रविवार, 11 अप्रैल 2021

चले थे कहाँ से कहाँ जा रहे हैं

 122 122 122 122

चले थे कहाँ से कहाँ जा रहे हैं
शजर काट कैसी हवा पा रहे हैं

न दिन है सुहाना न रातें सुहानी
ख़बर में कहर हर तरफ़ छा रहे हैं

मुहब्बत की बातों को दे दो रवानी
न जाने ग़दर गीत क्यों गा रहे हैं

है रंगीन दुनिया सभी को बताना
ये सिर फाँसियों पर बहुत आ रहे हैं

विरासत में हमने बहुत कुछ था पाया
क्यों माटी में घुलता ज़हर खा रहे हैं

@ऋता शेखर 'मधु'

14 टिप्‍पणियां:

  1. जय मां हाटेशवरी.......

    आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
    आप की इस रचना का लिंक भी......
    13/04/2021 मंगलवार को......
    पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
    शामिल किया गया है.....
    आप भी इस हलचल में. .....
    सादर आमंत्रित है......


    अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
    https://www.halchalwith5links.blogspot.com
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. मुहब्बत की बातों को दे दो रवानी
    न जाने ग़दर गीत क्यों गा रहे हैं
    ऐसा लग रहा कि मुहब्बत तो बची ही नहीं कहीं । खूबसूरत ग़ज़ल

    जवाब देंहटाएं
  3. विरासत में हमने बहुत कुछ था पाया
    क्यों माटी में घुलता ज़हर खा रहे हैं
    अति पाने की चाह में जहर भी खुद ही घोल रहे हैं माटी में....
    बहुत उम्दा सँजन।
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
  4. जय मां हाटेशवरी.......
    आपने लिखा....
    हमने पढ़ा......
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें.....
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना.......
    दिनांक 07/05/2021 को.....
    पांच लिंकों का आनंद पर.....
    लिंक की जा रही है......
    आप भी इस चर्चा में......
    सादर आमंतरित है.....
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  5. जी वाकई लाजवाब पंक्तियाँ लिखी है आपने। अभी की परिस्थितियों पर मैं इसे रचनाओं में गिनती करूंगा। सराहनीय एवं विचारनी योग्य बातें है। हम इंसान को अब अपने रोज के दिनचर्या पर ख्याल करना होगा।

    जवाब देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!