कुंडलिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कुंडलिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 21 अप्रैल 2019

जागो वोटर जागो

जागो वोटर जागो

अपने मत का दान कर, चुनना है सरकार।
इसमें कहीं न चूक हो, याद रहे हर बार।।
याद रहे हर बार, सही सांसद लाना है।
जो करता हो काम, उसे ही जितवाना है।
सर्वोपरि है देश, जहाँ पलते हैं सपने।
'मधु' उन्नत रख सोच, चुनो तुम नेता अपने।।१

जिम्मेदारी आपकी, चुनने की सरकार।
सजग भाव से लीजिये, अपना यह अधिकार।।
अपना यह अधिकार, भला क्योंकर खोना है।
देकर अपना वोट, वहाँ शामिल होना है।
पक्की कर लो 'ऋता', चुनावी हिस्सेदारी।
चुनने की सरकार, हमारी जिम्मेदारी।।२

जागो नेता देश के, खूब बजाओ ढोल।
जी भर-भर के खोल दो, इक दूजे की पोल।।
इक दूजे की पोल, बड़ी लगती है प्यारी।
भाषाओं की लोच, निरीह लगे बेचारी।
त्यागो 'मधु' आलस्य को, वोट देने को भागो।
दो झूठों को सीख, देश की जनता जागो।।३

जनशासन में वोट का, सबको है अधिकार|
योग्य पात्र को तौलकर, बटन दबाओ यार||
बटन दबाओ यार, यही है भागीदारी |
दलबदलू के साथ ,न करना रिश्तेदारी|
स्वयं रहे जो नेक, निभाता वह अनुशासन|
'ऋता' है खुशनसीब, यहाँ पायी जनशासन||४

सारे नेता भ्रष्ट हैं, रखें न ऐसी सोच|
प्रजा कुशल है जौहरी, कहाँ रहे फिर लोच||
कहाँ रहे फिर लोच, परख कर लायें हीरा|
ढूँढ निकालें आप, उष्ट के मुँह से जीरा|
'मधु', तुम जाओ बूथ, वोट दो सुबह सवारे|
रखो न ऐसी सोच, भ्रष्ट हैं नेता सारे ||
--ऋता शेखर 'मधु' 

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

कलकल नदिया है बही, छमछम चली बयार -कुंडलिया

कलकल नदिया है बही, छमछम चली बयार |
गिरिराज हैं अटल खड़े, लिए गगन विस्तार ||
लिए गगन विस्तार, हरी वसुधा मुस्काई ,
दूर्वा पर की ओस, धूप देख कुम्हलाई ||
तितली मधु को देख, मटक जाती है हरपल ,
छमछम चली बयार, बही है नदिया कलकल ||

गरिमा बढ़ती कार्य से, होता है गुणगान |
जग में सूरज चाँद सम, मिले सदा सम्मान||
मिले सदा सम्मान, नाम जग में होता है,
करते जो आलस्य, स्वप्न उनका खोता है |
ऋता करे स्वीकार, सतत प्रयत्न की महिमा,
होता गुणगान, कार्य से बढ़ती गरिमा ||

मन मन्दिर में शोभते, शिव सम सरल विचार |
सुधा-कलश को बाँटकर, गरल करें स्वीकार ||
गरल करें स्वीकार, जगत रौशन कर जाएँ ,
शीतल विल्व समान, मनः संताप मिटाएँ ||
मधु फूलों के बाग, सोहते ऋतु मगसिर में ,
शिव सम सरल विचार, शोभते मन मन्दिर में||

क्रंदन दिल को चीर कर, ढूँढे दृग की राह |
जाने टूटे स्वप्न हैं, या दरकी है चाह ||
या दरकी है चाह, व्यंग्य की सुन सुन बातें ,
मन को देतीं दंश, विरह की काली रातें ||
रजत किरण की धार, रोम को देतीं स्पंदन,
मनभावन वह चंद्र, सोखता दिल का क्रंदन||

संबोधन के शब्द में, होते गहरे राज|
कर्कश, नम्र, विनीत या, कहीं दिखाते नाज ||
कहीं दिखाते नाज, कुसुम बन कर सजते हैं,
सही बँधे जब तार , सप्तसुर ही बजते हैं |
'मधु' ये रखना ध्यान, कर्णप्रिय हो उद्बोधन,
होगी अच्छी सोच, मधुर होंगे संबोधन||

--ऋता शेखर 'मधु'

मन के भीतर धैर्य हो, अधरों पर मुस्कान-कुंडलिया

जीवन यात्रा अनवरत, चली सांस के साथ |
मध्यम या फिर तीव्र गति, स्वप्न उठाती माथ ||
स्वप्न उठाती माथ, कभी रोती या हँसती |
करती जाती यत्न, राह से कभी न हटती|
पढ़ कर हर पग पाठ,'ऋता'' बनती है छात्रा|
चुक जाएगी सा़ंस, रुकेगी जीवन यात्रा||

जिनके हिय में हरि बसे, वे हैं साधु समान|
परहित को तत्पर रहें, लेकर के संज्ञान|| 
लेकर के संज्ञान, स्वयं आगे आ जाते |
भेदभाव को छोड़, सबको गले लगाते |
' मधु डूबी मझधार, सहारा बनते तिनके|
होते साधु समान, हृदय में हरि हैं जिनके ||'

ममता की जो खान है, घर की है वह जान |
बिन बोले सब कुछ सहे, त्यागे निज अरमान ||
त्यागे निज अरमान, उसे कहते हैं नारी |
बेलन, शिक्षा के साथ, जीतती दुनिया सारी ||
'मधु'को होता गर्व, देखकर उनकी क्षमता |
मन की वह मज़बूत, जोड़ती जाती ममता ||

माना जीवन -पथ नहीं, होता है आसान।
मन के भीतर धैर्य हो, अधरों पर मुस्कान।।
अधरों पर मुस्कान, राह को सरल बनाती,
खग -गुंजन के साथ, ऋचा वेदों की आती।।
भोर-निशा का राज, प्रकृति से हमने जाना।
पतझर संग बसन्त,राह जीवन की माना।

-ऋता शेखर 'मधु'





सोमवार, 12 नवंबर 2018

होते हैं दिखते नहीं, होते कई हजार



होते हैं दिखते नहीं, होते कई हजार।
मन के भीतर के बने, तोरण वाले द्वार।।
तोरण वाले द्वार,सहज होकर खुल जाते।
मन के जो शालीन, मार्गदर्शक बन आते।
कहे ऋता यह बात, व्यंग्य से रिश्ते खोते।
हवा गर्म या सर्द, नहीं दिखते पर होते।।
===========================

नारंगी शुभता रचे, श्वेत दलों के साथ।
धरती पर गिरकर चढ़ें, शंकर जी के माथ।।
शंकर जी के माथ, निखर कर ये इतराते।
लिए समर्पण भाव, गौरवान्वित हो जाते।
मधुर धुनों के बीच, छाप छोड़े सारंगी।
पारिजात के मध्य, रचे शुभता नारंगी।।
=========================

रातें ज्यों सूनी हुईं, पसर गयी है याद।
पल पल युग युग सा लगे, नीरव हैं संवाद।।
नीरव हैं संवाद, हृदय दूर कहीं भटके।
चिंतन की भरमार, लगाते सौ सौ झटके।
ऋता बघारे ज्ञान, मधुर हैं उसकी बातें।
विचरण करते छंद, हुईं सूनी ज्यों रातें।।

=========================

धरती की है सम्पदा, हरे हरे ये पेड़
रे मनुज! निज स्वार्थवश, तू मत इनको छेड़।।
तू मत इनको छेड़, रूठ जाएगी छाया।
सूखेंगे जब खेत, चली जाएगी माया।
छींट ऋता कुछ बीज, जहाँ धरती है परती।
बढ़े मनुज की कीर्ति, हरी हो ज्यों ज्यों धरती।।
=============================

बालक हो या बालिका, दोनों हैं अभिमान।
एकरूप शिक्षा मिले, इतना रखिए ध्यान।।
इतना रखिए ध्यान, पुष्ट हो जाएं तन से।
नज़रों से सम्मान, शिष्टता छलके मन से।
ऋता कहे यह बात, वही है अच्छा पालक।
सदा रखे समभाव, बालिका या हो बालक।।
===========================

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

जल है तो कल है

Image result for dry earth

जल है तो कल है
1.
तरसे हैं इक बूँद को, महानगर के प्रांत
सूखी धरती चीखती, नदिया पड़ी है शांत
नदिया पड़ी है शांत, विकल हैं पौधे सारे
सिसके प्यासे कंठ, वृद्ध बालक भिनसारे
गगन रहा है ताक, मेघ बिन कैसे बरसे
हरियाली से हीन, मनुज पानी को तरसे
2.
मोटर को देते चला, फिर जाते हैं भूल
व्यर्थ बहे जल धार बन, हो जाता निर्मूल
हो जाता निर्मूल, कहीं पड़ता है सूखा
बाँझ बने हैं खेत, कृषक रह जाता भूखा
हम से ही है देश, हमीं हैं सच्चे वोटर
जाया ना हों नीर, चलाएँ ऐसे मोटर
3.
भइया जी ने आज से ,दिया नहाना छोड़
लम्बी कतार में मची, पानी पाने की होड़
पानी पाने की होड़, लड़ाई की जड़ होती
बलवानों की जीत, यहाँ अपनापन खोती
फेल हुई सरकार, हिली है उसकी नइया
मिल पाए ना नीर, नहा पाए ना भइया
4.
रूठे हैं बादल यहाँ, बरस न पाए नीर
धरती तप्त तवा बनी, कहें दरारें पीर
कहें दरारें पीर, नमी को किस विधि खींचे
सुप्त पड़ा है कोख, बीज फिर कैसे सींचे
इतना रखना याद, पेट भरते ना जूठे
बहुतायत हो पेड़, रहें ना बादल रूठे
-ऋता शेखर 'मधु'

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

चल री पवन-कुंडलिया

Image result for रक्षाबंधन 2015
40.
राखी के त्यौहार में ,भाई आया द्वार
अँखियों में आई चमक, खुशियाँ मिली अपार
खुशियाँ मिली अपार, सजे अक्षत और रोली
रेशम धागा बाँध, बहन दिल से खुश हो ली
भरती हैं आशीष, हरिक धागे में पाखी
हर सावन में भ्रात, पिरोऊंगीं मैं राखी
39.
मिलकर एक- एक रहें, ग्यारह बने महान
पूर्ण करें हर काम को, लेते जब वे ठान
लेते जब वे ठान, कैद कर लेते धारा
मरु कर जाते पार, रहे थार रहे सहारा
रेशा रेशा सूत, वस्त्र बन जाते सिलकर
होता बल का भान, रहें एक एक मिलकर
38.
किलकारी रौशन रहे, ऐसा बने प्रयास
बालक हो या बालिका, सबको मिले मिठास
सबको मिले मिठास, सृष्टि को दोनों प्यारे
दें कन्या को मान, हर्ष से हक़ दें सारे
पाकर पानी खाद, महक जाती फुलवारी
सम पालन की रीत, रखे रौशन किलकारी
37.
सावन की आई झड़ी, घर में आया तीज
हुलसा मन खिलते सुमन, चहका है दहलीज़
चहका है दहलीज़, हरी कलाइयाँ खनकी
शोभित है परिधान, बिंदिया मुख पर चमकी
होती पूजा आज, पार्वती शिव पावन की
कजरी गाए बूँद, झड़ी आई सावन की
36.
गरिमा संसद की रहे, परिभाषित हो देश
रखना जनसेवक वहाँ, अनुशासित परिवेश
अनुशासित परिवेश, वतन का मान बढ़ाता
हंगामा आक्षेप, हँसी का पात्र बनाता
सुष्मित रहे स्वराज, बढ़े भारत की महिमा
सद्भावी माहौल, रखे संसद की गरिमा
35.
भरता सूरज लालिमा, प्राची में हर भोर
जग जाते इंसान खग, शोर मचाते ढोर
शोर मचाते ढोर ,कृषक खेतों में जाते
बैलों की थामे डोर, उमंगित होकर गाते
धरती का नैराश्य, अरुण उषा संग हरता
पूरब में हर भोर, लालिमा सूरज भरता
34.
चल री पवन उड़ा ध्वज़ा,बढ़ा गगन की शान
केसर- श्वेत- चक्र- हरा, जगा रहे अरमान
जगा रहे अरमान , हिन्द हो जग में न्यारा
मिटे रंक की भूख, धर्म हो सबका प्यारा
भारत माँ की गोद, शुभ्र ज्योत्स्ना तू पल री
कुसुमित हो जा आज, फहर जाने को चल री
**ऋता शेखर 'मधु'

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

काली कोयल सुर मधुर-कुंडलिया छंद

Image result for कोयल
33.
काली कोयल सुर मधुर, गुण का करे बखान
सूरत से सीरत भली, देती है संज्ञान
देती है संज्ञान, सदा सद्भावी  रहना
नम्र रहे व्यवहार, वही मानव का गहना
मनहर हो जब पुष्प, पुलक जाता है माली
कानों में रस घोल, कूकती कोयल काली
32.
पलकें ही तो बांधतीं, आँसू की हर बूँद
घनी पीर के मेघ को, आँखों में लें मूँद
आँखों में लें मूँद, दर्द की सीली भाषा
बन जाए हथियार, बदल देती परिभाषा
शब्द सुमन के साथ, भाव के घट जब छलकेँ
खुशियाँ बनतीं बूँद, बाँध ना पातीं पलकें
31.
कठपुतली सी जिंदगी, नाच रही बिन शोर
सधे हाथ से साधती, यह सुख दुख की डोर
यह सुख दुख की डोर, चक्र के जैसे चलती
ज्यों बासंती आस, झरे पत्तों में पलती
स्थिर रहती है चाल, सुदृढ़ होती जब सुतली
स्वाभिमान के साथ, बने रहना कठपुतली
30.
तप की रक्षा के लिए, मुनि माँगे रघुनाथ
दशरथ ने तब काँपकर, जोड़ दिए थे हाथ
जोड़ दिए थे हाथ, चौथपन में सुत पाया
राम न माँगें आप, माँग लें गौ धन माया
''राक्षस करते भंग, यज्ञ प्रक्रिया ऋषि-जप की
राम लखन के साथ, सुरक्षा होगी तप की''

29.
नीले अम्बर के तले, बसते हैं इंसान
मज़हब माटी के लिए, बन जाते हैवान
बन जाते हैवान, खेलते खूनी होली
दिल में रखकर स्वार्थ,बोलते नकली बोली
वे संवेदनहीन, गिनें मौतों के टीले
मौन हुए मासूम, लाल में डूबे नीले
--ऋता शेखर "मधु"