किसी को इतना न सताओ
कि उसकी मदद को
कायनात चल पड़े...
निर्दोष आँखों में
इतने आँसू न भरो
कि उसे सुखाने
ठंढी बयार चल पड़े...
उज्जवल जीवन में
इतने अंधकार न भरो
कि राह दिखाने
जुगनुओं की जमात चल पड़ें...
सरस कानों में
इतने टंकार न भरो
कि उसे भुलाने
कोयलों की कतार चल पड़े...
निर्मल दिलों में
इतने अंगार न भरो
कि उसे सहलाने
पावस की फुहार चल पड़े...
किसी की राहों में
इतने काँटे न बिछाओ
कि उसे हटाने
पँखुड़ियाँ अपार बिछ पड़ें...
भोलापन ईश्वर की नियामत है
इतनी निर्ममता से न कुचलो
कि उसे गुदगुदाने
तितलियों के पंख मचल पड़ें...
किसी को अपमानों के
इतने घूँट न पिलाओ
कि उसे अमर बनाने
पीयुष की धार चल पड़े...
नाहक किसी के लिए
इतनी नफ़रतें न पालो
कि उसके लिए
सृष्टि का प्यार उमड़ पड़े...
जिसका कोई नहीं
उसके लिए
प्रभु का प्यार है...
प्रकृति का दुलार है...
ऋता शेखर ‘मधु’