बुधवार, 22 अप्रैल 2026

इच्छा मृत्यु

 



उधेड़बुन

"जब से न्यायालय का निर्णय आया है

मन पर उधेड़बुन का गहरा साया है

यह उधेड़बुन निर्णय पर नहीं,

नाम पर है क्योंकि नाम है 'इच्छा मृत्यु'"


"मगर नाम पर  उधेड़बुन कैसा है? "


"मरने वाला अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर पाया।

उसकी इच्छा का कहीं जिक्र न आया।

अस्पताल में जीवन मिलता है

परिजनों का चेहरा खिलता है।

उसे  मृत्यु देने के लिए

जीवनदायिनी यंत्र हटाये गए

भोजन पानी घटाए गए।

वह बेबस बोल नहीं पाया

उसकी तंत्रिकाओं पर था

शिथिलता का साया।

पर उसे महसूस तो होता होगा

मन ही मन वह भी रोता होगा।"


"यह निर्णय तो परिवार का है

उनके थके हुए संसार का है।"


" इसलिए सब कुछ सहज लिया गया।

वेद मंत्रों द्वारा उसको विदा किया गया।"


" मगर बंधु

आज भी मन में एक प्रश्न समाया है।

क्या वृद्धों के लिए भी

इच्छा मृत्यु का समय आया है?"


" यह उधेड़बुन बेमानी है। 

जीवन की ये अवस्थाएँ

आनी हैं तो आनी हैं।"


" बंधु ! समझो मेरी बात

धूप छुपे तो आती रात।

वृद्ध बेबस मजबूर हुए

उनके सपोर्ट सिस्टम 

उनके बच्चे

 घर से कितनी दूर हुए।

रसोई वक्त बेवक्त जगती है

वह भी सगी न लगती है।

तन मन पर भारी असर हुआ है

लगता है जैसे कहर हुआ है।

बदले समय का निर्णय

क्या पारिवारिक विघटन है?

क्या इच्छा मृत्यु के लिए विवश

ये सामाजिक अकेलापन है ?"


प्रश्न तो समय के साथ-साथ

समाधान पा जायेंगे

मगर अभी तो हम

उधेड़बुन में ही जिये जायेंगे।


ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

मिट्टी की खुशबू

 मिट्टी की खुशबू और हम


जिस मिट्टी की तिलक लगाने

हम नीचे झुक जाते हैं

वह चंदन कण बन माथे पर

भारत  का मान बढ़ाते हैं


बारिश की वह प्रथम बूंद है

जो मिट्टी को महकाती है

सोंधी सोंधी खुशबू देकर

पकौडों को ललचाती है

मन मयूर बन जाता है

सतरंगी पँखो को खोले

विविध-भारती गाते हैं


मन सावन जब बने बसंती

दिख जाते हैं कृष्ण-राधिका 

ब्रज-माटी पर बसी प्रीत से

दर्शन की प्यासी बनी साधिका

मिट्टी की खुशबू जब उड़ती 

यमुना तट के कदम्ब पेड़ 

मुरली के राग सुनाते हैं।


मन ही मोहन, मन ही राधा

मन ही गोपियाँ मन अभिलाषा

मिट्टी की खुशबू मन जब मोहे

मीरा की बनती परिभाषा

मिट्टी से ही है जनजीवन 

मिट्टी पर उगकर नवरातों में

अन्न खुशी बरसाते हैं।


माटी घट के शीतल जल में

खुशबू उसकी घुल जाती है

मन वृंदावन हो जाता है

तृषित को तृप्ति मिल जाती है

खुशबू से हो प्रेम अपरिमित

जब तक मिट्टी न बन जायें

 फिर तो सागर इसे बहाकर 

दूर देश ले जाते हैं।


ऋता शेखर 'मधु'