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शुक्रवार, 8 जून 2018

मौसम गर्मी का- बाल गीत


बाल-गीत




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मौसम गर्मी का है आया
सूरज छतरी से शरमाया


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गुलमोहर की लाली देखो
उसमें तुम खुशहाली देखो


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तरबूजों की शान निराली
शर्बत बनकर भरती प्याली


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पीले पीले आम सुहाने
ठेलों पर आ गए रिझाने


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हुई गुलाबी लीची रानी
पेटी में भर लाई नानी


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छुट्टी में तुम पढ़ो कहानी
पीकर मीठा नरियल पानी


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बच्चों मन को कर लो ताज़ा
खाओ सॉफ्टी पी लो माज़ा

ऋता शेखर मधु

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

रंगा सियार











रंगा सियार...

हरा भरा इक जंगल था
वहाँ न कोई दंगल था
सभी प्यार से रहते थे
अच्छी बातें कहते थे

शेर हिरन भालू या  बंदर
निर्मल दिल था सबके अन्दर
एक घाट पर जाते थे वे
मीठे बोल सुनाते थे वे

कोयल बुलबुल चहका करतीं
कानन में जूही महका करती
वह मंगल वन सबको भाता
दुष्ट शिकारी वहाँ न आता

एक रोज उस नंदन वन में
एक सियार कहीं से आया
कानाफूसी फूट की बातें
जहाँ तहाँ कहकह कर छाया

लोमड़ी दीदी थी बड़ी सयानी
समझ रही थी सभी कहानी
सियार को रस्ते पर है लाना
बात ये उसने मन में ठानी

तभी मूर्ख दिवस था आया
लोमड़ी को भी आइडिया आया
झटपट उसने प्लान बनाया
सबको ताल के निकट बुलाया

हँस हँस कर बोली वह सबसे
कहनी है इक बात को कबसे
इस पोखर में एक घड़ा है
उसके भीतर माल भरा है

कल जो मूरख बन जाएगा
पूरा घड़ा वही पाएगा
सुबह सुबह सब आएँगे
अपने खेल दिखाएँगे


चले गए सब फिर अपने घर
लोमड़ी दीदी गई कुछ रुककर
ताल में उसने रंग मिलाया
फिर मुसकाकर पूँछ हिलाया

आधी रात को पहुँचा सियार
हिलोरे बेवकूफ़ तलैया बार बार
कुछ भी उसके न हाथ लगा
चतुर लोमड़ी ने था खूब ठगा

दूसरे दिन जब हुआ विहान
आने लगे सब पशु महान
सियार भी आया शरमाकर
सब पशु हँस पड़े ठठाकर

हक्का बक्का हो गया सियार
चकित हो देखे सभा निहार
'रंगा सियार' 'रंगा सियार'
छौने चिढ़ाने लगे बार बार

धूर्त ने सबसे मांगी माफी
सबक बना था इतना काफी

सीख लो बच्चो,
न करना नादानी
आज भी जो होते हैं कपटी
रंगा सियार ही कहलाते हैं|
...........ऋता

शनिवार, 18 जनवरी 2014

यह है मौज मनाने का दिन



यह है मौज मनाने का दिन
खेलने हँसने गाने का दिन
छुपा छुपाई दिन भर खेलें
सोमवार को हिन्दी पढ़ लें
मंगल की है बात निराली
गेंदा फूले डाली डाली डाली
बुधवार ने बिगुल बजाया
बच्चों ने फिर चित्र बनाया
गुरुवार को इंग्लिश पढ़ लो
फिर माटी से मूरत गढ़ लो
शुक्रवार को गणित है भाया
गिनती ने है शोर मचाया
शनिवार को शॉपिंग कर लो
मनचाहा डलिया में भर लो
रविवार है सोने का दिन
यह है मौज मनाने का दिन|
.........ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 8 सितंबर 2013

शिक्षित बन नवगीत रच दो











यूँ फ़लक को चूमने की
और हवा में घूमने की
आरजू है नव उमंग की
कोशिशें हैं नव तरंग की
आगाज तुम नव उदय का
साज तुम मधुर हृदय का
ले चलो ये कश्तियाँ तुम
बनोगे इक दिन हस्तियाँ तुम
राष्ट्रगिरी को तुम उठा लो
बन कान्हा सबको बचा लो
नव सुरों में राग भर दो
शिक्षित बन नवगीत रच दो
तुम धरा के नव श्रृंगार हो
खिले बसंत के पुष्पहार हो
बाल मन है सदा ही निश्छल
चहक रहा है खग सा हर पल
भारत का नव निर्माण करो
जीने का पथ आसान करो
नव अंकुरों को मिले जो पोषण
भारत वतन बन जाएगा रौशन|

................ऋता

मंगलवार, 11 जून 2013

कोमल हाथ चुभ गए थे काँच


ताँका........विश्व बाल श्रम दिवस पर-१२ जून

बालक रोया
बस्ता चाहिए उसे
है मजबूर
दिल किया पत्थर
बनाया मजदूर|१|

कोमल हाथ
चुभ गए थे काँच
बहना रोई
भइया आँसू पोंछे
दोनो कचरे बिनें|२|

दिल के धनी
राजा औ' रंक बच्चे
देख लो फ़र्क
एक खरीदे जूता
पोलिश करे दूजा|३|

गार्गी की बार्बी
कमली ललचाई
माँ ने पुकारा
बिटिया, इधर आ
बर्तन मांज जरा|४|

कठोर दिल
कैसी माता है वह
काम की भूखी
बेटी को देती मैगी
कम्मो को रोटी सूखी|५|

........ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 15 अगस्त 2012

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं

चित्र गूगल से साभार

स्वावलंबन

आओ मित्रों हम सब सीखें
पाठ स्वावलंबन का
इस पाठ को याद करें हम
तजें भाव परावलंबन का
अपना कार्य जो स्वयं करते
दृढ़ प्रतिज्ञ बन जाते हैं
कोई उनको झुका न पाता
सुख ही सुख वे पाते हैं
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं
इसे जो भूल जाते हैं
हर कार्य के लिए वे
दूजे का मुँह जोहते हैं
कोई उनका कार्य न करे
दुखों से वे भर जाते हैं
भागीरथ को याद रखो
गंगा को जिसने लाया है
वीर शिवाजी के दृढ़ निश्चय ने
इतिहास में स्थान बनाया है
झाँसी की रानी को देखो
अंग्रेजों को मार भगाया है
गाँधी के स्वावलम्बी स्वभाव ने
महात्मा उन्हें बनाया है
एक बार अपनाकर देखें
खुशियों से भर जाएँगे
कोई कुछ न बिगाड़ सकेगा
जीवन में सफल हो पाएंगे|

ऋता शेखर ‘’मधु”

सोमवार, 4 जून 2012

स्वतंत्र राष्ट्र के परतंत्र बच्चे


बाल श्रम
वर्तमान का दरवाजा खोल
निकलता है भविष्य सुनहरा
कैसे निकल पाए भविष्य
लगा हो जब वर्तमान पर पहरा|
जिस बचपन को होना था
ममता की धार से सिंचित
क्यों वह हो रहा है
प्यार की बौछार से वंचित|
उत्साह उमंगों सपनों का
जीवित पुँज है बालक
मजदूरी की बेदी पर क्यों
होम कर देते उनके पालक|
बालकों में निहित होती
सफल राष्ट्र की संभावना
बाल श्रम से यह मिट जाती
कैसी है यह विडम्बना|
असमय छिन जाता है बचपन
बालश्रम है मानवाधिकारों का हनन|
ऐसा हर वो कार्य
बालश्रम की परिधि में आते हैं,
जो बच्चों के बौद्धिक मानसिक
शैक्षिक नैतिक विकास में
बाधक बन जाते हैं|
कहीं लालच कहीं है मजबूरी
करना पड़ता बालकों को मजदूरी|

जिस उम्र को करनी थी पढ़ाई
कारखानों में बुनते कालीन चटाई|
बचपन उनका झुलस जाता
ईंट  के  भट्टों  में
श्वास जहरीली हो जाती
बारूद के पटाख़ों में|
जिन मासूमों का होना था पोषण
खरीद उन्हें होता है शोषण|
होना था जिस पीठ पर बस्ता
कूड़े के ढेर से वह
काँच लोहे प्लास्टिक बीनता|
छोटे कंधों पर बड़े बोझ हैं
घरेलू कामों में लगे रोज हैं|

बाल मन है बड़ा ही कोमल
वह भी सपने संजोता है
सुन मालिकों की लानत झिड़की
मन ही मन वह रोता है|
अक्ल बुद्धि उम्र के कच्चे
स्वतंत्र राष्ट्र के परतंत्र बच्चे
जहाँ होती उनकी दुर्गति
वह राष्ट्र करे कैसे प्रगति|
बाल श्रम उन्मूलन दिवस
वर्ष में एक दिन आता है
हर दिन का जो बने प्रयास
दूर हो यह सामाजिक अभिशाप|

  ऋता शेखर मधु