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गुरुवार, 8 सितंबर 2011

चटपटी

चाट चटपटी



दो  चीजें  सबको  हैं  भाती
चटपटी बात और चटपटी चाट
बात चटपटी अच्छी है लगती
पर वार वो तीखा भी  करती
चाट चटपटी जिह्वा को जँचती
तीखी होती  आँखों से बहती|

गोल-गोल  काबुली के दाने
आलू-टिक्की पर सज जाते
उसपर खट्टी-मीठी  इमली
फ़ैल-फै़ल  सबको  ललचाते
दही भी उसपर बहता रहता
चाट मसाला आने को कहता
लाल मिर्च की  बुकनी छींट
हरी मिर्च  भी  गाती  गीत
हल्दीराम के सेव  छिड़क दो
कटे केले की  परत जमा दो
पात धनिया उसपर सजा दो|

इस  चाट  की  कोई  सानी नहीं
खाकर जानो, बात ये बेमानी नहीं|

कई घंटे मुँह में बसी रहती
तीखी चटपटी बातें अक्सर
दिल  में  ज्यों फ़ँसी रहती
एक तीखी लगती जिह्वा को
एक तीखी लगती हृदय को
फिर भी  मन  क्यों भागता
इन चटपटों के ही पीछे-पीछे|

              ऋता शेखर मधु