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गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

महिला दिवस विशेष १- भारतीय सिनेमा के निर्माण में महिलाओं की भूमिकाएँ

 भारतीय सिनेमा के निर्माण में महिलाओं की पार्श्व भूमिकाएँ – ऋता शेखर ‘मधु’

सिनेमा को सबसे लोकप्रिय कला माध्यम के रूप में देखा जाता है।

एक वक्त था जब भारतीय सिनेमा में महिलाओं को फिल्मों में काम करना या फिर पर्दे पर

महिलाओं का दिखना अच्छा नहीं समझा जाता था लेकिन आज महिलाएं न सिर्फ फिल्मों में किरदार

निभा रही हैं बल्कि फिल्मों में निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखन, गीतकार, संगीतकार का भी काम

कर रही हैं।

इस आलेख में सिनेमा के निर्माण में पर्दे के पीछे से सहयोग देने वाली महिलाओं की चर्चा करेंगे|

१.निर्माता,निर्देशक,पटकथा लेखन २.गीतकार एवं ३.संगीतकार

१. निर्माता, निर्देशक एवं पटकथा लेखक के रूप में महिला

१.फातिमा बेगम

फातिमा बेगम का जन्म 1892 में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था।

फातिमा बेगम पहली महिला फ़िल्म निर्देशक बनीं जिन्होंने रूढ़िवादी विचारों को तोड़कर इस दुनिया में

कदम रखा था और सिनेमा जगत को नया आयाम देने का काम किया। फातिमा बेगम न सिर्फ

भारत की पहली फिल्म निर्देशक हैं बल्कि अपने दौर की प्रसिद्ध अभिनेत्री भी रही हैं। उन्होंने पटकथा

लेखक के तौर पर भी काम किया है।

1926 में पहली बार फातिमा ने ‘बुलबुल-ए-परिस्तान’ नामक फिल्म का निर्देशन किया था और सिनेमा

में निर्देशन करने वाली पहली महिला बनने का भी खिताब जीता। 1926 में इस फ़िल्म का निर्देशन

करने के बाद फातिमा को काफी कुछ झेलना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और 1928 में

फिल्म रांझा, 1929 में फिल्म शकुंतला का निर्देशन किया।

२.जोया अख्तर

जोया अख्तर एक भारतीय फिल्म निर्देशक-लेखक हैं। जोया अख्तर बहुत ही कम समय में अपनी

कड़ी मेहनत से बॉलीवुड के सफल निर्देशकों में शुमार हो चुकीं हैं।

जोया का जन्म 14 अक्टूबर 1972 को मुंबई में जावेद अख्तर के घर में हुआ था। जावेद अख्तर

बॉलीवुड के मशहूर लेखक,कवि हैं। इनकी माँ का नाम हनी ईरानी है, जोकि एक बॉलीवुड अभिनेत्री

है।

जोया की पहली निर्देशित फिल्म ‘लक बाय चांस’ थी, जिसे दर्शकों और आलोचकों नें काफी सराहा था।

फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की| ज़ोया को पहचान फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दुबारा’

से मिली। ज़ोया को इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर के बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड से भी सम्मानित

किया गया।

उनकी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं- दिल धड़कने दो, ज़िंदगी मिलेगी ना दुबारा, लक बाय चांस, बॉम्बे टॉकीज,

तलाश।

३. रीमा कागती

रीमा कागती भारतीय फिल्म निर्देशक और स्क्रीनराइटर हैं। रीमा ने हिंदी सिनेमा में बतौर निर्देशक

फिल्म ‘हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड’ से डेब्यू किया था।


रीमा कागती का जन्म गुवाहटी, असम में हुआ था। उन्होंने मुंबई स्थित सोफिया कॉलेज से इंग्लिश

लिट्रेचेर में स्नातक की डिग्री हासिल की है। साथ ही उन्होंने सोफिया कॉलेज से ही सोशल

कम्युनिकेशन में परा-स्नातक की डिग्री ली है।

रीमा कागती ने अपने करियर की शुरुआत बतौर सहायक निर्देशक की| इस दौरान उन्होंने हिंदी

सिनेमा के कई दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया, जिसमे फरहान अखतर(दिल चाहता है), आशुतोष

गोविरकर (लगान)हनी इरानी (अरमान), मीरा नायर (वैनिटी फेयर) शामिल हैं।

रीमा ने हिंदी सिनेमा में बतौर फिल्म निर्देशक अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2006 में फिल्म

‘हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड’ से की। इसके बाद रीमा ने फिल्म ‘तलाश’ निर्देशित की| फिल्म

बॉक्स-ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई थी। वर्ष 2016 में रीमा ने फिल्म ‘गोल्ड’ पर काम करना शुरू

किया। जोया अख्तर और रीमा कागती ने मशहूर कॉमिक बुक पर आधारित नई फिल्म 'द आर्चीज' को

भारतीय दर्शकों के हिसाब से बनाया है और पर्यावरण को भी इसमें शामिल किया है। इस फिल्म के

अलावा रीमा कागती ने जोया अख्तर के साथ मिलकर फिल्म रोड ट्रिप पर आधरित फिल्म ;जी ले

जरा; लिखी है।

४. मेघना गुलजार

आज के समय की एक और उल्लेखनीय नाम मेघना गुलजार का है जो फिल्म निर्माता, निर्देशक एवं

पटकथा लेखक हैं| मेघना गुलजार का जन्म 13 दिसम्बर 1973 को मुंबई में हुआ था। वह हिंदी सिनेमा

के मशहूर संगीतकार-गीतकार गुलजार और अभिनेत्री राखी गुलजार की बेटी हैं। उन्होंने हिंदी फिल्म

इंडस्ट्री में अपने करियर की शुरुआत 1999 में 'हू तू तू'  नाम की फिल्म से की थी। उन्होंने फिल्म के

लिए पटकथा लिखी। इसके बाद कई फिल्मों का निर्देशन किया| 2015 में ;तलवार; और 2018 में

;राज़ी; जैसी फिल्मों से सफलता मिली। ;राज़ी; ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता

और मेघना को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला। मेघना गुलज़ार अपनी फिल्मों के विषय चयन

और भावनात्मक पहलू के लिए जानी जाती हैं। उनकी 2002 की फिल्म ;फिलहाल; में सरोगेसी के बारे

में बात की गई थी जो उस समय काफी साहसिक विकल्प था। फिल्म ;तलवार; से आरुषि तलवार

हत्याकांड को संबोधित किया। ;छपाक; नामक फिल्म पर काम किया जो एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी

अग्रवाल के जीवन पर आधारित एक जीवनी फिल्म है।

पांच साल के लम्बे अंतराल के बाद उन्होंने फिल्म ‘जस्ट मैरिड’ और ‘दस कहानियाँ’ निर्देशित की। दोनों ही फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर ठीक-ठाक व्यापार किया था।

५. गौरी शिंदे

गौरी शिंदे आज के समय की एक और प्रमुख फिल्म निर्माता हैं, जो 'जीवन का हिस्सा' फिल्में बनाने

के लिए जानी जाती हैं, जो दर्शकों के दिल में एक संदेश, आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान छोड़

जाती हैं। उन्होंने 2012 में दिल छू लेने वाली फिल्म 'इंग्लिश विंग्लिश' से अपनी शुरुआत की, जिसने

व्यावहारिक रूप से सभी पुरस्कार जीते। यह एक महिला द्वारा अपनी असुरक्षाओं पर काबू पाने और

अपनी एक पहचान बनाने के बारे में थी जिसे उसने अपनी माँ को समर्पित किया था। शिंदे की यह

फिल्म आलोचकों दर्शकों सबको बेहद पसंद आई, साथ ही यह फिल्म टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में भी

दिखाई गयी। शिंदे को उनकी इस फिल्म के लिए झोली भर अवार्ड्स भी मिले। उन्हें इस फिल्म के

लिए फिल्मफेयर बेस्ट डेब्यू आवर्ड से भी सम्मानित किया गया| इसके बाद उन्होंने एक और अद्भुत

फिल्म ;डियर जिंदगी; बनाई| इस फिल्म ने करियर-उन्मुख, शहरी महिलाओं द्वारा सामना किए जाने

वाले मुद्दों को संबोधित किया। गौरी शिंदे ने नारीवाद और शहरीवाद के साथ मानसिक स्वास्थ्य और

भावनात्मक मुद्दों को संभाला और एक शानदार फिल्म बनाई जिसे व्यावसायिक और समीक्षकों

द्वारा खूब सराहा गया।

उनकी शार्ट फिल्म ‘ओह मैन’ (2001) को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल के दौरान स्क्रीनिंग के लिए चुनी

गयी थी।

६. मीरा नायर

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली मीरा भारतीय समाज में गहरे तक पैठी हुई खोखली

मान्यताओं पर फिल्म बनाने के लिए जानी जाती हैं. उनकी फिल्में द नेमसेक, मॉनसून वेडिंग और

सलाम बॉम्बे आज भी एक जरूरी फिल्म के तौर पर देखी जाती हैं. उनकी ये फिल्में 'बाफ्टा' और

'गोल्डन ग्लोब' जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स के लिए भी नामित हो चुकी हैं.

७. कोंकणा सेन शर्मा

पहले से ही एक शानदार अभिनेत्री और अपनी पसंद से कुछ न कुछ कहने वाली अदाकारा के रूप में

जानी जाने वाली कोंकणा सेन शर्मा ने निर्देशक की भूमिका भी निभा ली है। उन्होंने 2006 में एक

बंगाली फिल्म से निर्देशन की शुरुआत की और 2017 में हिंदी फिल्म ;ए डेथ इन द गुंज; बनाई। इस

फिल्म को कई अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में प्रदर्शित किया गया और सर्वश्रेष्ठ फिल्म के साथ-साथ

सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के रूप में कई पुरस्कार जीते।

आगे भी कई नाम हैं जिनमें दीपा मेहता, जद्दन बाई, किरण राव, सई परांजपे, अरुणा राजे, शोभना

समर्थ, माधुरी दीक्षित, दुर्गा खोटे, कल्पना लाजमी, श्रीदेवी, नंदिता दास, दुर्गा खोटे, ज्योति देशपांडे

आदि प्रमुख हैं|

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2] महिला गीतकार


बॉलीवुड की टॉप 10 महिला गीतकारों में 1. कौसर मुनीर 2. अनविता दत्त 3. रानी मल्लिक 4. माया

गोविन्द 5. प्रिया सरिया 6. रश्मी सिंह 7. गरिमा वहल 8. अभिरुचि चाँद 9. सीमा सैनी 10. प्रभा

ठाकुर हैं|

इनके अतिरिक्त अमृता प्रीतम, इंदु जैन, हेमा सरदेसाई, इला अरुण, हार्ड कौर, स्नेहा खानवलकर, पद्मा

सचदेव, श्रुति पाठक को भी बॉलीवुड की गीतकार महिलाओं में गिना जा सकता है। इन सबके के बीच

माया गोविंद का नाम उल्लेखनीय है|

माया गोविंद

बतौर गीतकार माया गोविंद का करियर 1972 में शुरू हुआ । उन्होंने फिल्म ‘आरोप’ के गाने लिखे।

इस फिल्म से उनका गाना ‘नैनों में दर्पण है’ बहुत चर्चित हुआ। यहां से माया का फिल्मों में गाने

लिखने का काम शुरू हुआ। उन्होंने अपने करियर में 350 फिल्मों के लिए 750 से ज़्यादा गाने लिखे।

इसमें ‘आंखों में बसे हो तुम’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ फिल्म का टाइटल ट्रैक, हम तुम्हारे हैं सनम

फिल्म का ‘गले में लाल टाई’, शीशा फिल्म का ‘यार को मैंने मुझे यार ने’ जैसे गाने शामिल हैं। जब

समय के साथ संगीत बदलने लगा तब भी माया ने पॉपुलर सिंगर फाल्गुनी के गाने ‘मैंने पायल है

छनकाई’ के बोल लिखे, जो कि बहुत बड़ा हिट गाना साबित हुआ। आरोप फ़िल्म का गीत, नैनों में

दर्पण है, को लोगों ने बहुत पसंद किया|

दूरदर्शन पर प्रसारित हुए धारावाहिक ‘महाभारत’ के लिए उन्होंने काफी गीत, दोहे और छंद लिखे।

इसके अलावा ‘विष्णु पुराण’, ‘किस्मत’, ‘द्रौपदी’, ‘आप बीती’ आदि उनके चर्चित धारावाहिक रहे।

सैटेलाइट चैनलों के दौर में भी माया गोविंद के लिखे शीर्षक गीतों की खूब धूम रही।

3] महिला संगीतकार

१. इशरत सुल्ताना

इशरत सुल्ताना का नाम बिब्बो के नाम से प्रसिद्द है। वह भारतीय फिल्म इतिहास में महिला

संगीतकारों की पहली खेप में थीं । उन्होंने भारत की स्वतंन्त्रता से पहले 1934 में फिल्म ;अदल ए

जहांगीर; फिल्म में संगीत दिया था, जोकि बॉलीवुड की प्रसिद्द अभिनेत्री नरगिस की माताजी

जद्दनबाई के भी संगीत देने के एक साल पहले की बात है। इशरत सुल्ताना ने इसके अलावा ;कागज

की लड़की; जोकि 1937 में आई थी। उसके गानों को भी संगीतबद्ध किया था।

२.जद्दनबाई

भारतीय फिल्मों में जद्दनबाई का नाम बहुत ऊँचा है। वह भारत के सिनेमा जगत तकनीकी रूप से

पहली संगीतकार थीं। उन्होंने 1935 में 'तलाशे हक' में संगीत दिया था। उन्होंने संगीत की शिक्षा

कोलकाता के श्रीमंत गणपत राव से ली थी। इसके बाद उन्होंने 1936 में आई फिल्म 'मैडम फैशन' में

न सिर्फ काम किया बल्कि उन्होंने फिल्म के लिए संगीत देने के साथ साथ उसका निर्देशन भी किया।

३. सरस्वती देवी

पारसी परिवार में जन्मी और उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ के कुछ संगीतकारों के साथ काम कर रहीं

सरस्वती बाई ने सबसे पहले अछूत कन्या के लिए ‘ मैं बन की चिड़िया ...’ गाना कम्पोज़ किया था।

४. उषा खन्ना

उषा खन्ना भारतीय फिल्म इंडस्टी की ऐसी महिला संगीकार हैं, जिनके काम को लोग कभी नहीं भूल

सकते। उनके लोकप्रिय गानों में ;छोड़ो कल की बातें;,शायद मेरी शादी का ख्याल;ज़िंदगी प्यार का

गीत है; और ;आप तो ऐसे न थे’ जैसे हिट शामिल हैं। उन्होंने 1940 में पहली बार फिल्म;दिल दे के

देखों; में संगीत दिया था, जिसमें आशा पारेख ने काम किया था और यह उनकी डेब्यू फिल्म थी और

इस फिल्म के कारण वह सुपरहिट हो गयी थी। उन्होंने करीब 40 वर्षों तक सक्रिय तौर पर गाने

बनाये। उषा खन्ना ने हवस, दिल देके देखों, साजन की सहेली और आप तो ऐसे न थे जैसी फिल्मों में

बेहतरीन संगीत दिया।

५. लता मंगेश्कर बनाम आनंद घन

लता जी ने सिर्फ गाने ही नहीं गाये बल्कि फिल्मों में और ख़ासकर मराठी फिल्मों में संगीत

दिया। उन्होंने संगीतकार के रूप में अपना असली नाम न देकर आनंद घन के नाम का

इस्तेमाल किया। लता मगेशकर ने पहली बार सन 1955 में मराठी फिल्म 'राम-राम पाऊंण'

में संगीत दिया था। जिसके बाद उन्होंने 1963 में 'मराठा टिटुका मेळावा', 1963 में 'मोत्यांची

मंजुला', 1965 में 'साधी माणसे' 1969 में उन्होंने 'ताम्बाडी माती' जैसी फिल्मों में भी संगीत

दिया है। उन्हें 1965 में आई फिल्म 'साधी माणसे' के लिए महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें बेस्ट

म्यूजिक डायरेक्टर का सम्मान दिया था। उनका संगीतबद्ध किया एक गाना ‘ऐरणीच्या देवा

तुला...’ बहुत लोकप्रिय भी हुआ है।

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शनिवार, 20 जून 2020

आत्महत्या लाँग ड्राइव नहीं कि सोचा और निकल लिये


सर्दियों में बढ़ जाता है अवसाद का ...
आत्महत्या...क्या स्वयं को खत्म कर लेने वाला ही जिम्मेवार या कोई और भी है जिम्मेवार?

आत्महत्या को कायरता कहकर आत्महत्या के कारणों को नज़रअंदाज कर देना बड़ी भूल है| 
एक होती है शरीर की हत्या जिसके लिए मारने वाले को अपराधी घोषित किया जाता है| उससे भी भयंकर होती है किसी के मन की हत्या कर देना| शरीर की हत्या के लिए उपयोग में लाए गये हथियार दिखते हैं किंतु  आत्महत्या के लिये मजबूर करने वाले अपराधियों के शब्द- बाण किसी को नहीं दिखते| उनका आहत करने वाला व्यवहार परदे की ओट में चला जाता है|
जन्म लेने वाले हर इंसान के लिए ज़िन्दगी खूबसूरत होती है| वह भी खिलखिलाना चाहता है, बादलों को देखकर नाचना चाहता है| कोई शारीरिक रूप से अक्षम होता है फिर भी वह खुश रहता है| फिर ऐसा क्या हो जाता है कि मनुष्य  स्वयं की हत्या कर देता है| कभी- कभी कहना बहुत आसान होता है कि परिस्थिति का डटकर मुकाबला करना चाहिए,किसी को क्या पता कि वह इंसान मुकाबला कर रहा  होता है फिर भी वह हार जाता है| 
कहा जाता है कि ईश्वर एक रास्ता बंद करते हैं तो दस रास्ते खोल देते हैं| यह सही भी है | फिर भी उस स्थिति की कल्पना  की जा सकती है कि खुद को खत्म करने से पहले वह इंसान खुद कितनी मानसिक प्रताड़ना से गुजरा होगा| मैं तो मानसिक विक्षिप्तता को भी हत्या की श्रेणी में ही रखती हूँ| वह साँस ले रहा है इसका अर्थ यह नहीं कि वह जिन्दा है| वैसे रोगियों का भी पास्ट टटोलकर देखना चाहिए तब पता चलेगा कि उसके मस्तिष्क पर असंख्य विषबुझे बाण चुभे होते हैं जो  उसने  निकालने की कोशिश भी अवश्य की होगी...विक्षिप्त होने से पहले|
प्रताड़ना...स्त्री विमर्ष का हिस्सा भी है| विवाह एक जुआ है| जो जीत गया वो जीत गया...जो न जीत पाया वह तिल तिल कर मरता रहा| साथ ही समाज की प्रताड़ना भी सहता रहा कि निभाने में ही भलाई है| हद से अधिक जाकर निभाने की कोशिश भी की जाती है, फिर भी इसका चरम क्या हो सकता है...आत्महत्या, घर का परित्याग या मानसिक रोग...और ये तीनों स्थितियाँ हत्या ही हैं जिसके लिए जिम्मेवार व्यक्ति की खोज अवश्य की जानी चाहिए| इसके शिकार पुरुष भी हो सकते हैं|
पारिवारिक स्थिति के बाद सामाजिक स्थिति पर विचार करें तों अड़ोस पड़ोस की प्रताड़ना, किसी लड़की को बाहर निकलने से भी खौफ़ देने वाले गुंडों की फौज, स्कूल कॉलेज में होने वाले रैगिंग कई बार आत्महत्या के कारण बन जाते हैं| इन सबके उदाहरण भी हम सभी के आस पास ही मौजूद हैं पर किसी घटना के विस्तार में  जाना इस पोस्ट का मकसद नहीं|
उसके बाद नौकरी में प्रतिद्वंदिता और प्रताड़ना के कारण भी आत्महत्या के मामले आते हैं| आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले बच्चे भी बहुुत दवाब में रहते हैं| कहने को कोरोनाकाल में वर्क फ्रॉम होम हो रहा..किंतु काम बहुत अधिक लिया जा रहा| विदेशी कंपनियाँ स्वयं रात्रि का समय बचाकर रात के ग्यारह बारह बजे भारतीय कर्मचारियों के साथ मीटिंग रखते हैं|
पोस्ट क्यों लिखी जा रही यह तो समझ ही गये होंगे| अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या  जहाँ फिल्मी दुनिया के कई राज सामने ला रहा उससे अधिक अभिभावकों के मन में भय पैदा कर रहा| जिन बच्चों को माता- पिता अपना सर्वस्व देकर जिन्दगी जीने लायक बनाते हैं वह बच्चा किस मानसिक दबाव में जी रहा, शायद कभी कभी जान भी नहीं पाते| ऐसे में सुशांत की मौत पर उनके साथ इस विषय पर बात करने से भी अभिभावक डर रहे| प्रतिस्पर्धा की दुनिया में नौकरी न पाना, पा लिया तो टिक न पाना, टिक गये तो दबाव में जीना...यह सब क्या है, यह विचारणीय है| कब किसके मन पर नकारात्मकता हावी हो जाए यह कहना मुश्किल है| ऐसे में कोई सुनने वाला हो, यह सबसे जरूरी है| सुशांत के मामले में मैं समझ पा रही हूँ कि माँ का न होना भी कारण बन सकता है| माँ रहतीं तो वह अपने दबाव उनसे साझा कर सकते थे| 
ःः मेरी यह पोस्ट आत्महत्या या नकारात्मकता को बढ़ावा नहीं दे रही...किन्तु यह जरूर कहना चाहती हूँ कि इसे सिर्फ कायरता कहकर किसी भी प्रताड़ना की अनदेखी न की जाए |

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

सेल्फ़ डिपेंडेंट

सेल्फ़ डिपेंडेंट...अर्थात आत्मनिर्भर होना|
परावलंबन का संबंध अधिकतर स्त्रियों और सेवक वर्ग से जुड़ा होता है|
इस सेल्फ़ डिपेंडेंट की रेंज क्या है, इसे कोरोना काल ने सुस्पष्ट कर दिया है| 
सेल्फ़ डिपेंडेंट...कब कब ?
१.शारीरिक रूप से
२.आर्थिक रूप से
३.मानसिक रूप से 
४.सामाजिक रूप से
५...................
१.शारीरिक रूप से सेल्फ डिपेंडेंट रहने की कामना बुजुर्गों में होती हैं| वे चाहते हैं कि अपनी रोजमर्रा का काम वे खुद कर पाएँ| उनको किसी को आवाज न लगानी पड़े|| उन्हें अक्सर यह बोलते हुए सुना जा सकता , "भगवान हमें चलते फिरते उठा लेना|" 
शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति भी अपना काम खुद करना पसंद करते हैं और किसी की मदद कम से कम लेना चाहते हैं|
२.आर्थिक रूप से सेल्फ़ डिपेंडेंट होने की कामना युवा वर्ग को  होती है| एक निश्चित उम्र के बाद आर्थिक डिपेंडेंसी उन्हें खलने लगती है| इसे लड़कियों के मामले में भी खूब प्रयोग में लाया जाता है| पहले लड़कियों के लिए सिर्फ़ पढ़ना लिखना जरूरी समझा जाता था| किन्तु उनकी दुर्दशा देखकर धीरे धीरे किसी नौकरी या व्यवसाय से जुड़कर उन्होंने  आर्थिक रूप से खुद को सेल्फ़ डिपेंडेंट बनाया| हालांकि अभी भी प्रतिशत बहुत अधिक नहीं है फिर भी कोशिशें निरंतर जारी हैं|
वृद्धों को पेंशन मिलना भीआर्थिक सेल्फ डिपेंडेंट होना है|
३. मानसिक रूप से सेल्फ डिपेंडेंट होने का अर्थ है निर्णय लेने की क्षमता होना|पर किसी कारण से यह डिपेंडेंसी भी झेलनी पड़ती है|
४. सामाजिक रूप से सेल्फ डिपेंडेंट होने में आप सामाजिक कार्यों में बिना किसी हस्तक्षेप के अपना योगदान दे सकते हैं| यह सोचने और अवलोकन की बात है कि क्या हम सभी इस मामले में स्वतंत्र हैं|

अब बात करते हैं कोरोना काल की जिसने नए सेल्फ डिपेंडेंट को जन्म दिया है|...उसके पहले सामाजिक सोच के कुछ उदाहरण देती हूँ|
दृष्य १
"किरण, लड़का बाहर जा रहा, उसे कुछ सिखा दे ताकि वक्त बेवक्त खुद बना कर खा सके"
अरे क्या बुआ, मैं तो कुछ नहीं सीखने वाला| अब किस चीज की कमी है बाजार में, ऑनलाइन मँगाओ और खाओ|""
"हाँ दीदी, ये ठीक कह रहा| यहाँ तो कभी किसी ने खाना भी खुद निकाल कर न खाया है|"
दृष्य २
"बिटिया, पढ़ाई लिखाई के कारण रसोई का काम नहीं सीख सकी| अब नौकरी पर जा रही| कुछ तो पकाना सीख ले|"
"क्या चाची, कमाएँगे, कुक रखेंगे और मस्ती से रहेंगे|"
" बिटिया, बेला बखत कोई नहीं जानता| कभी खुद बनाना पड़े तो| "

कहने का अर्थ यह रहा कि रसोई युवा पीढ़ी के लिए कोई आवश्यक जगह नहीं जबकि रसोई न हो तो दुनिया टिकेगी कैसे|
कल दिल्ली में एक पिज्जा डिलिवरी बॉय का कोरोना पॉजिटिव पाया जाना दिल्ली में हड़कंप मचा गया| उसने सत्तर घरों में पिज्ज़ा दिया था| 
अब सोचने वाली बात यह है कि लोग इतने लापरवाह कैसे हो गये| जब पूरी दुनिया में सोशल डिस्टेंसिंग की बात हो रही, बाहर से सामान लेने पर भी पाबंदी है| बाहर से आने वाले पैकेट और सब्जियाँ सभी एहतियात से धोकर प्रयोग कर रहे, ऐसे समय में यह ऑर्डर कैसे प्लेस किया गया और लोग भी किस प्रकार हिम्मत कर पाए|
कल फेसबुक पर एक पोस्ट में मैंने यही बात पूछी तो यह बात सामने आई कि जो बच्चे घर नहीं जा पाए ्उन्होंने मजबूरी में पिज्जा मँगवाया होगा| इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता | 
तो क्या वे बच्चे सेल्फ डिपेंडेंट नहीं थे|
जवाब यही हो सकता है ...कि नहीं थे| उन्होंने कभी यह विचार भी नहीं किया होगा कि कभी इस तरह की नौबत आ सकती है वरना  इंडक्शन या बॉयलर तो रख ही सकते थे| पिज्जा मँगवाने वाले इन सब चीजों को एफोर्ड भी कर सकते हैं|
सेल्फ डिपेंडेंसी में यहीं पर मात खा जाएँगे बच्चे यदि आरम्भ से ही पढ़ाई के साथ साथ उनसे रसोई के हल्के फुल्के काम करवाने की ट्रेनिंग न दी जाए| कोरोना ने बता दिया कि अब वैसी रईसी का महत्व नहीं जो काम न करना जाने| साधारण सी खिचड़ी न बना सकें, एक रोटी न बना सकें|
वो माएँ जो बेटे-बेटी से थोड़ा भी काम करने को प्रेरित नहीं कर पातीं उनको भी सोचना होगा|
५ अब सेल्फ डिपेंडेंट होना है रसोई में...कोरोना हमेशा नहीं रहने वाला...पर जब भी माँ न हों घर में, पत्नी मायके गई हो तो बाहर का खाना न खाएँ| खुद बनाएँ और खाएँ|
बाहर का खाना बहुत खास समय के लिए रखें...सेल्फ डिपेंडेंट बनें|
@ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

लॉकडाउन - मोदी जी की सप्तपदी

     आज 14 अप्रैल 2020 को लॉक डाउन के 21 दिन पूरे हो चुके हैं। देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी इस भयावह कोरोना काल में हरसम्भव जनता के सम्पर्क में रहे। आज सुबह 10 बजे उन्होंने तीसरी बार जनता को सम्बोधित किया। लॉक डाउन की अवधि 3 मई तक के लिए बढ़ा दी गयी है। नियम तोड़ने वालों के लिए आगामी 20 अप्रैल तक प्रशासन बहुत सख्त रहेगा।
मोदी जी का सम्बोधन जनता में नई ऊर्जा नई शक्ति का संचार करता है इसमें कोई शक नहीं। किन्तु एक बात और भी रहती है कि जनता उनके संबोधन में हमेशा एक धमाके जैसा कुछ होने का इंतेज़ार करती है ।यह नोटबन्दी धमाका का आफ्टर इफेक्ट जैसा लगता है। इस कोरोना काल में उन्होंने ताली बजाकर सब कोरोना योद्धाओं के लिए आभार प्रकट करवाया। दूसरी बार एक दिया जलाने को कहा। जनता का भरपूर समर्थन मिला।
आज उन्होंने बहुत पते की बात कही है।
चिकित्सा क्षेत्र में भारत से कई गुना आगे रहने वाले देश भी कोरोना को काबू में न कर सके जैसा भारत ने कर दिखाया। वे सभी देश भारत सरकार की कार्यकुशलता की दाद दे रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत से हैड्रोक्लोरोक्वीन दवा निर्यात करने की मदद मांगी और भारत यहाँ भी पीछे न रहा।
भारत विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला दूसरा देश है। 130 करोड़ आबादी वाले देश में सरकार के उचित निर्णय ने कोरोना को फैलने से रोक दिया, यह वाकई विशिष्ट कार्य है।
हालांकि यह दुख की बात है कि कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा कोरोना को फैलाने का दुष्कृत्य सोचनीय रहा। इस कारण से कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर सैकड़ा से हजार और अब 10 हजार से ऊपर चली गयी।
सरकार के सामने वायरस के साथ साथ तब्लीगी जमात के लोगों से निपटने की चुनौती भी आ गयी। चार दिन पहले निहंग समूह के एक व्यक्ति ने एक पुलिस अधिकारी का हाथ काट दिया जिसे साढ़े सात घण्टों की कठिन ऑपेरशन से जोड़ दिया गया। यहाँ पर एक अच्छी बात यह रही कि सिख समुदाय ने निहंगों के कुकृत्य के लिए सोशल मीडिया पर उनकी भर्त्सना की जो तब्लीगी जमात से संबंधित समुदाय अपने समुदाय के लिए न कर सकी।
देश पर आए संकटकाल में खाद्य दवा की दुकानीं खुली रहीं। रोजमर्रा की वस्तुएं मिलती रहीं।
अब बात करते हैं आज की घोषणा के बारे में। आज मोदी जी ने सात बातें कहीं और जनता से निवेदन किया कि वे उन सबका पालन करें। इसे सप्तपदी का नाम दिया गया।ये रहे वे सप्तपदी...
मोदी जी की सप्तपदी...3 मई तक के लिए
1 बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें
2 लक्ष्मण रेखा का पालन हो
3 इम्युनिटी के लिए आयुष मंत्रालय
4 आरोग्य सेतु app रखें
5 गरीब परिवार की देखरेख
6 सहकर्मी के प्रति संवेदना
7 कोरोना योद्धाओं का सम्मान
जनता से निवेदन किया गया कि आरोग्य सेतु नामक ऐप डाउनलोड करें। जब सब लोग इस ऐप को रखेंगे तो आसपास के कोरोना संक्रमित व्यक्ति की सूचना मिल जाएगी। इससे सावधानी बरतने में आसानी हो जाएगी।
        अभी हम सभी को ३ मई तक घर में रहना है और कोरोना को मात देना है। घर में रहिये, कहानियां पढ़िए, बच्चों के साथ खेलिए, नई नई डिशेज आजमाइए। टेलिविज़न पर रामायण, महाभारत ,व्योमकेश बख़्शी ,बुनियाद, शक्तिमान, श्रीमानजी श्रीमती जी, सर्कस जैसे धारावाहिकों का पुनरप्रसारण देखिए।
आशा है की लॉक डाउन की दूसरी पारी में कोरोना पर नियंत्रण करने में सरकार के साथ जनता सफल हो जाएगी और सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।
कुछ जिलों के प्रयास सराहनीय रहे हैं।
@ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

लॉकडाउन २- एक दीया अखंड एकता के नाम

पूरे विश्व के लिए अभी बहुत कठिन दौर है| हमारा देश कोरोना वायरस के चपेट में आकर लॉकडाउन में चल रहा है| कोरोना वायरस श्वसन तंत्रिका संबंधी रोग है| यह लाइलाज तो नहीं पर बहुत ही खतरनाक है| इसका संक्रमण इतनी तेजी से फैल रहा कि महामारी का रूप धारण कर चुका है| हर तरह की यात्रा सेवा रोक दी गई है| ये संपूर्ण लॉलडाउन २४ तारीख की र्त्रि में बारह बजे से लागू किया गया है| इससे संक्रमित व्यक्ति जिस किसी के संपर्क में आता है वह संक्रमित हो जाता है| वह संक्रमित फिर जिसके संपर्क में आता है वह संक्रमित हो जाता है और पता भी नहीं चलता| लक्षण पता चलने में एक सप्ताह लगता है और ञिर पूरी तरह से ठीख हो जाने में चौदह दिन से ऊपर लग जाते हैं|
यह भारत का सौभाग्य है कि उसे प्रधानमंत्री के रूप में माननीय नरेंद्र मोदी जैसा नेता मिला है| उनके दृढ़ निर्णय से संपूर्ण देश को स्थिर कर दिया| सब घरों में कैद हो गये| किंतु सिर्फ घर में ही रहना काफी नहीं...हर आधे घंटे पर साबुन से बीस सेकेंड तक हाथों को अच्छे से धोना है| बाहर से आए दूध के पैकेट, सब्जियाँ वगैरह धोने का काम बढ़ गया| यदि बाहर लिफ्ट का इस्तेमाल करते हैं तो उस हाथ से मुँह, आँख और कान न छूएँ क्योंकि कोरोना इन्हीं रास्तों से शरीर में प्रवेश करता है|
सरकार के प्रयासों से भारत संक्रमण के तीसरे स्टेज में जाने से बच गया| इस बीच बॉलीवुड सिंगर कनिका कपूर का मामला भी सामने आया | कनिका विदेश से लौटी थीं और उन्हें चौदह दिनों तक आइसोलेशन में रहना था| उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और कई जगहों पर म्युजिक शो किए| उनकी इस लापरवाही की वजह से बहुत सारे लोग शक के घेरे में आ गए| यह पोस्ट लिखे जाने तक कनिका ठीक होकर अस्पताल से डिसचार्ज हो चुकी हैं|
 आज ६ अप्रैल तक में संक्रमित लोगों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाने के कारण देश में कई हॉट स्पॉट बन गये||
हॉट स्पॉट-- वैसे स्थानों को चिन्हित करना जहाँ एक भी कोरोना पॉजिटिव मरीज पाए गए हों|

पिछले पोस्ट में हमने मरकज के बारे में लिखा था| पन्द्रह मार्च को मरकज निजामुद्दीन में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे हुए थे| वहाँ से कई भारत के अन्य राज्यों में चले गये और बड़ी तादाद वहीं पर छुपी रह गयी| चूँकि उनकी पहचान हो गई इसलिए भारत तीसरे स्टेज में जाने से बच गया| मकरज में जुटी तब्लीगी जमात में काफी लोग संक्रमित पाए गए| उन सबको क्वरंटाइन किया गया| जो अन्य राज्यों में गये हैं उनमें कुछ की पहचान होना बाकी है| किंतु संख्या का चार हजार से ऊपर पहुँच जाना चिन्ता का विषय है|

इस बीच चार अप्रैल को मोदी जी ने एक विडियो जारी किया | उसमें उन्होंने विनती की कि देश के सभी लोग छह अप्रैल को नौ बजे रात में नौ मिनट के लिए अपने घरों के दरवाजे पर या बालकनी से प्रकाश की एकजुटता से देश में सकात्मक ऊर्जा का संचार करें| इसके लिए वे दीया, टॉर्च, मोबाइल की फ्लैश या मोमबत्ती...कुछ भी ले सकते हैं| यह दीया देश सेवा में जुटे देश सेवकों के लिए आभार होगा| यह दीया संदेश होगा कि सारे देशवासी साथ साथ हैं| प्रकाश से निराशा का तम दूर हटेगा|

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इस आहवान पर पूरा भारत दीपावली की तरह जगमगा उठा|
एकजुटता का सुन्दर समागम प्रदर्शित हुआ| कई दिनों से बंद देशवासियों के चेहरों पर मुस्कान आ गई|
ईश्वर करे कि जल्द से जल्द इस आपात स्थिति से हम बाहर निकल सकें|

इस बीच दूरदर्शन ने पुराने लोकप्रिय धारावाहिक रामायण , महाभारत, व्योमकेश बख्शी , शक्तिमान, बुनियाद, देख भाई देख का पुनः प्रसारण शुरु कर दिया है जिससे समय बिताना आसान हो गया| सूचना एवं प्रसारण मंत्री का यह कदम सराहनीय है|

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

लॉकडाउन १

कोरोना- कोई रोड पर ना निकले- लॉकडाउन १

युग बीता सदियाँ बीतीं, इतिहास गवाह है कि जब जब प्रकृति और जीवों पर अत्याचार और भ्रष्टाचार की अति हुई, विधि के विधान ने विनाश की लीला रची और जाने कितनी सभ्यताएँ काल के गर्त में समा गईं| रामायण काल, महाभारत काल, सिंधु घाटी की सभ्यता, मिस्र की सभ्यता, हड़प्पा मोहनजोदाड़ों आदि ने स्वयं को प्राचीन इतिहास में कैद कर लिया|

आज का युग अति आधुनिक युग है| दुनिया ने विकास में बहुत तेजी दिखाई और पिछले डेढ़ सौ वर्षों में अकल्पनीय अनुसंधान एवं आविष्कार हुए| विज्ञान ने मानव सभ्यता को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया| सागर से लेकर आकाश तक मानव ने अपना अधिकार जमा लिया| रेलवे और हवाई जहाज तो पुरानी बात हो गई| प्रकृति पर कहर बनकर टूटा गगनचुम्बी इमारतों का बनना, मेट्रों का आन्| इसके लिए जाने कितने वृक्ष काट डाले गये| धरती धीरे धीरे ग्लोबल वार्मिंग की शिकार होने लगी| वायु हो या जल, सब मानव के अति महात्वाकांक्षा का शिकार होकर प्रदूषित हो गए|

अब हम बात करते हैं विश्व में विकसित देश की श्रेणी में आने वाले देश चीन की| यह तो पहले से सुनते आए थे कि वहाँ के लोग कीड़े मकोड़े, साँप बिच्छू , चमगादर वगैरह सब कुछ खा जाते हैं| अभी चूँकि व्हाट्सएप का जमाना है तो अचानक उनके बहुत सारे विडियो आने लगे जिसमें वे यह सब खाते हुए दिख रहे थे| ऐसा इसलिये हो रहा था कि दुनिया में एक नए वायरस का पदार्पण हो चुका था जो साँप और चमगादर के मेल से बने एन्जाइम के कारण बनने लगे थे| इस वायरस ने सबसे पहले चीन को अपने गिरफ्त में ले लिया| इस सूक्ष्म वायरस का नाम कोरोना था और डॉक्टर्स की भाषा में COVID 19 कहा गया| दिसम्बर में चीन में जब कोरोना के कारण प्रथम मौत हुई तो इसे छिपा लिया गया| चीन के वुहान शहर में विश्व के अन्य देशों के लोग भी थे जो संक्रमित होने लगे| जब वे वापस अपने देश लौटे तो वहाँ भी इस वायरस ने अपने पाँव फेलाने शुरू कर दिये| देखते ही देखते इटली , स्पेन, इंग्लैंड प्रभावित हो गया|इस अदृष्य महामारी से बचने के लिये उन देशों में छुट्टियाँ घोषित कर दी गईं| किंतु जागरुकता की कमी से लोग छुट्टियों का आनंद मनाने के लिये पिकनिक मनाने लगे या इधर उधर यात्रा में संलग्न हो गये जिस कारण संक्रमण बढ़ने लगा और यह बीमारी बहुत बड़ी आबादी में फैल गई| यह संक्रमण वायु से नहीं लगता, लगता है स्पर्श से| संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से , उसे छूने से हाथ संक्रमित हो जाता है| फिर वह हाथ यदि चेहरे पर लगता है तो कान, मुँह या आँख के कोनों से शरीर के अन्दर पहुँच कर गले में अटक जाता है| संक्रमण के बाद लक्षण प्रकट होने में एक से चौदह दिन लगते हैं| यह वायरस श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है| प्रथम लक्षण के तौर पर बुखार आता है और खाँसी होती है|

भारत में प्रथम रोगी केरल में ३० जनवरी को पाया गया| वह विदेश से आया था, इसलिए यह स्पष्ट है कि कोरोना वायरस हवाई जहाज के जरिए ही भारत में आया है| उसके बाद धीरे धीरे संक्रमण की संख्या बढ़ने लगी तो भारत सरकार ने इसके निवारण हेतु नियम बनाए| अब अंतर्राष्ट्रीय हवाई यात्रा करके आने वालों की जाँच हवाई अड्डा पर की जाने लगी किंतु तबतक थोड़ी देर हो चुकी थी| संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ने लगी थी| विदेश से आने वालों को आरम्भ में आइसोलेशन के लिये कहा गया|करीब दस मार्च से उन्हें कावरंटाइन में भेजा गया| वे घर तब तक नहीं जा सकते थे जब तक दस दिन पूरे नहीं हो जाते| भारत में तबतक संक्रमित व्यक्तियों की संख्या सैकड़े में चली गई थी|

COVID 19 से सुरक्षा के दौरान जो शब्द बहुतायत से प्रयोग किये गए वह हैं --

१) कोरोना- वायरस का नाम

२) हैंडवाश- हर आधे घंटे बाद हाथों को साबुन से बीस सेकेंड तक धोना

३) सेनेटाइजर- एक ऐसा तरल जो हाथों से विषाणु को खत्म करने में सहायक होता है|

४) मास्क- मुँह को ढकने वाला खास बनावट का कपड़ा

५) सोशल डिस्टेंसिंग--समाज के लोगों से दूरी बनाकर रहना

६) आइसोलेशन- विदेश से आए लोगों को अपनी जिम्मेदारी पर चौदह दिनों तक समाज से कटकर रहना

७) क्वारंटाइन- विदेश से आए लोगों को किसी सरकारी संस्था की निगरानी में चौदह दिनों तक समाज से कटकर रहना

८) कोरोना टेस्ट किट- ऐसी प्रक्रिया जिससे संक्रमण की जाँच हो सके

९) कोरोना पॉजिटिव- जिनमें संक्रमण साबित हो गया हो

१०) कोरोना नेगेटिव- जिनमें संक्रमण नहीं हो 

११) इम्युनिटी- रोग निरोधक क्षमता बढ़ाना

अब देखते हैं कि भारत में कबसे पूरी तत्परता से बचाव के कदम उठाए गये|
कोई रोड पर ना निकले'- पीएम मोदी ने ...

19 मार्च को माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की रात 8 बजे जनता से सीधी बात।

22 मार्च को कर्फ्यू घोषित किया गया। उसी दिन 5 बजे शाम को मोदी जी ने जनता से आग्रह किया कि कोरोना के विरुद्ध लड़ाई के मोर्चे पर जूट डॉक्टर्स,नर्स, सफाई कर्मचारी, दैनिक सहायक एवम पुलिस का आभार प्रकट करने के लिए शाम 5 बजे देश के सारे लो एक साथ अपने घरों की बालकोनी, दरवाजे, खिड़की, छत पर खड़े होकर ताली, थाली, घंटी, शंख बजायें और उस दिन वह अद्भुत नजारा अविस्मरणीय बन गया। सरकार विरोधी तत्वों ने यहाँ भी खिलवाड़ कर दिया और समूह में इकठ्ठे होकर ताली थाली बजाने लगे।

अगले दिन अर्थात 23 मार्च को लोग सड़कों पर निकल पड़े। कोरोना जैसे जानलेवा वायरस के प्रति सामाजिक दूरी बरतने में लोगों की कोताही देख मोदी जी व्यथित हो गए। कई राज्यों ने उसी दिन लॉक डाउन कर दिया पर लोगों को बाहर निकलने से रोक न सके।

24 मार्च को पुनः जनता के सामने 8 बजे रु ब रु होकर प्रधानमंत्री महोदय ने रात 12 बजे से 21 दिनों के लिए पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा कर दी। रेल सेवायें बन्द की गईं। हवाई यात्रा पर रोक लग गई। पूरे देश से मोदी जी ने करबद्ध प्रार्थना की कि लोग घरों से न निकलें और कोरोना को थर्ड स्टेज पर जाने से रोकें।

चारों ओर किराना का सामान और सब्जियां लेने की होड़ लग गयी जैसे नोटबन्दी के समय नोट बदलने की होड़ लगी थी।

25 मार्च की सुबह वातावरण में पूर्ण शांति थी। चिड़ियों का चहकना सुनाई पड़ रहा था। घरों में बाइयों के प्रवेश पर भी पाबन्दी लगी। नतीजा....

तभी 26 मार्च एक अनहोनी हो गयी...दिल्ली में रहने वाले विभिन्न प्रदेशों के मजदूर वर्ग अचानक बस अड्डों पर जमा होने लगे। इस तरह की भीड़ देखकर सबकी रूह काँप गयी। एक दूसरे के पास खड़े लोग न जाने कितनों को बीमार करेंगे। सब अपने घरों को लौटना चाहते थे क्योंकि कहीं मकान का किराया समस्या बन गयी और कहीं खाने के सामान का अभाव था। ये दिहाड़ी मजदूर अचानक एक जगह कैसे इकठ्ठे हो गए यह सोचने का विषय है जिसपर यहाँ चर्चा करना उचित नहीं।

किसी तरह इस समस्या को निपटाया गया और उन्हें घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई।

फिर तीन दिन थोड़ी शांति रही। संक्रमित लोगों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई। किन्तु सब कुछ इतना आसान नहीं होता है। 31 को पता चला कि मरकज़ में हजार से ऊपर लोग छुपे हुए थे जिसमें दो सौ लोगों के करीब संक्रमित थे। अब कोरोना को थर्ड स्टेज पर जाने का खतरा बढ़ गया क्योंकि बाकी लोग भारतीय ही थे और अपने प्रदेश लौटकर जाने कितनों को संक्रमित करने वाले थे। सारे लोगों को क्वारंटाइन अर्थात निगरानी के तहत रखा गया है।

--ऋता शेखर मधु

अगली पोस्ट में इस वायरस से बचने के लिए कारगर उपाय, लॉकडाउन में घरों में क्या हो रहा और इस वायरस को लेकर तरह तरह के चुटकुले

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

संवैधानिक अधिकार-सदुपयोग या दुरुपयोग

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संवैधानिक अधिकार-सदुपयोग या दुरुपयोग

अधिकार, एक ऐसा शब्द जो सुख, सुविधा और सहुलियत के दरवाजे खोलता है| कहते हैं जब मनुष्य अपना कर्तव्य करता है तो अधिकार खुद ब खुद मिल जाते हैं| समाज में रहने के लिए कर्तव्य और अधिकार, दोनों आवश्यक हैं|

अब सवाल यह उठता है कि कानूनी रूप से अधिकार लेने की नौबत कब आती है| तभी न जब सामने वाला उसे वह सहुलियत देने में अनदेखी करे या आनाकानी करे| कई मामलों में अधिकार को कानूनी रूप देना आवश्यक हो जाता है|
किन्तु जब किसी को मिला हुआ अधिकार उसे अहंकारी बना दे, निरंकुश बना दे तो कानून पर पुनर्विचार की आवश्यकता आ जाती है|

*हम यहाँ पर शुरु करते हैं उस अधिकार की बात से जब वैवाहिक विच्छेद को कानूनन स्वीकृत किया गया| 1955 में हिन्दु मैरिज एक्ट के तहत हिन्दु रीति रिवाज से हुए विवाह को मान्यता प्राप्त थी| बाद में उसे कानून के हाथों में सौंपा गया जब किसी परिस्थिति में पति-पत्नी का साथ रहना सम्भव नहीं हो पाए तो विवाह विच्छेद ही एकमात्र विकल्प बचता है| यह परिस्थिति में पत्नी को क्या क्या सुविधाएँ मिलनी चाहिए, इसपर कई संशोधन हुए| धीरे धीरे यह कानून जहाँ एक ओर स्त्रियों को सहुलियत देने लगा वहीं कुछ इसका दुरुपयोग भी करने लगे| झूठे आरोप गढ़े जाने लगे| घरों को टूटने की संख्या बढ़ने लगी| संपत्ति के लिए या बदला लेने के लिए इन अधिकारों का दुरुपयोग किया जाने लगा|

*दहेज प्रतिबंध अधिनियम 1961 में बनाया गया| इसका उद्देश्य नवविवाहिता को दहेज उत्पीड़न से बचाना था| धीरे धीरे इन अधिकारों का दुरुपयोग आरम्भ होने लगा| तब संशोधन की आवश्यकता पड़ी|27 जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया|अब दहेज उत्पीड़न मामले में केस दर्ज होते ही गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने नाराज पत्नियों द्वारा अपने पति के खिलाफ दहेज-रोकथाम कानून का दुरुपयोग किए जाने पर चिंता जाहिर करते हुए निर्देश दिए कि इस मामले में आरोप की पुष्टि हो जाने तक कोई गिरफ्तारी ना की जाए। कोर्ट ने माना कि कई पत्नियां आईपीसी की धारा 498ए का दुरुपयोग करते हुए पति के माता-पिता, नाबालिग बच्चों, भाई-बहन और दादा-दादी समेत रिश्तेदारों पर भी आपराधिक केस कर देती हैं। जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने कहा कि अब समय आ गया है जब बेगुनाहों के मनवाधिकार का हनन करने वाले इस तरह के मामलों की जांच की जाए।

कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस के मुताबिक, हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति गठित की जाएगी और सेक्शन 498A के तहत की गई शिकायत को पहले समिति के समक्ष भेजा जाएगा। यह समिति आरोपों की पुष्टि के संबंध में एक रिपोर्ट भेजेगी, जिसके बाद ही गिरफ्तारी की जा सकेगी। बेंच ने यह भी कहा कि आरोपों की पुष्टि से पहले NRI आरोपियों का पासपोर्ट भी जब्त नहीं किया जाए और ना ही रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो।

*हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 में संशोधन से पहले, परिवार के केवल पुरुष सदस्य ही प्रतिपक्षी थे, लेकिन बाद में बेटियों को भी एक हिस्सा पाने का हकदार बना दिया गया। अब सोचने वाली बात यह है कि इस संशोधन की आवश्यकता ही क्यों पड़ी| इसलिए न कि यदि बेटी किसी विशेष परिस्थिति में माता पिता की संपत्ति का कुछ हिस्सा चाहे तो भाई इसके लिए कदापि तैयार न होंगे| साधारणतंः विवाहित खुशहाल बेटियाँ संपत्ति पर अपन दावा नहीं ठोकतीं किंतु बेटी का किसी कारणवश पति से संबंध विच्छेद हो जाए तो वह कहाँ जाए| या फिर कोई बेटी अविवाहित रह जाए तो उसे भी माता पिता के घर में रहने का उतना ही अधिकार है जितना बेटे को| किसी भी घर की बिक्री के लिए बेटियों की सहमति भी आवश्यक है| इससे बेटों की मनमानी पर रोक लगी|

*एक एनजीओ कॉमन कॉज ने 2005 मेंसुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि इच्छा मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन मेडिकल बोर्ड के निर्देश पर मरणासन्न का सपॉर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च 2018 को ऐतिहासिक फैसले में मरणासन्न व्यक्ति द्वारा इच्छा मृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को गाइडलाइन्स के साथ कानूनी मान्यता दे दी है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले। कोर्ट ने कहा कि लोगों को सम्मान से मरने का पूरा हक है। लिविंग विल' एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छा मृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की मौत की तरफ बढ़ाने की मंशा से उसे इलाज देना बंद कर दिया जाता है।

अब देखना यह है कि इस फेसले का  सदुपयोग ही हो|

*अब बात करते हैं अनुसूचित जाति/जनजाति के आरक्षण की| भारत के संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव रामजी आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जाति/जनजाति के उत्थान के लिए सभी सरकारी लाभ के लिए उनका प्रतिशत निश्चित किया था| यह सर्वप्रथम दस वर्षों के लिए लागू की गई| बाद में इसकी अवधि बढ़ाकर चालीस वर्ष की गई| आरक्षण तो मिला पर दलित समाज को उनकी जाति का नाम लेकर व्यंग्य और कटाक्ष करने वाले भी कम न थे| इसे मद्देनजर रखते हुए अगस्त 1989 में नियम बनाया गया कि कोई सवर्ण जाति यदि ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जिनसे उनकी भावनाएँ आहत होती हैं और उनकी शिकायत थाने में दर्ज की जाती है तो तुरंत उस तथाकथित व्यक्ति को गिरफ्तार करना होगा| उस दलित को मुआवजा भी दिया जाएगा|

कानून दलित समाज के भले के लिए था किन्तु धीरे धीरे यह धमकी का रूप लेने लगा| इसी कानून का हवाला देकर झूठे आरोप भी लगाए जाने लगे| जितने केस दर्ज़ हुए उनमें करीब सत्तर प्रतिशत केस झूठे साबित होने लगे| नौबत यहाँ तक पहुँच गई कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश को अनुसूचित जाति के उनके जुनियर जजों ने फँसा दिया| इन सबके मद्देनजर कानून में सुधार की आवश्यकता पड़ी| मार्च 2018 में इस नियम में बदलाव किया गया है और शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई है||
-ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 31 दिसंबर 2017

सभी ब्लॉगर मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

सभी ब्लॉगर मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

     ब्लॉग पर जितने भी मित्र हैं वो बहुत से बहुत तो बारह या तेरह वर्षों से ब्लॉग पर होंगे| ब्लॉग ने मन की बात कहने का सहज सरल रास्ता दिया| जो भावनाएँ या बातें पहले मन में घुटकर रह जाती थीं वो ब्लॉग के स्क्रीन पर उतरने लगी| जिन्हें जो फ़ील्ड पसंद था उसके अनुसार सबने ब्लॉग बनाएँ| कहानी, कविता, खेलकूद, समाचार...इस तरह के ब्लॉग बने| बलॉगर .कॉम ने ब्लॉग को फ़ौलो करने की सुविधा दी जिससे हम अपनी पसंद के लेखक और ब्लॉग्स तक पहुँचने लगे| शुरुआत के दिनों में हम सभी बहुत सक्रियता से एक दूसरे के ब्लॉग पर कमेंट दिया करते थे जो अब रास्ता बदलकर फेसबुक की ओर मुड़ गया है|  मित्रों...फेसबुक पर त्वरित कमेंट्स का लालच रहता है...पर हमें अपना पुरानी डायरी नहीं भूलनी चाहिए| नए वर्ष में हमे यह शपथ लेना चाहिए कि जितना समय हम फेसबुक पर बिताते हैं उसका आधा ब्लॉग पढ़ने में बिताएँ और वहाँ भी अपने विचार देकर संजीवनी का काम करें|

अभी भी जो ब्लॉग एग्रीगेटर सक्रिय हैं और नियमित रूप से लिंक लगाते हैं उन सभी को धन्यवाद देना चाहती हूँ जिनमें चर्चामंच, पाँच लिंकों का आनंद, ब्लॉग बुलेटिन आदि हैं| 

उनसभी मित्रों का दिल से आभार है जो कमेंट के जरिए उत्साह बढ़ा जाते हैं| पुराने ब्लॉगर मित्रों में आ० संगीता दी, रश्मिप्रभा दी,अनुलता राज नायर जी, मोनिका शर्मा जी, प्रियंका जी,अर्चना चावजी, दिलबाग विर्क जी, रूपचंद्र शास्त्री सर, सुशील जोशी जी, देवेन्द्र कुमार पाणडेय जी जो बेचैन आत्मा के नाम से लिखते थे, दिगम्बर नासवा जी, दिनेशचन्द्र गुप्ता सर, ओंकार जी,नीतू ठाकुर जी, ध्रुव सिंह जी, सुधा देवरानी जी, सदा जी, गगन शर्मा जी, पम्मी जी, अनु लागुरी जी, अमित जैन मौलिक जी,अभिषेक कुमार, नवीन जी......कुछ नाम छूट रहे.......आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद|

नव वर्ष में आप सभी को मनचाही खुशियाँ मिलें...हम सभी का साथ बना रहे , ईश्वर से यही प्रार्थना है|
-ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

सरकारी नौकरी के लिए रुझान-एक रिपोर्ट

     
पढ़ाई पूरी करने के बाद जब रोजी रोटी की बात आती है तो हमारे पास तीन विकल्प होते हैं|
1बहुराष्ट्रीय कम्पनी/प्राइवेट की नौकरी
2.सरकारी नौकरी
3.स्वरोजगार
फेसबुक पर मैंने एक वोटिंग कराई| वोटिंग सिर्फ एक दिन के लिए थी और सिर्फ मित्रसूची में शामिल मित्रों के लिए थी| जो उस वक्त ऑनलाइन हो पाए उन्होंने सहर्ष भाग लिया| वोटिंग का उद्येश्य यह जानना था कि भारत में किन नौकरियों के लिए क्या रुझान है | जितने लोगों ने और जिन लोगों ने अपने मत और मंतव्य दिये उसका एक ब्योरा प्रस्तुत कर रही हूँ|

कुल 56 लोगों की वोटिंग के आधार पर जो प्रतिशत निकले उनके अनुसार...

1बहुराष्ट्रीय कम्पनी/प्राइवेट की नौकरी—20%

2.सरकारी नौकरी..66%

3.स्वरोजगार..13%

1.सबसे पहले बात करते हैं बहुराष्ट्रीय कम्पनी की...

इतिहास-- भारत में विदेशी कम्पनियाँ तीन तरीके से कम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कम्पनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कम्पनियों के साथ साझेदार कम्पनी के रूप में।

8 विशालकाय ब्रिटिश कम्पनियाँ सन् 1853 से ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं।

आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कम्पनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कम्पनियों के सीधे नियन्त्रण में 701 कम्पनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। सन् 1972 के अन्त तक देश में कुल 740 विदेशी कम्पनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कम्पनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कम्पनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कम्पनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कम्पनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कम्पनियों की संख्या 1136 हो गयी।

जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 3500 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कम्पनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं।

लाभ-जब भारत बेरोजगारी से जूझ रहा था तब ये विदेशी कम्पनियों ने संजीवनी का काम किया| नौकरी के कई विकल्प उन्होंने दिए| सैलरी आकर्षक थी| समय की पाबंदी भी नहीं थी...जब मन करे ऑफिस जाओ, सिर्फ काम के घंटे पूरे होने चाहिए|

स्वतंत्रता भरा जीवन उन्हें अच्छा लगा| समय पर आत्मनिर्भर हुए|

विदेश जाने का मौका मिला|

श्रम की कद्र होती है

हानि- बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत में महानगरों को अपना केंद्र बनाया जिसके फलस्वरूप बच्चे नौकरी करने के लिए अपने घर परिवार से दूर होने लगे| कई परम्पराएँ और संस्कार अनजाने ही विलुप्त होते चले गए| बाहर का पैकेज़्ड फुड खाकर उनके सेहत पर भी असर आने लगा| किराया का व्यापार बढ़ाने लगा जहाँ नौकरी वाले बच्चे एक साथ शेयर वाले घर लेने को मजबूर हो जाते|

हर वर्ष फायर किए जाते हैं कर्मचारी...यदि काम में

बुज़ुर्ग दम्पति अपने अपने शहरों में अकेले होते चले गये| छोटे बच्चे दादी-दादी और नाना-नानी से अलग हो गए |

वोट देने वाले मित्र---

1.Nivedita srivastava जी

2.Abhishek Jain जी

3.Rupa Madhav जी

4.Pawan Jain जी

5.Rochika Sharma जी

6.Arun Singh Ruhela जी

7.Sandeep Kumar जी

8.महिमा श्रीवास्तव ‘वर्मा’ जी

9.Ankit Khare जी

10.Udan Tashtari जी

11.Kanchan Aparajita जी

मित्रों के विचार उनके ही शब्दों में---
Arun Singh Ruhela- मैं मार्केटिंग मैनेजमेंट पढ़ाता हूँ , साथ ही इंजीनिरिंग के बच्चों को स्वरोजगार के लिए स्पेशल कोर्स (EDP) कराता हूँ ! अच्छी कम्पनी में प्लेस्मेंट हो तो शुरुवाती सालों में अच्छा है, बालक हीरा बन के निखरता है और दुनिया भर में उसके हुनर की माँग होती है !
Pawan Jain- फायर काम चोरों को,काम करो अच्छे पैसे लो,पर सरकारी नोकरी में काम न करने की आदत पड़ जाती ओर आपके काम की कोई कीमत नहीं।सरकारी नोकरी में कुव्यवस्था के जाल से मुक्ति नहीं।पर अब परिवर्तन हो रहा है।
Poornima Sharma- मुझे तो सरकारी नौकरी मिल गयी थी,लेकिन मेरे दोनों बेटों को सरकारी जॉब मिलने तक मल्टीनेशनल में काम करना पड़ा।पैसे कारण नहीं था,कारण था अनुभव प्राप्त करना।
महिमा 'श्रीवास्तव' वर्मा- निश्चित रूप से मल्टीनेशनल कंपनी में,, हमारे अनुसार ये इसलिए कि मेहनत अब दोनों ही तरह की नौकरी में है तो पहला कारण ये है कि आरक्षण के कारण कोई नुकसान नहीं होगा किसी योग्य और परिश्रमी व्यक्ति का. ,,दूसरा ये कि जरुरत के वक़्त नौकरी छोड़ सकते हैं,, बाद में मनचाहे वक़्त पर आप में योग्यता है तो फिर से मिल ही जाएगी.

2. सरकारी नौकरी—

वेतनमान और सीनियरिटी के अनुसार पगार

सुरक्षित भविष्य

किसी हादसा दुर्घटन में मृत सरकारी व्यक्ति के परिवार के एक सदस्य को नौकरी

ताउम्र पेंशन

काम से निकाले जाने का खतरा नगण्य

वोट देने वाले मित्र-

1.Mahfooz Ali जी

2.Vibha rani srivastava जी

3.Rashmi Prabha जी

4.रेखा श्रीवास्तव जी

5.Poornima Sharma जी

6.Anjali Agraval जी

7.सुश्री इंदु सिंह जी

8.Rekha Joshi जी

9.Kusum Shukla जी

10.Sanjay Kumar जी

11.Sandhya Tiwari जी

12.Priyanka pandey जी

13.Daisy jaiswal जी

14.Deepshikha sagar जी

15.Jagdish Vyom जी

16.Upasna Siag जी

17Dilbag virk जी

18.Manish Tyagi जी

19.Pooja Singh जी

20.मधु जैन जी

21.Vanphool Sharma Dadhich जी

22.धरणीधर मणि त्रिपाठी जी

23.Neilam Mahajan जी

24.कुमार गौरव अजीतेन्दु जी

25.Asha Singh जी

26.Pradyumn Sharma जी

27.Vinay Chaudhary जी

28.Ashok Yadav जी

29.Jyotsna Saxena जी

30.Mridula Pradhan जी

31.अंकिता कुलश्रेष्ठ जी

32. अराधना अराधना जी

33.Geeta Verma जी

34.Ratna Verma जी

35.Dheerendra Singh Bhadauriya जी

36. Meenakshi TapanSharma जी

सरकारी नौकरी के लिए मित्रों के विचार
Sadhana Agnihotri -सरकारी नौकरी सिर्फ़ आरक्षित वर्ग को ही मिलती है ,
ऐसे में अनारक्षित वर्ग प्राईवेट नौकरी करने को मजबूर है ।।
Dheerendra Singh Bhadauriya- kisi ki Naukri karna Mujhe pasand hai nhi. agar Karna pade to sarkari naukri karunga.

3.
Self Employment-स्वरोजगार
वोट देने वाले मित्र
1.Ashish Rai जी

2.Shashi Bansal जी

3.Shalini Srivastava जी

4.Mukesh Sharma जी

5.Sadhna Agnihotri जी

6.Sandhya Sharma जी

7.पूर्णिमा वर्मन जी

कुछ कह नहीं सकते
सीमा भाटिया


इस बारे में मित्रों के विचार उनके ही शब्दों में साझा कर रही हूँ|
Ashish Rai- उ वाली कहावत सुनी होगी, उत्तम खेती मध्यम बान , निषिध चाकरी भीख निदान।

Mukesh Sharma- वो व्यक्ति जिन्हें अपने कार्य कौशल तथा बुद्धिमता पर पूर्ण विश्वास है और अच्छा काम करते हुए लगातार आगे बढ़ने की ललक है, उन्हें निजी क्षेत्र ही भाता है । राजकीय उपक्रमों में आपको तरह-तरह के अड़ंगे लगाकर कार्य नहीं करने दिया जाता, क्योंकि ज्यादातर लोग काम करते नहीं है और किसी को करने भी नहीं देते । ऐसे लोगों ने बरसों बरस से सारी व्यवस्थाओ को घुन लगा दिया है और इन स्थितियों में कार्यशील व्यक्ति का दम घुटने लगता है एंवम वह स्वयं को असहाय सा महसूस करता है ।मैं स्वरोजगार को ही महत्ता दूँगा । इससे ना केवल आप सक्रिय ही रह पाते है, वरन अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की क्षमताओं में इज़ाफ़ा करते है ।
Sandhya Sharma- मैं भी स्वरोजगार को ही प्राथमिकता देने पसंद करूँगी, अपने साथ साथ अनेकों को रोजगार के अवसर देने का सामर्थ्य भी प्राप्त होता है।
पूर्णिमा वर्मन- स्वरोजगार... अपने हाथ जगन्नाथ और साथ ही साथ देश की सेवा और देश का निर्माण |
Udan Tashtari केरियर में और जीवन में हर वक्त एक चैलेंज जरुरी है कुछ भी बेहतर करने के लिए|
Mani Ben Dwivedi -मल्टी नेशनल नौकरी तो लोग तो मजबूरी में पसंद कर रहे है,,....सरकारी नौकरी में तो जिंदगी और टैलेंट सब आरक्षण के भेट चढ़ जा रहे हैं------मैं खुद भुक्तभोगी हूँ। मल्टीनेशनल में कम से आपकी योग्यता का तो क़दर होता है।
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ब्लॉगर मित्रों से अनुरोध है कि आप भी अपनी कीमती राय यहाँ कमेंट में दें|
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शनिवार, 1 जुलाई 2017

टैक्स के आतंक से मुक्ति- जी एस टी (GST)

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GST- Goods & Services tax.....

इसे good and simple tax के रूप में बताया जा रहा है|
30 जून और 1 जुलाई 17 की मध्यरात्रि को GST का लॉन्च समारोह संसद के सेन्ट्रल हॉल में हुआ जिसमें वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बताया कि एक राष्ट्र एक टैक्स- One nation one tax ही इसका उद्देश्य है और इससे टैक्स चोरी से राहत मिलेगी|
कर प्रणाली व्यवस्था आसान होगी|
केलकर ने 2003 मे एक ऐतिहासिक फैसला लिया था कि पूरे देश में एक तरह का टैक्स हो|
इसमें17 टैक्स और 22 सेस को खत्म किया गया|

प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा ---
यह व्यवस्था किसी एक सरकार की देन नहीं बल्कि सा़ँझा प्रयास का फल है|
जी एस टी की कुल18 बैठकें हुईं|
जी एस टी संघीय ढाँचे की मिसाल है|
जी एस टी लंबी परिचर्चा का परिणाम है|
सवा सौ करोड़ जनता साक्षी बनी|
आर्थिक एकीकरण होगा|
आइंसटीन ने कहा था- इन्कम टैस्क समझना सबसे कठिन काम |
गरीबों का खास ख्याल रखा गया है|
देश आधुनिक टैक्स व्यवस्था की ओर बढ़ रहा|
बीस लाख वाले कारोबारियों को कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा |
यह व्यवस्था इमानदारी का अवसर देगी|
यह सरल पारदर्शी व्यवस्था है|
कच्चा बिल और पक्के बिल का चक्कर खत्म हुआ|
विदेशी व्यापारियों को सुविधा मिलेगी|
आर्थिक से भी आगे सामाजिक क्रा़ंति है जी एस टी|
टैक्स पर टैक्स...टैक्स पर टैक्स से मुक्ति मिली|
यह सरल पारदर्शी व्यवस्था है|
इससे आर्थिक एकीकरण होगा|
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा...
14 वर्षों का सफर है जी एस टी का
रात के बारह बजे से जी एस टी लागू
दुनिया का सबसे बड़ा टैक्स सुधार
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देश में कहीं भी सामान खरीदो, एक ही मूल्य लगेगा|
सबसे खुशी की बात है कि सभी पार्टियों ने इसे समर्थन दिया है|
ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 30 जून 2017

आ, अब लौट चलें...

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कहते हैं जीवन में कभी न कभी हम सब उन सभी चीजों से आकर्षित हो जाते हैं जो सहज उपलब्ध हो| जहाँ वाहवाही मिले वहाँ बार बार जाने की इच्छा होती है| त्वरित मिली प्रतिक्रियाएँ लुभाने लगती हैं और हम भूल जाते हैं उस पुश्तैनी मकान को जहाँ हमने बचपन गुजारा था| कुछ दिनों की चमक दमक के बाद पुराने संगी साथी याद आने लगते हैं और दिल बार बार कहने लगता है...आ , अब लौट चलें...या फिर...ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना...
ऐसा ही कुछ हुआ हम सभी ब्लॉगर्स के साथ...जब नेट की दुनिया में हमने कदम रखा तो मन के भीतर उमड़ते घुमड़ते विचारों को लिखने के लिए एक डायरी मिल गई ब्लॉग के रूप में| ब्लॉग पर एक सुविधा थी फौलोवर बनने की...तो जिनकी पोस्ट पसंद आने लगी उस ब्लॉग को फौलो करने लगे| जब भी उस ब्लॉग पर नई पोस्ट आती हमें सूचना मिल जाती और हम वहाँ टहल आते| एकाध कमेंट भी डाल देते और फिर जाकर देखते कि उन ब्लॉगर महोदय/ महोदया ने रेस्पॉंस दिया या नहीं| हमारे ब्लॉग पर भी लोग आने लगे और हम खुद को लेखिका समझने की भूल कर बैठेः)
कुछ ब्लॉग, एग्रीगेटर का काम करते और हमलोगों की जो पोस्ट उन्हें अच्छी लगती उसका लिंक एक स्थान पर इकट्ठा कर के पाठकों तक पहुँचाते| उनमें "चर्चा मंच" और "हलचल" उन दिनों प्रमुख हुआ करते थे| इससे page view भी बढ़ता और रचनाएँ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक चली जातीं| उस समय अच्छा से अच्छा लिखने की तीव्र लालसा रहती और सच कहें तो उस समय जो लिखी वह फिर नहीं लिख पाई| हम, बच्चों को अक्सर यह कहते हैं कि किसी भी चीज की लत बुरी होती है| पर जब बात खुद पर आई तो फेसबुक की लत लगने लगी और चाह कर भी हम उस लालसा को छोड़ नहीं पाए और रोजाना अपना कीमती वक्त फेसबुक को देने लगे इससे रचनकर्म पर बहुत प्रभाव पड़ा| जो भी विचार मन में आया वह मन की कोठरी में कैद न रहकर फेसबुक स्टेटस बनने लगा| जब हमने फेसबुक अकाउंट खोला तो जिन ब्लॉगर मित्रों को जानते थे उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया| छोटी कविताएँ पोस्ट करने लगे| फिर मित्रता अनुरोध आने लगे तो फटाफट स्वीकार भी की| लेकिन क्षेत्र कोई भी हो, कुछ खट्टे मीठे अनुभव भी हुए जिसे इग्नोर किया| व्हाट्स एप ने रही सही कसर पूरी की और सभी उसकी गिरफ्त में आने लगे| सबके पास मोबाइल और सोशल मिडिया का जुड़ाव बढ़ा| जहाँ पहले ब्लॉगर्स महीने में ज्यादा से ज्यादा पोस्ट डालने के लिए श्रम करते वहाँ अब महीनों तक इधर झाँकना भी बन्द कर दिया सबने| ब्लॉगर साथी फेसबुक पर दिखने लगे और हमारा ब्लॉग भूतबँगला बनने लगा |
एक दिन बुद्धत्व जैसा कुछ ज्ञान मिला तब लगा कि फेसबुक चौराहा है और ब्लॉग सुरक्षित घर जैसा| इधर कुछ महीने पहले से हमने पोस्ट फिर से डालना शुरु किया| तीन चार पोस्ट आकर शिड्यूल कर जाते जो समय समय पर स्वयम् प्रकाशित हो जाते| पहले जो एग्रीगेटर हमारी पोस्ट ले जाते उन्हे धन्यवाद देने जरूर जाते| बाद में उसमें भी सुस्ती होने लगी|
तो दोस्तो, फेसबुक के द्वारा मित्रता कायम रखें पर ब्लॉगिंग की ओर भी ध्यान दें| सार्थक बाते यहीं मिलेंगी|
पोस्ट लिखें...दूसरों की पोस्ट पर भी जाएँ...यहाँ लाइक का ऑप्शन तो नहीं है पर टिप्पणी तो कर ही सकते|
ब्लॉग पोस्ट को मनचाहा सजाएँ और लगाएँ| एक आह्वान था कि 1 जुलाई से सबके कदम पुनः ब्लॉग की ओर मुड़ें| इस आह्वान का मैं तहेदिल से स्वागत करती हूँ और समय प्रबंधन भी करना होगा कि कोई भी स्थान छूटे नहीं|
ब्लॉगर ऋता

शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

कृषक कवि घाघ की कहावतें

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भारत एक कृषि प्रधान देश है|
आज के समय में टीवी व रेडियो पर मौसम संबंधी जानकारी मिल जाती है। लेकिन सदियों पहले न टीवी-रेडियो थे, न सरकारी मौसम विभाग। ऐसे समय में महान किसान कवि घाघ व भड्डरी की कहावतें खेतिहर समाज का पीढि़यों से पथप्रदर्शन करते आयी हैं। हिन्दी के लोक कवियों में कृषक कवि घाघ का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
बिहार व उत्तेरप्रदेश के गांवों में ये कहावतें आज भी काफी लोकप्रिय हैं। जहां वैज्ञानिकों के मौसम संबंधी अनुमान भी गलत हो जाते हैं, ग्रामीणों की धारणा है कि घाघ की कहावतें प्राय: सत्य साबित होती हैं।
घाघ का जीवन वृत्त
हिन्दी के लोक कवियों में घाघ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। घाघ लोक जीवन में अपनी कहावतों के लिए प्रसिद्ध हैं। जिस प्रकार ग्राम्य समाज में इसुरीअपनी फागके लिए, विसराम अपने बिरहोंके लिए प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार घाघ अपनी कृषि संबंधी कहावतों के लिए विख्यात हैं।
हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में घाघ के सम्बन्ध में सर्वप्रथम शिवसिंह सरोजमें उल्लेख मिलता है। इसमें कान्यकुब्ज अंतर्वेद वालेकवि के रूप में उनकी चर्चा है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने घाघ का केवल नामोल्लेख किया है।हिन्दी शब्द सागरके अनुसार घाघ गोंडे के रहने वाले एक बड़े चतुर और अनुभवी व्यक्ति का नाम है जिसकी कही हुई बहुत सी कहावतें उत्तरी भारत में प्रसिद्ध हैं। खेती-बारी, ऋतु-काल तथा लग्न-मुहूर्त आदि के सम्बन्ध में इनकी विलक्षण उक्तियाँ किसान तथा साधारण लोग बहुत कहते हैं।
श्रीयुत पीर मुहम्मद यूनिस ने घाघ की कहावतों की भाषा के आधार पर उन्हें चम्पारन (बिहार) और मुजफ्फरपुर जिले की उत्तरी सीमा पर स्थित औरेयागढ़ अथवा बैरगनिया अथवा कुड़वा चैनपुर के समीप के किसी गाँव में उत्पन्न माना है।
राय बहादुर मुकुन्द लाल गुप्त विशारदने कृषि रत्नावलीमें उन्हें कानपुर जिला अन्तर्गत किसी ग्राम का निवासी ठहराया है।
श्री दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह ने घाघ का जन्म छपरा जिले में माना है।
पं. राम नरेश त्रिपाठी ने कविता कौमुदीभाग एक और घाघ’ और ‘घाघ और भड्डरीनामक पुस्तक में उन्हें कन्नौज का निवासी माना है।
घाघ की अधिकांश कहावतों की भाषा भोजपुरी है। डॉ. ग्रियर्सन ने भी पीजेन्ट लाइफ आफ बिहारमें घाघ की कविताओं का भोजपुरी पाठ प्रस्तुत किया है। इस आधार पर इस धारणा को बल मिलता है कि घाघ का जन्म स्थान बिहार का छपरा था। ऐसा अनुमान है कि घाघ जीविकोपार्जन के लिए छपरा छोड़कर अपनी ससुराल कन्नौज गये होंगे और वहीं बस गये होंगे।
जन्म काल एवं निवास स्थान
घाघ का जन्मकाल भी निर्विवाद नहीं है। शिवसिंह सेंगर ने उनकी स्थिति सं. 1753 वि. के उपरान्त माना है। इसी आधार पर मिश्रबन्धुओं ने उनका जन्म सं. 1753 वि. और कविता काल सं. 1780 वि. माना है।भारतीय चरिताम्बुधिमें इनका जन्म सन् 1696 ई. बताया जाता है। पं. राम नरेश त्रिपाठी ने घाघ का जन्म सं. 1753 वि. माना है। यही मत आज सर्वाधिक मान्य है|
घाघ के नाम के विषय में भी निश्चित रूप से कुछ ज्ञात नहीं है। घाघ उनका मूल नाम था या उपनाम था इसका पता नहीं चलता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र-बिहार, बंगाल एवं असम प्रदेश में डाक नामक कवि की कृषि सम्बन्धी कहावतें मिलती हैं जिनके आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि डाक और घाघ एक ही थे। घाघ की जाति के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। कतिपय विद्वानों ने इन्हें ग्वालामाना है। किन्तु श्री रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी खोज के आधार पर इन्हें ब्राह्मण (देवकली दुबे) माना है। उनके अनुसार घाघ कन्नौज के चौधरी सराय के निवासी थे। कहा जाता है कि घाघ हुमायूँ के दरबार में भी गये थे। हुमायूँ के बाद उनका सम्बन्ध अकबर से भी रहा। अकबर गुणज्ञ था और विभिन्न क्षेत्रों के लब्धप्रतिष्ठि विद्वानों का सम्मान करता था। घाघ की प्रतिभा से अकबर भी प्रभावित हुआ था और उपहार स्वरूप उसने उन्हें प्रचुर धनराशि और कन्नौज के पास की भूमि दी थी, जिस पर उन्होंने गाँव बसाया था जिसका नाम रखा अकबराबाद सराय घाघ। सरकारी कागजों में आज भी उस गाँव का नाम सराय घाघहै। यह कन्नौज स्टेशन से लगभग एक मील पश्चिम में है। अकबर ने घाघ को चौधरीकी भी उपाधि दी थी। इसीलिए घाघ के कुटुम्बी अभी तक अपने को चौधरी कहते हैं। सराय घाघका दूसरा नाम चौधरी सरायभी है।घाघ की पत्नी का नाम किसी भी स्रोत से ज्ञात नहीं है| किन्तु उनकी कविताओं में'कहै घाघ सुन घाघिनी' जैसे उल्‍लेख आए हैं।
प्राचीन महापुरूषों की भांति घाघ के सम्बन्ध में भी अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि घाघ बचपन से ही कृषि विषयकसमस्याओं के निदान में दक्ष थे। छोटी उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ गयी थी कि दूर-दूर से लोग अपनी खेती सम्बन्धी समस्याओं को लेकर उनका समाधान निकालने के लिए घाघ के पास आया करते थे। किंवदन्ती है कि एक व्यक्ति जिसके पास कृषि कार्य के लिए पर्याप्त भूमि थी किन्तु उसमें उपज इतनी कम होती थी कि उसका परिवार भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहता था, घाघ की गुणज्ञता को सुनकर वह उनके पास आया। उस समय घाघ हमउम्र के बच्चों के साथ खेल रहे थे। जब उस व्यक्ति ने अपनी समस्या सुनाई तो घाघ सहज ही बोल उठे-
आधा खेत बटैया देके, ऊँची दीह किआरी।
जो तोर लइका भूखे मरिहें, घघवे दीह गारी।।
कहा जाता है कि घाघ के कथनानुसार कार्य करने पर वह किसान धन-धान्य से पूर्ण हो गया।
घाघ कृषि पंडित एवं व्यावहारिक पुरुष थे। उनका नाम भारतवर्ष के, विशेषत: उत्तरी भारत के, कृषकों के जिह्वाग्र पर रहता है। चाहे बैल खरीदना हो या खेत जोतना, बीज बोना हो अथवा फसल काटना, घाघ की कहावतें उनका पथ प्रदर्शन करती हैं। ये कहावतें मौखिक रूप में भारत भर में प्रचलित हैं।
घाघ और भड्डरी की कहावतें नामक पुस्‍तक में देवनारायण द्विवेदी लिखते हैं, ''कुछ लोगों का मत है कि घाघ का जन्म संवत् 1753 में कानपुर जिले में हुआ था। मिश्रबंधु ने इन्हें कान्यकुब्ज ब्राह्मण माना है, पर यह बात केवल कल्पना-प्रसूत है। यह कब तक जीवित रहे, इसका ठीक-ठाक पता नहीं चलता।''
अभी तक घाघ की लिखी हुई कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं हुई। उनकी वाणी कहावतों के रूप में बिखरी हुई है, जिसे अनेक लोगों ने संग्रहीत किया है। इनमें रामनरेश त्रिपाठी कृत 'घाघ और भड्डरी' (हिंदुस्तानी एकेडेमी, 1931 ई.) अत्यंत महत्वपूर्ण संकलन है।
कवि घाघ की कहावतें एवं उनका वर्गीकरण
घाघ के कृषिज्ञान का पूरा-पूरा परिचय उनकी कहावतों से मिलता है।
उनका यह ज्ञान निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत विभाजित किया जा सकता है।
1.कृषि के लिए कवि घाघ का अभिमत
2.खादों के विभिन्न रूपों
3. गहरी जोत
4. मेंड़ बाँधना
5. फसलों को बोने के लिए बीज की मात्रा
6. बीजों के बीच की दूरी
7. दालों की खेती के महत्व
8.ज्योतिष ज्ञान
1.कृषि के लिए कवि घाघ का अभिमत
घाघ का अभिमत था कि कृषि सबसे उत्तम व्यवसाय है, जिसमें किसान भूमि को स्वयं जोतता है :
उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। 1
खेती करै बनिज को धावै, ऐसा डूबै थाह न पावै। 2
उत्तम खेती जो हर गहा, मध्यम खेती जो सँग रहा। 3
जो हल जोतै खेती वाकी और नहीं तो जाकी ताकी। 4
2.खादों के विभिन्न रूप
खादों के संबंध में घाघ के विचार अत्यंत पुष्ट थे। उन्होंने गोबर, कूड़ा, हड्डी, नील, सनई, आदि की खादों को कृषि में प्रयुक्त किए जाने के लिये वैसा ही सराहनीय प्रयास किया जैसा कि 1840 ई. के आसपास जर्मनी के सप्रसिद्ध वैज्ञानिक लिबिग ने यूराप में कृत्रिम उर्वरकों के संबंध में किया था। घाघ की निम्नलिखित कहावतें अत्यंत सारगर्भित हैं,जैसे:-
खाद पड़े तो खेत, नहीं तो कूड़ा रेत।
गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै।
सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनो पावै।
गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दुनी फली।
वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा।
3. गहरी जोत
घाघ ने गहरी जुताई को सर्वश्रेष्ठ जुताई बताया। यदि खाद छोड़कर गहरी जोत कर दी जाय तो खेती को बड़ा लाभ पहुँचता है :
छोड़ै खाद जोत गहराई, फिर खेती का मजा दिखाई।
4. मेंड़ बाँधना
कवि घाघ का कहना है कि बांध न बाँधने से भूमि के आवश्यक तत्व घुल जाते और उपज घट जाती है। इसलिये किसानों को चाहिए कि खेतों में बाँध अथवा मेंड़ बाँधे
सौ की जोत पचासै जोतै, ऊँच के बाँधै बारी
जो पचास का सौ न तुलै, देव घाघ को गारी।
5. फसलों के बोने के लिए बीज की मात्रा
घाघ ने फसलों के बोने का उचित काल एवं बीज की मात्रा का भी निर्देश किया है।
उनके अनुसार प्रति बीघे में---
पाँच पसेरी गेहूँ तथा जौ,
छ: पसेरी मटर,
तीन पसेरी चना,
दो सेर मोथी, अरहर और मास,
डेढ़ सेर कपास, बजरा बजरी, साँवाँ कोदों
अंजुली भर सरसों बोकर किसान दूना लाभ उठा सकते हैं।
6. बीजों के बीच की दूरी
यही नहीं, उन्होंने बीज बोते समय बीजों के बीच की दूरी का भी उल्लेख किया है, जैसे--
घना-घना सन,
मेंढ़क की छलांग पर ज्वार,
पग पग पर बाजरा और कपास,
हिरन की छलाँग पर ककड़ी और
पास पास ऊख को बोना चाहिए।
कच्चे खेत को नहीं जोतना चाहिए, नहीं तो बीज में अंकुर नहीं आते।
यदि खेत में ढेले हों, तो उन्हें तोड़ देना चाहिए।
7. दालों की खेती के महत्व
घाघ ने सनई, नील, उर्द, मोथी आदि द्विदलों को खेत में जोतकर खेतों की उर्वरता बढ़ाने का स्पष्ट उल्लेख किया है। खेतों की उचित समय पर सिंचाई की ओर भी उनका ध्यान था।
आजकल दालों की खेती पर विशेष बल दिया जाता है, क्योंकि उनसे खेतों में नाइट्रोजन की वृद्धि होती है। घाघ की जानकारी आज के सन्दर्भ में बहुत महत्वपूर्ण मानी जा सकती है|
8.ज्योतिष ज्ञान
I.सुकाल और अकाल -
सर्व तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर।
परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर।।
यदि रोहिणी भर तपे और मूल भी पूरा तपे तथा जेठ की प्रतिपदा तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे।
शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।
यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा।
भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।।
यदि भादो सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र पड़े तो ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी उस दिन अन्न बो देने से बहुत पैदावार होती है।
अद्रा भद्रा कृत्तिका, अद्र रेख जु मघाहि।
चंदा ऊगै दूज को सुख से नरा अघाहि।।
यदि द्वितीया का चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र, कृत्तिका, श्लेषा या मघा में अथवा भद्रा में उगे तो मनुष्य सुखी रहेंगे।
सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।
घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।
यदि पूस की अमावस्या को सोमवार, शुक्रवार बृहस्पतिवार पड़े तो घर घर बधाई बजेगी-कोई दुखी न दिखाई पड़ेगा।

सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।
महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।
यदि श्रावण कृष्ण पक्ष में दशमी तिथि को रोहिणी हो तो समझ लेना चाहिए अनाज महंगा होगा और वर्षा स्वल्प होगी, विरले ही लोग सुखी रहेंगे।
सावन मास बहे पुरवइया।
बछवा बेच लेहु धेनु गइया।।
अर्थात् यदि सावन महीने में पुरवैया हवा बह रही हो तो अकाल पड़ने की संभावना है। किसानों को चाहिए कि वे अपने बैल बेच कर गाय खरीद लें, कुछ दही-मट्ठा तो मिलेगा।
पूस मास दसमी अंधियारी।बदली घोर होय अधिकारी।
सावन बदि दसमी के दिवसे।भरे मेघ चारो दिसि बरसे।।
यदि पूस बदी दसमी को घनघोर घटा छायी हो तो सावन बदी दसमी को चारों दिशाओं में वर्षा होगी। कहीं कहीं इसे यों भी कहते हैं-काहे पंडित पढ़ि पढ़ि भरो, पूस अमावस की सुधि करो।
पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज।
मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।।
यदि पूस सुदी सप्तमी, अष्टमी और नवमी को बदली और गर्जना हो तो सब काम सुफल होगा अर्थात् सुकाल होगा।
अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत।
तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत।।
यदि वैशाख में अक्षय तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होगा।
सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।
यदि सावन सुदी सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो झुरा पड़ेगा; न बरसे तो समय अच्छा बीतेगा।
असुनी नलिया अन्त विनासै।गली रेवती जल को नासै।।
भरनी नासै तृनौ सहूतो।कृतिका बरसै अन्त बहूतो।।
यदि चैत मास में अश्विनी नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अन्त में झुरा पड़ेगा; रेतवी नक्षत्र बरसे तो वर्षा नाममात्र की होगी; भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाएगी और कृतिका नक्षत्र बरसे तो अच्छी वर्षा होगी।
आसाढ़ी पूनो दिना, गाज बीजु बरसंत।
नासे लच्छन काल का, आनंद मानो सत।।
आषाढ़ की पूणिमा को यदि बादल गरजे, बिजली चमके और पानी बरसे तो वह वर्ष बहुत सुखद बीतेगा।
II.वर्षा
रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय।
कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।
यदि रोहिणी बरसे, मृगशिरा तपै और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे।
उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।
भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।।
उत्तर नक्षत्र ने जवाब दे दिया और हस्त भी मुंह मोड़कर चला गया। चित्रा नक्षत्र ही अच्छा है कि प्रजा को बसा लेता है। अर्थात् उत्तरा और हस्त में यदि पानी न बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज अच्छी होती है।
खनिके काटै घनै मोरावै।
तव बरदा के दाम सुलावै।।
ऊंख की जड़ से खोदकर काटने और खूब निचोड़कर पेरने से ही लाभ होता है। तभी बैलों का दाम भी वसूल होता है।
हस्त बरस चित्रा मंडराय।
घर बैठे किसान सुख पाए।।
हस्त में पानी बरसने और चित्रा में बादल मंडराने से (क्योंकि चित्रा की धूप बड़ी विषाक्त होती है) किसान घर बैठे सुख पाते हैं।
हथिया पोछि ढोलावै।
घर बैठे गेहूं पावै।।
यदि इस नक्षत्र में थोड़ा पानी भी गिर जाता है तो गेहूं की पैदावार अच्छी होती है।
जब बरखा चित्रा में होय।
सगरी खेती जावै खोय।।
चित्रा नक्षत्र की वर्षा प्राय: सारी खेती नष्ट कर देती है।
जो बरसे पुनर्वसु स्वाती।
चरखा चलै न बोलै तांती।
पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र की वर्षा से किसान सुखी रहते है कि उन्हें और तांत चलाकर जीवन निर्वाह करने की जरूरत नहीं पड़ती।
जो कहुं मग्घा बरसै जल।
सब नाजों में होगा फल।।
मघा में पानी बरसने से सब अनाज अच्छी तरह फलते हैं।
जब बरसेगा उत्तरा।
नाज न खावै कुत्तरा।।
यदि उत्तरा नक्षत्र बरसेगा तो अन्न इतना अधिक होगा कि उसे कुते भी नहीं खाएंगे।
दसै असाढ़ी कृष्ण की, मंगल रोहिनी होय।
सस्ता धान बिकाइ हैं, हाथ न छुइहै कोय।।
यदि असाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी को मंगलवार और रोहिणी पड़े तो धान इतना सस्ता बिकेगा कि कोई हाथ से भी न छुएगा।
असाढ़ मास आठें अंधियारी।जो निकले बादर जल धारी।।
चन्दा निकले बादर फोड़।साढ़े तीन मास वर्षा का जोग।।
यदि असाढ़ बदी अष्टमी को अन्धकार छाया हुआ हो और चन्द्रमा बादलों को फोड़कर निकले तो बड़ी आनन्ददायिनी वर्षा होगी और पृथ्वी पर आनन्द की बाढ़-सी आ जाएगी।
असाढ़ मास पूनो दिवस, बादल घेरे चन्द्र।
तो भड्डरी जोसी कहैं, होवे परम अनन्द।।
यदि आसाढ़ी पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों से ढंका रहे तो भड्डरी ज्योतिषी कहते हैं कि उस वर्ष आनन्द ही आनन्द रहेगा।
III.पैदावार
रोहिनी जो बरसै नहीं, बरसे जेठा मूर।
एक बूंद स्वाती पड़ै, लागै तीनिउ नूर।।
यदि रोहिनी में वर्षा न हो पर ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र बरस जाए तथा स्वाती नक्षत्र में भी कुछ बूंदे पड़ जाएं तो तीनों अन्न (जौ, गेहूं, और चना) अच्छा होगा।
IV.जोत
गहिर न जोतै बोवै धान।
सो घर कोठिला भरै किसान।।
गहरा न जोतकर धान बोने से उसकी पैदावार खूब होती है।
गेहूं भवा काहें।असाढ़ के दुइ बाहें।।
गेहूं भवा काहें।सोलह बाहें नौ गाहें।।
गेहूं भवा काहें। सोलह दायं बाहें।।
गेहूं भवा काहें। कातिक के चौबाहें।।
गेहूं पैदावार अच्छी कैसे होती है ? आषाढ़ महीने में दो बांह जोतने से; कुल सोलह बांह करने से और नौ बार हेंगाने से; कातिक में बोवाई करने से पहले चार बार जोतने से।
गेहूं बाहें। धान बिदाहें।।
गेहूं की पैदावार अधिक बार जोतने से और धान की पैदावार विदाहने (धान का बीज बोने के अगले दिन जोतवा देने से,यदि धान के पौधों की रोपाई की जाती है तो विदाहने का काम नहीं करते, यह काम तभी किया जाता है जब आप खेत में सीधे धान का बीज बोते हैं) से अच्छी होती है।
गेहूं मटर सरसी।
औ जौ कुरसी।।
गेहूं और मटर बोआई सरस खेत में तथा जौ की बोआई कुरसौ में करने से पैदावार अच्छी होती है।
गेहूं गाहा, धान विदाहा।
ऊख गोड़ाई से है आहा।।
जौ-गेहूं कई बांह करने से धान बिदाहने से और ऊख कई बार गोड़ने से इनकी पैदावार अच्छी होती है।
गेहूं बाहें, चना दलाये।
धान गाहें, मक्का निराये।
ऊख कसाये।
खूब बांह करने से गेहूं, खोंटने से चना, बार-बार पानी मिलने से धान, निराने से मक्का और पानी में छोड़कर बाद में बोने से उसकी फसल अच्छी होती है।
पुरुवा रोपे पूर किसान।
आधा खखड़ी आधा धान।।
पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा पैया (छूछ) पैदा होता है।
पुरुवा में जिनि रोपो भैया।
एक धान में सोलह पैया।।
पूर्वा नक्षत्र में धान न रोपो नहीं तो धान के एक पेड़ में सोलह पैया पैदा होगा।
V. बोवाई
कन्या धान मीनै जौ।
जहां चाहै तहंवै लौ।।
कन्या की संक्रान्ति होने पर धान (कुमारी) और मीन की संक्रान्ति होने पर जौ की फसल काटनी चाहिए।
कुलिहर भदई बोओ यार।
तब चिउरा की होय बहार।।
कुलिहर (पूस-माघ में जोते हुए) खेत में भादों में पकने वाला धान बोने से चिउड़े का आनन्द आता है-अर्थात् वह धान उपजता है।
आंक से कोदो, नीम जवा।
गाड़र गेहूं बेर चना।।
यदि मदार खूब फूलता है तो कोदो की फसल अच्छी है। नीम के पेड़ में अधिक फूल-फल लगते है तो जौ की फसल, यदि गाड़र (एक घास जिसे खस भी कहते हैं) की वृद्धि होती है तो गेहूं बेर और चने की फसल अच्छी होती है।
आद्रा में जौ बोवै साठी।
दु:खै मारि निकारै लाठी।।
जो किसान आद्रा में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है।
आद्रा बरसे पुनर्वसुजाय, दीन अन्न कोऊ न खाय।।
यदि आर्द्रा नक्षत्र में वर्षा हो और पुनर्वसु नक्षत्र में पानी न बरसे तो ऐसी फसल होगी कि कोई दिया हुआ अन्न भी नहीं खाएगा।
आस-पास रबी बीच में खरीफ।
नोन-मिर्च डाल के, खा गया हरीफ।।
खरीफ की फसल के बीच में रबी की फसल अच्छी नहीं होती।
निष्कर्ष
दरअसल कृषक कवि घाघ ने अपने अनुभवों से जो निष्‍कर्ष निकाले हैं, वे किसी भी मायने में आधुनिक मौसम विज्ञान की निष्‍पत्तियों से कम उपयोगी नहीं हैं।

घाघ और भड्डरी की कहावतें लोक जीवन में प्रसिद्ध है। ग्राम्य अंचल में रोजमर्रा की खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान व्यक्ति इन्हीं कहावतों के आधार पर कर लेता है। इनकी कहावतें किसानों के लिए गुरुमंत्र हैं। अवधी और भोजपुरी क्षेत्रों में इनका प्रचार-प्रसार कुछ अधिक ही दिखाई पड़ता है। घाघ और भड्डरी की कहावतें आज भी प्रासंगिक हैं। उनमें ज्ञान विज्ञान सम्बन्धी प्रचुर सामग्री है। आज शस्य विज्ञान, पादप प्रजनन, पर्यावरण विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान आदि की दृष्टि से इन कहावतों के अध्ययन की आवश्यकता है।
संदर्भ सूत्र--इंटरनेट, विकिपिडिया