खाने की मेज पर
थालियाँ लगी थीं
सजे थे उनमें
भाँति भाँति के व्यंजन
चावल पड़े थे
दो-एक रोटियाँ भी
कटोरी भर दाल
हरी सब्जियाँ भी
मनभावन रायता
चटपटे अचार भी
पापड़ सलाद
थोड़ी ‘स्वीट
डिश’ भी
ये सारे खाद्य पदार्थ
पेट में जाने थे
अकेला पेट
इतने सारे क्लिष्ट भोजन
इन्हें रक्त में समाना था
इसलिए विरल को सरल बनाना था
ठोस को तरल सा बहाना था
हमारा मन भी तो
पेट जैसा ही है
वहाँ भी परोसे जाते
भाँति भाँति प्रकार की
संवेदनाएँ
कड़वे या मीठे बोल
मार्मिक या मनभावन दृष्य
कठोर या स्नेहिल स्पर्श
पर ये मन
क्यूँ आत्मसात् नहीं कर पाता
क्लिष्ट संवेदनाएँ
पेट की तरह
क्यूँ हम नहीं बना पाते इन्हें
इतना सरल तरल कि
ये मन पर भार न छोड़ें
क्या मन का मेटाबॉलिज्म इतना कमजोर है ?
ऋता शेखर ‘मधु’