूर से सुखी, संतुष्ट और खुश दिखने वाली गृहिणियों के दिलों में झाँक कर देखा है,तब इसे लिखा है.