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रविवार, 11 दिसंबर 2011

आज का दर्द



आज का दर्द

दो पीढ़ियों के बीच दबा
कराह रहा है आज
पुरानी पीढ़ी है भूत का कल
नई पीढ़ी है भविष्य का कल
दोनों कल मिल
आज पर गिरा रहा है गाज़|

भूत का कल झुके नहीं
भविष्य का कल रुके नहीं
दोनों का निशाना
बन गया है आज|

ना मानो तो बुज़ुर्ग रुठते
लगाम कसो औलाद भड़कते,
क्या करुं कि सब हंसे
हाथ पर हाथ धरे
सोंच रहा है आज|

भावनात्मक अत्याचार करते वृद्ध
घायल हो रहा है आज|
इमोशनल अत्याचार से
स्वयं को बचा रहा भविष्य का कल|
मेरा क्या होगा
भविष्य अपना सोच सोच
घबड़ा रहा है आज|

पुरानी पीढ़ी मानती नही
नई पीढ़ी समझती नहीं
दोनों के बीच समझने का ठेका
उठा रहा है आज|

पुराना कल बोले
मेरी किसी को चिन्ता नहीं
नया कल बोले
मेरी कोई सुनता नहीं
सुन सुन ये शिकवे, कान अपने
सहला रहा है आज|

दोनों पीढ़ी नदी के दो किनारे
बीच की धारा है आज|
कभी इस किनारे
कभी उस किनारे
टकरा टकरा
बह रहा है आज|

भूत और भविष्य का कल
तराजू के पलड़ों पर विराजमान
बीच की सूई बन
संतुलन बना रहा है वर्तमान|
दोनों कल चक्की के दो पाट
उनके बीच पिसते स्वयं को
साबूत बचा रहा है आज|

रुढ़िवादी है पुराना कल
है वह झील का ठहरा जल
आधुनिक है नया कल
है वह नदी का बहता जल
कभी झील में कभी नदी में
मौन रह, पतवार संभाल रहा है आज|

परम्परा मानता जर्जर कल
बदलाव चाहता प्रस्फुटित कल
दोनों के बीच चुपचाप
सामंजस्य बैठा रहा है आज|

कल और कल का
कहर सह सह
टूट न जाना आज|
धैर्य का बाँध टूटा अगर
बह जाएँगे दोनों कल|

कल और कल की रस्साकशी में
मंदराचल पर्वत
बन जाओ तुम आज
कई अच्छी बातें उपर आएँगी
बीते कल का प्यार बनोगे
आगामी कल का सम्मान|
 ऋता शेखर मधु