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मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मनवाँ उनका थिरक रहा...





मनवाँ उनका थिरक रहा
मिल गया इस लोक में
वो पथ
जिसे
किसी ने
सजाया सँवारा
सुवासित फूलों को बिछाया
बस कदम धर चल दिए
श्रम के मोती जरा न बहे

खुश किस्मत हैं वो
मिल जाते जिन्हें
बने बनाए रास्ते
किन्तु उस पथ की तो सोचो
जो ले जाएँगे उस लोक
उसे तो स्वयं ही है सजाना
सुकुसुमित विचार है बिछाना
सद्‌भावों के इत्र छिड़क
प्यार की गंगा है बहाना
उस पथ का हमराही न कोई
बस साथ चलेंगे
अपने ही कर्म अपने ही धर्म
निश्छलता और निःस्वार्थता
स्वर्ग द्वार के दो पट नाम
इन्हें यहाँ है अपनाना
फल वहाँ है पाना|

ऋता शेखर मधु