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गुरुवार, 6 सितंबर 2012

दूजा धन लागे भला,खरच किया बिन मोह-दोहा ग़ज़ल




माता-पिता वृद्ध हुए, पुत्र समंदर-पार
बना आज दस्तूर यही, छिन जाता आधार|

बरगद की छाया बने, छौने पर दिन-रात
कुलाँचे भर भाग चला, भूला ममता-प्यार|

बूढ़ी काया है विकल, लगी द्वार पर आँख
कुल-दीपक के वास्ते, देखे पंथ निहार|

दूजा धन लागे भला, खरच किया बिन मोह
निज- धन पर गाँठ सत्तर, माया मोह अपार|

तन्हा राहों पर मिले, चन्द कदम का साथ
बिन अहं के साथ चलो, यह जीवन का सार|

ऋता शेखर मधु