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सोमवार, 7 सितंबर 2026

मातुल कंस

 

मातुल कंस

यमुना तट पर नगरी पावन।

मथुरा जिसका नाम सुहावन।।

कंस नाम का राजा आया।

जनता को वह खूब सताया।।


''भगिनी-सुत ही काल बनेगा।

तेरे आगे वही ठनेगा।।

पुत्र आठवाँ जो आएगा।

तेरी मृत्यु संग लाएगा।।''


आयी थी नभ से यह वाणी।

सुनकर काँपा था वह प्राणी।।

पाकर कटुक वचन की हाला।

अटका उसके कंठ निवाला।।


वाणी जो सुन ली थी भारी।

कंस हुआ था अत्याचारी।।

प्राणों पर जब थी बन आई।

क्रूर बना वह राजा भाई।।


बहन देवकी को वह पकड़ा।

जंजीरों से उसको जकड़ा।।

भगिनी-पति वसुदेव न भाया।

कारा में उनको भी लाया।।


छह पुत्रों को उसने पटका।

लगा देवकी को तब झटका।।

पति-पत्नी दोनों थे व्याकुल।

इतना क्रूर हुआ था मातुल।।


 गर्भ सातवाँ जब था आया।

प्रत्यारोपित करतीं माया।।

हुआ देवकी से विस्थापित।

बना रोहिणी में वह ज्ञापित।।


अष्टम सुत की थी अब बारी।

रखवाली नृप करता भारी।।

अपनी-अपनी नींदें त्यागे।

रात-दिवस सैनिक थे जागे।।


भादों कृष्ण-अष्टमी आयी।

माता ने पीड़ा थी पायी।।

शिशु-क्रंदन से  गूँजा कारा।

भय से बाबुल का मन हारा।।


नत नयनों में पीर बड़े थे।

विवश वहाँ वसुदेव खड़े थे।।

यह विचार तब मन में जागा।

कैसा हूँ मैं पिता अभागा।


रात अमावस की थी काली।

बारिश भी होती मतवाली।।

छाई मन पर घोर निराशा।

चिंतन में थी मूक हताशा।।


अद्भुत थी वह बात निराली।

टूटी सीकर कारा वाली।।

सैनिक भी सोए थे सारे।

पथ को पित निर्बाध निहारे।।


डलिया में रखकर के बालक।

जाते यमुना में वह पालक।।

शेषनाग-फन छतरी ताने।

शिशु को आये देव बचाने।।


पग छूता यमुना का पानी।

वसुदेव को हुई हैरानी।।

आये हैं सब शिशु के कारण।

बात नहीं है यह साधारण।।


नन्द गाँव में बालक देकर।

वसु लौटे कन्या-शिशु लेकर।।

तबतक सारे सैनिक जागे।

बात यही कहने को भागे।।


प्रबल हुआ मातुल का मारण।

बालक बिछड़ा उसके कारण।।

बात व्यथा की बड़ी पुरानी।

मार्मिक लगती आज कहानी।।




ऋता शेखर 'मधु'

विधा - चौपाई

मात्रा भार - 16

पदांत- 22