मेरा सहयात्री
करता है
बहुत प्यार मुझसे
मुँह अन्धेरे ही
भेजता संदेसा
खुद के आने का
आते ही उसके
गूँज उठती है
खगों की चहचह
सुरभित होते
पुष्पों की महमह
पाते ही संदेश
नींद उड़ जाती मेरी
चल पड़ती मैं
उसके पीछे-पीछे
वह लगा रहता
हर सेकेंड हर मिनट
हर घंटे हर कदम
मेरे पास- पास
साथ उसके चलने से
बनी रहती है ऊर्जा मेरी
कभी-कभी
होती है कोफ़्त
क्यूँ करता है वह
हर वक्त मेरा पीछा
कभी देखती उसे मैं
हँसकर और कभी
आँखें तरेर कर
उसे फ़र्क नहीं पड़ता
वह मुझे घूरता ही रहता
मैं भी कभी देखती
कभी अनदेखी करती
मेरे पीछे
कभी छोटी परछाई
कभी लम्बी परछाई बना
आगे- पीछे डोलता
धीरे-धीरे
वह थकने लगता
मैं भी थक जाती
आता जब विदाई का वक्त
पसर जाता
एक मौन सन्नाटा
पंछी नीड़ में दुबकते
फूल भी
पँखुड़ियाँ लेते हैं समेट
बुझा-बुझा सा वह
बुझी-बुझी सी मैं
मौन नजरों से
ले लेते हैं विदाई
विलीन हो जाता वह
अस्ताचल में, करके वादा
कल फिर आएगा
अरुणाचल से|
इस जुदाई से
मन ही मन मैं
खूब खुश होती
अब वह
नजर नहीं आएगा
उसकी पहरेदारी से दूर
चाँद-तारों से बातें करती
सिमट जाऊँगी मैं
नींद की आगोश में|
ऋता शेखर ‘मधु’