
मेरी माँ...
अभी तो उसके ही तन का हिस्सा हूँ मैं
ख्वाबों में मुझसे मिल रही है मेरी माँ
पा न जाऊँ कहीं अमावस का अंधकार
जतन से रुपहली चादर सिल रही है मेरी माँ
जहाँ भी लूँ श्वास, सुवास ही मिले सदा
पिटारे में गुलाबौं को गिन रही है मेरी माँ
शीतल समीर संग हिंडोले पर झुला सके
मधुर सरस लोरियाँ गुन रही है मेरी माँ
पाँव तले रहे हरदम मखमली गलीचा
नर्म दूब पर शबनम चुन रही है मेरी माँ
फैली रहे उजास सूरज की हमारे पास
उषा के लाल धागे बुन रही है मेरी माँ
मन मंदिर में पावनता बनी रहे सदा
कपोतो से शांति मंत्र सुन रही है मेरी माँ
न मैंने कुछ कहा, न उसने कुछ कहा
बस हमारी धड़कनें सुन रही है मेरी माँ
मेरे आने की घड़ियाँ गिन रही है मेरी माँ!!!!
..................ऋता शेखर 'मधु'