तुम ही मेरे राम हो, तुम ही हो घनश्याम|
ओ मेरे अंतःकरण, तुम ही तीरथ धाम||
तुम ही मेरा काव्य हो, तुम ही मेरा ग्रन्थ
आलोचक बनकर सदा, सही दिखाते पन्थ||
ईश्वर के दरबार में झूठ कभी मत बोलो|
हो जाए गर भूल तो मन ही मन में तोलो|
दिल में अपने झाँक कर खुद से खुद को परखो,
करके पश्चाताप फिर मन की परतें खोलो|
साँवरे कान्हा श्याम, मनोहर कृष्ण मुरारी|
सांवरिया को देख, हृदय उनपर ही वारी|
सुन वंशी की तान, पुलकित राधिका प्यारी|
गिरधर की है मीत, लली वृषभानु कुमारी|
सोच रही हूँ सोन चिरैया फिर से वापस आएगी|
फुदक फुदक हर डाल डाल पर मीठे गीत सुनाएगी|
पर लगता है भूल वतन को,अभी तलक वह रूठी है।
संजीदा बन देख रही क्या वह वादोँ की झूठी है।।
जीवन वापस लौट चलो अब गाँव जहाँ हम खेल रहे थे|
पेंग भरा मनभावन झूलन आँगन में हम ठेल रहे थे||
भोर भई जब कोयलिया कुहकी तरु मंजर से जमता है|
डोल रही अब सांध्य घड़ी मन भी घनश्यामल में रमता है||
................ऋता