माता तुम निर्माता हो
राष्ट्र की भाग्य विधाता हो
कई भीषण पलों से लड़ी हो तुम
फिर क्यूँ मौन खड़ी हो तुम
आगे बढ़ सँभाल लो
पतन गर्त में जाते नौनिहालों को
माना वे बच्चे नहीं रहे
पर मोहताज हैं मार्गदर्शन को
अपनी चुप्पी तोड़ो तुम माता
तुम्हीं हो संस्कारों की दाता|
नई हवा है, नई लहर है
नए जमाने के कई कहर हैं
तुम्हें बनना ही होगा प्रहरी
बात है यह थोड़ी सी गहरी
अपमानो की करो न परवा
ममता का आँचल न समेटो
भले ही हठी हैं वे
पर ममता की छाँव
अभी भी उन्हें रिझाती है
लू के थपेड़े खाते हैं
वह छाँव उन्हें तब भाती है
मातृ-गर्भ है बड़ी पाठशाला
अष्टावक्र को ज्ञानी बना डाला
भक्त प्रह्लाद ने भक्ति सीखी
हिरण्यकशिपु को लगी यह तीखी
अभिमन्यु ने सीखा चक्रव्यूह का राज
शिवाजी की माता थीं ज्ञानी
पुत्र के आगे वीरता बखानी
नौनिहाल ने इतिहास रच दिया
कण-कण माँ का ऋणी हो गया
माता, अपने अदम्य साहस का
अपनी पर्वतीय धीरता का
अपने आकाशीय विस्तार का
परिचय तो दो
राष्ट्र का नव निर्माण करो
आगे बढ़ो, आगे बढ़ो|
ऋता शेखर ‘मधु’