माता-पिता वृद्ध हुए, पुत्र समंदर-पार
बना आज दस्तूर यही, छिन जाता आधार|
बरगद की छाया बने, छौने पर दिन-रात
कुलाँचे भर भाग चला, भूला ममता-प्यार|
बूढ़ी काया है विकल, लगी द्वार पर आँख
कुल-दीपक के वास्ते, देखे पंथ निहार|
दूजा धन लागे भला, खरच किया बिन मोह
निज- धन पर गाँठ सत्तर, माया मोह अपार|
तन्हा राहों पर मिले, चन्द कदम का साथ
बिन अहं के साथ चलो, यह जीवन का सार|
ऋता शेखर ‘मधु’