चाँद कलश
संजो के रखता
ढेर सारे सिक्के
रुपहले
चाँदी के सिक्के
छोटे सिक्के
बड़े सिक्के
छोटे सिक्के
बड़े सिक्के
सूरज के भय से
दिन में
नहीं दिखाता
किसी को भी
वे सिक्के !
ज्यूँ रात होती
उलट देता है
अपना रुपहला कलश
बिखर जाते हैं
सारे ही सिक्के
आसमाँ के फ़र्श पर
अगणित
चमचम करते
सारे सिक्के
सबको लुभाते !
गिनते हुए
गिनते हुए
कभी कोई सिक्का
छिटक जाता
गिरने लगता
जमीं पर
हम यहाँ भी
बाज नहीं आते
झट उस सिक्के को
टूटा सितारा कह
एक ‘विश’ खरीद लेते|
ऋता शेखर ‘मधु’