कवि बनोगे कैसे!.
प्यार होगा नहीं
रस बरसेंगे कैसे!
पैर फिसलेंगे नहीं
सँभलना सीखोगे कैसे!
दिल दुखेगा नहीं
सावन टपकेंगे कैसे!
खुशियाँ मिलेंगी नहीं
बसंत हसेंगे कैसे!
माँ बनोगी नहीं
धरा कहलाओगी कैसे!
पिता बनोगे नहीं
आकाश समझोगे कैसे!
जुदाई होगी नहीं
दिल तड़पेंगे कैसे!
मिलन होगा नहीं
एहसास जगेंगे कैसे!
ताने मिलेंगे नहीं
‘आह’ निकलेगी कैसे|
सौन्दर्य दिखेगा नहीं
‘वाह’ बोलोगे कैसे!
अभाव मिलेंगे नहीं
चाह आएगी कैसे!
मदद मिलेगी नहीं
एहसान जतेंगे कैसे!
मदद करोगे नहीं
कृतज्ञता पाओगे कैसे!
भव-सागर में तैरोगे नहीं
किनारा मिलेगा कैसे!
सपने देखोगे नहीं
शिखर पाओगे कैसे!
ये बातें हों नहीं
भावना जगेगी कैसे!
भावना जगे नहीं
लेखनी चलेगी कैसे!
बोलो, कवि बनोगे कैसे!!!
ऋता शेखर ‘मधु’