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रविवार, 23 अगस्त 2020

बाढ़


Weather Update: 30 killed due to lightning in Bihar heavy rain ...
बाढ़ से भयावह स्थिति: प्रभावित ...
एक सुनहरी रेखा खींच
चपल दामिनी नभ के बीच
नभ-वसुधा से रिश्ता जोड़
सघन कालिमा देती तोड़|
ले आती बारिश की धार
जिसमें हुलसे घर संसार।
समझ न पाती वह यह बात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।


नदियाँ रूप धरें विकराल
हहराती सी उनकी चाल।
सुरसा सम होतीं बेताब
लहरें लिखतीं नई क़िताब।
जाने क्या क्या लेतीं लील
बुझते खुशियों के कंदील।

कृषक स्वप्न को देकर मात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।
तीव्र वेग से देकर जोर
आकर नीर मचाते शोर।
तटबन्धें होतीं लाचार
खिसक गिरें उनकी दीवार।

सर सर बढ़ते जाते पाँव
पानी में डूबे हैं गाँव।
सर्प निकल करते आघात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।
बह जाते हैं फसल मकान
मिट जाते कितने अरमान।

ले नेता को उड़े विमान
जनता देख हुई हैरान।
राहत के थोड़े सामान
चैनल पर करते गुणगान।
बेघर होकर मिले न भात
बाढ़ बुलाती अति बरसात।

@ऋता शेखर 'मधु'

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

सेल्फ़ डिपेंडेंट

सेल्फ़ डिपेंडेंट...अर्थात आत्मनिर्भर होना|
परावलंबन का संबंध अधिकतर स्त्रियों और सेवक वर्ग से जुड़ा होता है|
इस सेल्फ़ डिपेंडेंट की रेंज क्या है, इसे कोरोना काल ने सुस्पष्ट कर दिया है| 
सेल्फ़ डिपेंडेंट...कब कब ?
१.शारीरिक रूप से
२.आर्थिक रूप से
३.मानसिक रूप से 
४.सामाजिक रूप से
५...................
१.शारीरिक रूप से सेल्फ डिपेंडेंट रहने की कामना बुजुर्गों में होती हैं| वे चाहते हैं कि अपनी रोजमर्रा का काम वे खुद कर पाएँ| उनको किसी को आवाज न लगानी पड़े|| उन्हें अक्सर यह बोलते हुए सुना जा सकता , "भगवान हमें चलते फिरते उठा लेना|" 
शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति भी अपना काम खुद करना पसंद करते हैं और किसी की मदद कम से कम लेना चाहते हैं|
२.आर्थिक रूप से सेल्फ़ डिपेंडेंट होने की कामना युवा वर्ग को  होती है| एक निश्चित उम्र के बाद आर्थिक डिपेंडेंसी उन्हें खलने लगती है| इसे लड़कियों के मामले में भी खूब प्रयोग में लाया जाता है| पहले लड़कियों के लिए सिर्फ़ पढ़ना लिखना जरूरी समझा जाता था| किन्तु उनकी दुर्दशा देखकर धीरे धीरे किसी नौकरी या व्यवसाय से जुड़कर उन्होंने  आर्थिक रूप से खुद को सेल्फ़ डिपेंडेंट बनाया| हालांकि अभी भी प्रतिशत बहुत अधिक नहीं है फिर भी कोशिशें निरंतर जारी हैं|
वृद्धों को पेंशन मिलना भीआर्थिक सेल्फ डिपेंडेंट होना है|
३. मानसिक रूप से सेल्फ डिपेंडेंट होने का अर्थ है निर्णय लेने की क्षमता होना|पर किसी कारण से यह डिपेंडेंसी भी झेलनी पड़ती है|
४. सामाजिक रूप से सेल्फ डिपेंडेंट होने में आप सामाजिक कार्यों में बिना किसी हस्तक्षेप के अपना योगदान दे सकते हैं| यह सोचने और अवलोकन की बात है कि क्या हम सभी इस मामले में स्वतंत्र हैं|

अब बात करते हैं कोरोना काल की जिसने नए सेल्फ डिपेंडेंट को जन्म दिया है|...उसके पहले सामाजिक सोच के कुछ उदाहरण देती हूँ|
दृष्य १
"किरण, लड़का बाहर जा रहा, उसे कुछ सिखा दे ताकि वक्त बेवक्त खुद बना कर खा सके"
अरे क्या बुआ, मैं तो कुछ नहीं सीखने वाला| अब किस चीज की कमी है बाजार में, ऑनलाइन मँगाओ और खाओ|""
"हाँ दीदी, ये ठीक कह रहा| यहाँ तो कभी किसी ने खाना भी खुद निकाल कर न खाया है|"
दृष्य २
"बिटिया, पढ़ाई लिखाई के कारण रसोई का काम नहीं सीख सकी| अब नौकरी पर जा रही| कुछ तो पकाना सीख ले|"
"क्या चाची, कमाएँगे, कुक रखेंगे और मस्ती से रहेंगे|"
" बिटिया, बेला बखत कोई नहीं जानता| कभी खुद बनाना पड़े तो| "

कहने का अर्थ यह रहा कि रसोई युवा पीढ़ी के लिए कोई आवश्यक जगह नहीं जबकि रसोई न हो तो दुनिया टिकेगी कैसे|
कल दिल्ली में एक पिज्जा डिलिवरी बॉय का कोरोना पॉजिटिव पाया जाना दिल्ली में हड़कंप मचा गया| उसने सत्तर घरों में पिज्ज़ा दिया था| 
अब सोचने वाली बात यह है कि लोग इतने लापरवाह कैसे हो गये| जब पूरी दुनिया में सोशल डिस्टेंसिंग की बात हो रही, बाहर से सामान लेने पर भी पाबंदी है| बाहर से आने वाले पैकेट और सब्जियाँ सभी एहतियात से धोकर प्रयोग कर रहे, ऐसे समय में यह ऑर्डर कैसे प्लेस किया गया और लोग भी किस प्रकार हिम्मत कर पाए|
कल फेसबुक पर एक पोस्ट में मैंने यही बात पूछी तो यह बात सामने आई कि जो बच्चे घर नहीं जा पाए ्उन्होंने मजबूरी में पिज्जा मँगवाया होगा| इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता | 
तो क्या वे बच्चे सेल्फ डिपेंडेंट नहीं थे|
जवाब यही हो सकता है ...कि नहीं थे| उन्होंने कभी यह विचार भी नहीं किया होगा कि कभी इस तरह की नौबत आ सकती है वरना  इंडक्शन या बॉयलर तो रख ही सकते थे| पिज्जा मँगवाने वाले इन सब चीजों को एफोर्ड भी कर सकते हैं|
सेल्फ डिपेंडेंसी में यहीं पर मात खा जाएँगे बच्चे यदि आरम्भ से ही पढ़ाई के साथ साथ उनसे रसोई के हल्के फुल्के काम करवाने की ट्रेनिंग न दी जाए| कोरोना ने बता दिया कि अब वैसी रईसी का महत्व नहीं जो काम न करना जाने| साधारण सी खिचड़ी न बना सकें, एक रोटी न बना सकें|
वो माएँ जो बेटे-बेटी से थोड़ा भी काम करने को प्रेरित नहीं कर पातीं उनको भी सोचना होगा|
५ अब सेल्फ डिपेंडेंट होना है रसोई में...कोरोना हमेशा नहीं रहने वाला...पर जब भी माँ न हों घर में, पत्नी मायके गई हो तो बाहर का खाना न खाएँ| खुद बनाएँ और खाएँ|
बाहर का खाना बहुत खास समय के लिए रखें...सेल्फ डिपेंडेंट बनें|
@ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

लॉकडाउन - मोदी जी की सप्तपदी

     आज 14 अप्रैल 2020 को लॉक डाउन के 21 दिन पूरे हो चुके हैं। देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी इस भयावह कोरोना काल में हरसम्भव जनता के सम्पर्क में रहे। आज सुबह 10 बजे उन्होंने तीसरी बार जनता को सम्बोधित किया। लॉक डाउन की अवधि 3 मई तक के लिए बढ़ा दी गयी है। नियम तोड़ने वालों के लिए आगामी 20 अप्रैल तक प्रशासन बहुत सख्त रहेगा।
मोदी जी का सम्बोधन जनता में नई ऊर्जा नई शक्ति का संचार करता है इसमें कोई शक नहीं। किन्तु एक बात और भी रहती है कि जनता उनके संबोधन में हमेशा एक धमाके जैसा कुछ होने का इंतेज़ार करती है ।यह नोटबन्दी धमाका का आफ्टर इफेक्ट जैसा लगता है। इस कोरोना काल में उन्होंने ताली बजाकर सब कोरोना योद्धाओं के लिए आभार प्रकट करवाया। दूसरी बार एक दिया जलाने को कहा। जनता का भरपूर समर्थन मिला।
आज उन्होंने बहुत पते की बात कही है।
चिकित्सा क्षेत्र में भारत से कई गुना आगे रहने वाले देश भी कोरोना को काबू में न कर सके जैसा भारत ने कर दिखाया। वे सभी देश भारत सरकार की कार्यकुशलता की दाद दे रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत से हैड्रोक्लोरोक्वीन दवा निर्यात करने की मदद मांगी और भारत यहाँ भी पीछे न रहा।
भारत विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला दूसरा देश है। 130 करोड़ आबादी वाले देश में सरकार के उचित निर्णय ने कोरोना को फैलने से रोक दिया, यह वाकई विशिष्ट कार्य है।
हालांकि यह दुख की बात है कि कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा कोरोना को फैलाने का दुष्कृत्य सोचनीय रहा। इस कारण से कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर सैकड़ा से हजार और अब 10 हजार से ऊपर चली गयी।
सरकार के सामने वायरस के साथ साथ तब्लीगी जमात के लोगों से निपटने की चुनौती भी आ गयी। चार दिन पहले निहंग समूह के एक व्यक्ति ने एक पुलिस अधिकारी का हाथ काट दिया जिसे साढ़े सात घण्टों की कठिन ऑपेरशन से जोड़ दिया गया। यहाँ पर एक अच्छी बात यह रही कि सिख समुदाय ने निहंगों के कुकृत्य के लिए सोशल मीडिया पर उनकी भर्त्सना की जो तब्लीगी जमात से संबंधित समुदाय अपने समुदाय के लिए न कर सकी।
देश पर आए संकटकाल में खाद्य दवा की दुकानीं खुली रहीं। रोजमर्रा की वस्तुएं मिलती रहीं।
अब बात करते हैं आज की घोषणा के बारे में। आज मोदी जी ने सात बातें कहीं और जनता से निवेदन किया कि वे उन सबका पालन करें। इसे सप्तपदी का नाम दिया गया।ये रहे वे सप्तपदी...
मोदी जी की सप्तपदी...3 मई तक के लिए
1 बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें
2 लक्ष्मण रेखा का पालन हो
3 इम्युनिटी के लिए आयुष मंत्रालय
4 आरोग्य सेतु app रखें
5 गरीब परिवार की देखरेख
6 सहकर्मी के प्रति संवेदना
7 कोरोना योद्धाओं का सम्मान
जनता से निवेदन किया गया कि आरोग्य सेतु नामक ऐप डाउनलोड करें। जब सब लोग इस ऐप को रखेंगे तो आसपास के कोरोना संक्रमित व्यक्ति की सूचना मिल जाएगी। इससे सावधानी बरतने में आसानी हो जाएगी।
        अभी हम सभी को ३ मई तक घर में रहना है और कोरोना को मात देना है। घर में रहिये, कहानियां पढ़िए, बच्चों के साथ खेलिए, नई नई डिशेज आजमाइए। टेलिविज़न पर रामायण, महाभारत ,व्योमकेश बख़्शी ,बुनियाद, शक्तिमान, श्रीमानजी श्रीमती जी, सर्कस जैसे धारावाहिकों का पुनरप्रसारण देखिए।
आशा है की लॉक डाउन की दूसरी पारी में कोरोना पर नियंत्रण करने में सरकार के साथ जनता सफल हो जाएगी और सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।
कुछ जिलों के प्रयास सराहनीय रहे हैं।
@ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

कोरोना काल-१ सखी आस दीपक जलाना है

Coronavirus End one day But will change the world in many ways ...

घरों में रहें, ये बताना है
हमें वायरस को हराना है

कहें लोग, है जीव बाहर का
नहीं यान से घर बुलाना है

विषाणु खतरनाक हैं देखो

उसे तो सभी को मिटाना है

बिना हाथ धोए न छूना तन
वहीं पर उसका ठिकाना है

घुसे कंठ में आँख कानों से
इसी रास्ते को छुपाना है

करे जो ख़ुराफ़ात कोरोना
गरम नीर पीकर डुबाना है

न नजदीक जाएँ किसी के भी
सभी को नियम यह निभाना है

करें सैनिटाइज हरिक चीजें

उसे इस तरह से भगाना है

वहीं आततायी बना कोविड
बना फेफड़ों का दिवाना है

हुए संक्रमित धैर्य रखना प्रिय
समय से उसे भाग जाना है

नहीं शर्म की बात है इसमें
समाधान से ही हटाना है

हुए लॉकडाउन प्रदेशों में
दवा खाद्य फिर भी जुटाना है

घरों से करें काम दफ़्तर के
हुआ आज कैसा जमाना है

मदद कर सकें हम गरीबों की
यही भाव मन में बिठाना है

यदि आस या पास हो कोई
बुलाकर उसे भी जिमाना है

भयंकर हुआ मौत का तांडव
सतर्क रह उसे भी घटाना है

ढकें मास्क से चेहरा अपना
हमें तो उसे बस छकाना है

लड़ाई चलेगी अभी लम्बी
सखी आस दीपक जलाना है 

जहर जो भरे जा रहे हैं मनु
अमृत से उसे भी हटाना है

नहीं प्रेम का काट दुनिया में
मिलेगी सफलता, दिखाना है

122 122 122 2
@ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

लॉकडाउन १

कोरोना- कोई रोड पर ना निकले- लॉकडाउन १

युग बीता सदियाँ बीतीं, इतिहास गवाह है कि जब जब प्रकृति और जीवों पर अत्याचार और भ्रष्टाचार की अति हुई, विधि के विधान ने विनाश की लीला रची और जाने कितनी सभ्यताएँ काल के गर्त में समा गईं| रामायण काल, महाभारत काल, सिंधु घाटी की सभ्यता, मिस्र की सभ्यता, हड़प्पा मोहनजोदाड़ों आदि ने स्वयं को प्राचीन इतिहास में कैद कर लिया|

आज का युग अति आधुनिक युग है| दुनिया ने विकास में बहुत तेजी दिखाई और पिछले डेढ़ सौ वर्षों में अकल्पनीय अनुसंधान एवं आविष्कार हुए| विज्ञान ने मानव सभ्यता को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया| सागर से लेकर आकाश तक मानव ने अपना अधिकार जमा लिया| रेलवे और हवाई जहाज तो पुरानी बात हो गई| प्रकृति पर कहर बनकर टूटा गगनचुम्बी इमारतों का बनना, मेट्रों का आन्| इसके लिए जाने कितने वृक्ष काट डाले गये| धरती धीरे धीरे ग्लोबल वार्मिंग की शिकार होने लगी| वायु हो या जल, सब मानव के अति महात्वाकांक्षा का शिकार होकर प्रदूषित हो गए|

अब हम बात करते हैं विश्व में विकसित देश की श्रेणी में आने वाले देश चीन की| यह तो पहले से सुनते आए थे कि वहाँ के लोग कीड़े मकोड़े, साँप बिच्छू , चमगादर वगैरह सब कुछ खा जाते हैं| अभी चूँकि व्हाट्सएप का जमाना है तो अचानक उनके बहुत सारे विडियो आने लगे जिसमें वे यह सब खाते हुए दिख रहे थे| ऐसा इसलिये हो रहा था कि दुनिया में एक नए वायरस का पदार्पण हो चुका था जो साँप और चमगादर के मेल से बने एन्जाइम के कारण बनने लगे थे| इस वायरस ने सबसे पहले चीन को अपने गिरफ्त में ले लिया| इस सूक्ष्म वायरस का नाम कोरोना था और डॉक्टर्स की भाषा में COVID 19 कहा गया| दिसम्बर में चीन में जब कोरोना के कारण प्रथम मौत हुई तो इसे छिपा लिया गया| चीन के वुहान शहर में विश्व के अन्य देशों के लोग भी थे जो संक्रमित होने लगे| जब वे वापस अपने देश लौटे तो वहाँ भी इस वायरस ने अपने पाँव फेलाने शुरू कर दिये| देखते ही देखते इटली , स्पेन, इंग्लैंड प्रभावित हो गया|इस अदृष्य महामारी से बचने के लिये उन देशों में छुट्टियाँ घोषित कर दी गईं| किंतु जागरुकता की कमी से लोग छुट्टियों का आनंद मनाने के लिये पिकनिक मनाने लगे या इधर उधर यात्रा में संलग्न हो गये जिस कारण संक्रमण बढ़ने लगा और यह बीमारी बहुत बड़ी आबादी में फैल गई| यह संक्रमण वायु से नहीं लगता, लगता है स्पर्श से| संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से , उसे छूने से हाथ संक्रमित हो जाता है| फिर वह हाथ यदि चेहरे पर लगता है तो कान, मुँह या आँख के कोनों से शरीर के अन्दर पहुँच कर गले में अटक जाता है| संक्रमण के बाद लक्षण प्रकट होने में एक से चौदह दिन लगते हैं| यह वायरस श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है| प्रथम लक्षण के तौर पर बुखार आता है और खाँसी होती है|

भारत में प्रथम रोगी केरल में ३० जनवरी को पाया गया| वह विदेश से आया था, इसलिए यह स्पष्ट है कि कोरोना वायरस हवाई जहाज के जरिए ही भारत में आया है| उसके बाद धीरे धीरे संक्रमण की संख्या बढ़ने लगी तो भारत सरकार ने इसके निवारण हेतु नियम बनाए| अब अंतर्राष्ट्रीय हवाई यात्रा करके आने वालों की जाँच हवाई अड्डा पर की जाने लगी किंतु तबतक थोड़ी देर हो चुकी थी| संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ने लगी थी| विदेश से आने वालों को आरम्भ में आइसोलेशन के लिये कहा गया|करीब दस मार्च से उन्हें कावरंटाइन में भेजा गया| वे घर तब तक नहीं जा सकते थे जब तक दस दिन पूरे नहीं हो जाते| भारत में तबतक संक्रमित व्यक्तियों की संख्या सैकड़े में चली गई थी|

COVID 19 से सुरक्षा के दौरान जो शब्द बहुतायत से प्रयोग किये गए वह हैं --

१) कोरोना- वायरस का नाम

२) हैंडवाश- हर आधे घंटे बाद हाथों को साबुन से बीस सेकेंड तक धोना

३) सेनेटाइजर- एक ऐसा तरल जो हाथों से विषाणु को खत्म करने में सहायक होता है|

४) मास्क- मुँह को ढकने वाला खास बनावट का कपड़ा

५) सोशल डिस्टेंसिंग--समाज के लोगों से दूरी बनाकर रहना

६) आइसोलेशन- विदेश से आए लोगों को अपनी जिम्मेदारी पर चौदह दिनों तक समाज से कटकर रहना

७) क्वारंटाइन- विदेश से आए लोगों को किसी सरकारी संस्था की निगरानी में चौदह दिनों तक समाज से कटकर रहना

८) कोरोना टेस्ट किट- ऐसी प्रक्रिया जिससे संक्रमण की जाँच हो सके

९) कोरोना पॉजिटिव- जिनमें संक्रमण साबित हो गया हो

१०) कोरोना नेगेटिव- जिनमें संक्रमण नहीं हो 

११) इम्युनिटी- रोग निरोधक क्षमता बढ़ाना

अब देखते हैं कि भारत में कबसे पूरी तत्परता से बचाव के कदम उठाए गये|
कोई रोड पर ना निकले'- पीएम मोदी ने ...

19 मार्च को माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की रात 8 बजे जनता से सीधी बात।

22 मार्च को कर्फ्यू घोषित किया गया। उसी दिन 5 बजे शाम को मोदी जी ने जनता से आग्रह किया कि कोरोना के विरुद्ध लड़ाई के मोर्चे पर जूट डॉक्टर्स,नर्स, सफाई कर्मचारी, दैनिक सहायक एवम पुलिस का आभार प्रकट करने के लिए शाम 5 बजे देश के सारे लो एक साथ अपने घरों की बालकोनी, दरवाजे, खिड़की, छत पर खड़े होकर ताली, थाली, घंटी, शंख बजायें और उस दिन वह अद्भुत नजारा अविस्मरणीय बन गया। सरकार विरोधी तत्वों ने यहाँ भी खिलवाड़ कर दिया और समूह में इकठ्ठे होकर ताली थाली बजाने लगे।

अगले दिन अर्थात 23 मार्च को लोग सड़कों पर निकल पड़े। कोरोना जैसे जानलेवा वायरस के प्रति सामाजिक दूरी बरतने में लोगों की कोताही देख मोदी जी व्यथित हो गए। कई राज्यों ने उसी दिन लॉक डाउन कर दिया पर लोगों को बाहर निकलने से रोक न सके।

24 मार्च को पुनः जनता के सामने 8 बजे रु ब रु होकर प्रधानमंत्री महोदय ने रात 12 बजे से 21 दिनों के लिए पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा कर दी। रेल सेवायें बन्द की गईं। हवाई यात्रा पर रोक लग गई। पूरे देश से मोदी जी ने करबद्ध प्रार्थना की कि लोग घरों से न निकलें और कोरोना को थर्ड स्टेज पर जाने से रोकें।

चारों ओर किराना का सामान और सब्जियां लेने की होड़ लग गयी जैसे नोटबन्दी के समय नोट बदलने की होड़ लगी थी।

25 मार्च की सुबह वातावरण में पूर्ण शांति थी। चिड़ियों का चहकना सुनाई पड़ रहा था। घरों में बाइयों के प्रवेश पर भी पाबन्दी लगी। नतीजा....

तभी 26 मार्च एक अनहोनी हो गयी...दिल्ली में रहने वाले विभिन्न प्रदेशों के मजदूर वर्ग अचानक बस अड्डों पर जमा होने लगे। इस तरह की भीड़ देखकर सबकी रूह काँप गयी। एक दूसरे के पास खड़े लोग न जाने कितनों को बीमार करेंगे। सब अपने घरों को लौटना चाहते थे क्योंकि कहीं मकान का किराया समस्या बन गयी और कहीं खाने के सामान का अभाव था। ये दिहाड़ी मजदूर अचानक एक जगह कैसे इकठ्ठे हो गए यह सोचने का विषय है जिसपर यहाँ चर्चा करना उचित नहीं।

किसी तरह इस समस्या को निपटाया गया और उन्हें घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई।

फिर तीन दिन थोड़ी शांति रही। संक्रमित लोगों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई। किन्तु सब कुछ इतना आसान नहीं होता है। 31 को पता चला कि मरकज़ में हजार से ऊपर लोग छुपे हुए थे जिसमें दो सौ लोगों के करीब संक्रमित थे। अब कोरोना को थर्ड स्टेज पर जाने का खतरा बढ़ गया क्योंकि बाकी लोग भारतीय ही थे और अपने प्रदेश लौटकर जाने कितनों को संक्रमित करने वाले थे। सारे लोगों को क्वारंटाइन अर्थात निगरानी के तहत रखा गया है।

--ऋता शेखर मधु

अगली पोस्ट में इस वायरस से बचने के लिए कारगर उपाय, लॉकडाउन में घरों में क्या हो रहा और इस वायरस को लेकर तरह तरह के चुटकुले

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

धरती को ब्याह रचाने दो

Image result for natural beauty of nature
धरती को ब्याह रचाने दो
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धरती ब्याह रचाती है
पीले पीले अमलतास से
हल्दी रस्म निभाती है
धानी चुनरी में टांक सितारे
गुलमोहर बन जाती है
देखो, धरती ब्याह रचाती है।


आसमान के चाँद सितारे
उसके भाई बन्धु हैं
लहराते आँचल पर निर्मल
बहता जाता सिंधु है
ओढ़ चुनरिया इंद्रधनुष की
देखो, धरती ब्याह रचाती है।

बने पुजारी सप्तऋषि
ऋचाएँ वेद सुनाती हैं
नन्दन कानन में वृक्ष लताएं
झूम झूम लहराती हैं
छुईमुई बन कर सिमटी हुई
देखो, धरती ब्याह रचाती है।

इंसानों ने छीन लिया है
उसकी ठंडी छाया को
खेतों में वह ढूँढ रही
स्वर्ण फसल की काया को
वहाँ खड़े भवनों में धरती
कैसे ब्याह रचाएगी ।

मखमली गलीचे दूर्वा के
धूमिल पड़े सड़कों के नीचे
पवन बसन्ती धुआँ धुआँ है
कलियाँ सूखीं अँखियाँ मीचे
वन्दनवार फिर कहाँ बनेंगे
सुमन-हार कहाँ से लाएगी

इंसानों!
लौटा दो सुषमा उसकी
पृथ्वी को स्वर्ग बनाने दो
हम सब नाचेंगे बन बाराती
धरती को ब्याह रचाने दो।
--ऋता

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

इक दीया हाथों में लेकर द्वार द्वार हम घूमे












इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह गरीब कि कुटिया थी
जहां नहीं था पेटभर खाना
दिनभर के श्रम से जुटा था
पावभर चावल का निवाला
मिल बाँट कर खा पी कर
तत्क्षण वे संतुष्ट हुए
श्रम बूँद जब पास है उनके
कल की कल देखी जायेगी
स्नेह-दीप से रौशन घर को
दीये की नहीं जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह ज्ञान का मंदिर था
जहां नहीं था कोई प्रपंच
न तो कोई अपराधी था
न कोई बनता था सरपंच
अंतरात्मा बड़ी सजग थी
नैतिकता का राज था
अमीर गरीब के भेद से दूर
विद्या ही वरदान था
ज्ञान-दीप से जगमग घर को
दीये की नहीं जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह शहीद कि देहरी थी
जहां हसरतें दबी पड़ी थीं
आँखों में भरकर सन्नाटा
होठों पर सिसकी सुबक रही थी
चिरागे-कुल वतन को देकर
गहन तिमिर में डूबा घर
पर  कहीं कोई शिकवा थी
न कहीं दिखा था उपालम्भ
त्याग-दीप से रौशन घर को
दीये की नहीं जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
द्वार द्वार हम घूमे

वह वृध्दों का आश्रम था
जहां बिखरे  थे  टूटे  सपने
पोपल मुंह खांस खांस कर
ढूंढ रहे थे कोई अपने
जिन पांवों को शक्ति दी थी
जाने किन राहों पर मुड़ गये
जिन पंखों को विस्तार दिया
आज़ाद परिंदे बन उड़ गए
उन अशक्त बुझी नजरों को
दीयों की सख्त जरुरत थी

इक दीया हाथों में लेकर
उस द्वार पर हम रख दिए !!!!
.....................................ऋता
दीपावली कि हार्दिक शुभकामनायें !! 

मंगलवार, 11 जून 2013

कोमल हाथ चुभ गए थे काँच


ताँका........विश्व बाल श्रम दिवस पर-१२ जून

बालक रोया
बस्ता चाहिए उसे
है मजबूर
दिल किया पत्थर
बनाया मजदूर|१|

कोमल हाथ
चुभ गए थे काँच
बहना रोई
भइया आँसू पोंछे
दोनो कचरे बिनें|२|

दिल के धनी
राजा औ' रंक बच्चे
देख लो फ़र्क
एक खरीदे जूता
पोलिश करे दूजा|३|

गार्गी की बार्बी
कमली ललचाई
माँ ने पुकारा
बिटिया, इधर आ
बर्तन मांज जरा|४|

कठोर दिल
कैसी माता है वह
काम की भूखी
बेटी को देती मैगी
कम्मो को रोटी सूखी|५|

........ऋता शेखर 'मधु'