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शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

गंगा चली, चली रे धारा - गंगोत्पत्ति (28 April) पर विशेष





गंगा की धारा
वैशाख शुक्ल सप्तमी तिथि          
बह्मा कमण्डल से उत्सर्जित
चरण-स्पर्श श्रीविष्णु के करती
विष्णुपदी धारा देवसरिता की|

प्रचण्ड   भीषण  हिमशीतल
गंगोत्री गोमुख है उद्‌गम-स्थल
शिव की जटाओं में नाचती
पावन पवित्र धारा भागीरथी की |

भगीरथ प्रयास को सराहती
उग्र वेग को संभालती उतरती
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को धरा पर आती
पतितपावनी धारा जाह्नवी की |


पंचप्रयाग से मचलती बहती
शिवालिक की गोद में खेलती
हरिद्वार को सुपावन करती
पापनशिनी धारा अलकनंदा की|

तीर्थराज प्रयाग से गुजरती
शिवनगरी से दिशा बदलती
कृषि क्षेत्र मगध को पखारती
शांत सरल धारा मंदाकिनी की|


भीष्म की जननी है गंगा
सर्वरोगविनाशिनी है गंगा
माताओं की गोद भरी रखती
सौभाग्यदायिनी धारा गंगामाता की|


साठ  सहस्र  सगर  पुत्रों को
मुनि-शाप से मुक्त कराने आई
पितृणों को मुक्ति देने वाली
मोक्षदायिनी धारा पुण्यसलिला की |


विषाक्त तत्वों  को  समेटती
मानव सृजित गंदगी बटोरती
नि:शब्द  हाहाकार   करती
कलिमलहरणी धारा पद्मगंगा की|

सुन्दरवन में सह-नदियों के संग
हिन्द महासागर में विलीन होती
अनन्त यात्रा को निकल जाती
कल्याणकारी धारा गंगा सागर की|

सौभाग्यशाली हैं हम भारतवर्ष प्यारा देश है हमारा |
यहाँ ज्ञान विज्ञान परमज्ञान है और है गंगा की धारा ||


ॠता शेखर मधु

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

मन का मेटाबॉलिज़्म


खाने की मेज पर
थालियाँ लगी थीं
सजे थे उनमें
भाँति भाँति के व्यंजन
चावल पड़े थे
दो-एक रोटियाँ भी
कटोरी भर दाल
हरी सब्जियाँ भी
मनभावन रायता
चटपटे अचार भी
पापड़ सलाद
थोड़ी स्वीट डिश भी

ये सारे खाद्य पदार्थ
पेट में जाने थे
अकेला पेट
इतने सारे क्लिष्ट भोजन
इन्हें रक्त में समाना था
इसलिए विरल को सरल बनाना था
ठोस को तरल सा बहाना था

हमारा मन भी तो
पेट जैसा ही है
वहाँ भी परोसे जाते
भाँति भाँति प्रकार की
संवेदनाएँ
कड़वे या मीठे बोल
मार्मिक या मनभावन दृष्य
कठोर या स्नेहिल स्पर्श
पर ये मन
क्यूँ आत्मसात् नहीं कर पाता
क्लिष्ट संवेदनाएँ
पेट की तरह
क्यूँ हम नहीं बना पाते इन्हें
इतना सरल तरल कि
ये मन पर भार न छोड़ें
क्या मन का मेटाबॉलिज्म इतना कमजोर है ?

ऋता शेखर मधु


सोमवार, 23 अप्रैल 2012

चपल चंचल चोर




गूगल से साभार













ओ नार नवेली                                                           
तुम हो अलबेली,                                                                  
ओ छैल छबीली
करती अठखेली,
तुम चपल चंचल हो
तुम  चोर  भी  हो|

मुखड़ा को चुराया  चन्दा से                                            
बन  गई  तुम चन्द्रमुखी
आँखों को चुराया  हिरणों से
कहलाई  तुम  मृगनयनी
घटा  को  चुराया  मेघों  से
अपनी जुल्फों पे सजा लिया
पंखुड़ी को चुराया  गुलाबों से
अपने होठों पे  लगा  लिया
हंसों  की  पतली  ग्रीवा से
अपनी गर्दन को बना लिया
सफ़ेदी चुरानी थी  दूधों  से
बैठ उसी  में  नहा  लिया

इतनी सारी चोरी करके
बन गई तुम रुपवती
यौवन  की  तरुणाई  से
कवि की कविता बनी तुमयुवती

चोरियाँ फिर भी थमी नहीं
बात अभी भी  बनी  नहीं

ओ लावण्यमयी
तुम हो कोमलांगी,
बड़ी अलसाई
लेती अँगड़ाई,
चलने की जब नौबत आई
गजों से चुराया अलमस्त चाल
सबने कहा तुम्हें गज़गामिनी
बोलने की जब नौबत आई
कोयल का हो गया बुरा हाल
मीठे स्वर को चुरा लिया
बन गई तुम कोकिलकंठी
कमल की कमनीयता लेकर
कहलाई तुम कमलकामिनी

रुप यौवन गुणों से भरी आकृति
बनी सृष्टि  की  अनूपम  कृति|

आकृति के अन्दर था एक दिल
.धक्-धक् धड़का तो मन गया हिल
चाहत हुई  कोई  जाए  मिल
कुमार को देखा दिल गया  खिल

फिर से चोरी की इच्छा हुई
नैनों से तीर  चला  दिया
घायल हो गया  राजकुमार
फिर उसके दिल को चुरा लिया
सितारों  की  चोरी  करके
माँग को अपनी सजा लिया
फूलों से खुशबू चोरी कर
बगिया को अपनी महका लिया

ओ ममतामयी
तुम हो जननी,
स्नेह से भरी
प्यार की धनी
ममत्व को कहीं से नहीं चुराया
चीज़ थी तुम्हारी भरपूर लुटाया
इस ममता ने जग को लुभाया
वात्सल्य प्रेम को अमर बनाया|

ओ रुपसी
ओ गुणवती
ओ दयावती
क्रोध में चोरी करना नहीं
अग्नि की ज्वाला चुराना नहीं
ज्वालामुखी बनना नहीं
रौद्रमुखी  कहलाना नहीं|

           ऋता शेखर मधु


पूर्वप्रकाशित-परिकल्पना ब्लॉगोत्सव पर

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

यह सबकी प्रिय वसुन्धरा है - पृथ्वी दिवस(22 April) पर विशेष




पृथ्वी दिवस

यह सबकी प्रिय वसुन्धरा है
सजाया जहाँ सबने बसेरा है
सुन्दर सुकुसुमित सुवासित
रंगीन सजीली हरी  धरा है
कलकल बहती नदियाँ जहाँ हैं
चहचह करते पक्षी वहाँ हैं
आज सब खतरे में पड़ा है
सब हमारा ही किया धरा है
काट जंगलों को हमने ही
धरती को वीरान किया है
पृथ्वी गर्म तवा बनी है
वायु विषाक्त होने लगा है
गंदगी समेट समेट नदियाँ भी
रुक रुक कर बहने लगी हैं
न हवा शुद्ध न जल है शुद्ध
पर्यावरण हो गया है अवरुद्ध
ईश्वर ने दिया हवा पानी भरपूर
अपनी करनी से हो रहे हम
प्रकृति से प्रतिदिन दूर ही दूर
पृथ्वी ने संजोए हैं
पत्थर भी हरियाली भी
पत्थर का कुछ न बिगड़ेगा
हरियाली रूठ चली जाएगी
पछताने से कुछ न मिलेगा
ज़िन्दगी सिर्फ़ आँसू बहाएगी
एक शपथ लें सब मिल आज
वृक्षारोपण ही हो एकमात्र काज
संरक्षित करें पशु पक्षी और वन
प्रदूषण मुक्त करें नदी और पवन|

ऋता शेखर मधु



सोमवार, 16 अप्रैल 2012

शिशु बेचारा



मैं बेचारा बेबस शिशु
सबके हाथों की कठपुतली
मैं वह करुं जो सब चाहें
कोई न समझे मैं क्या चाहूँ।

दादू का मै प्यारा पोता
समझते हैं वह मुझको तोता
दादा बोलो दादी बोलो
खुद तोता बन रट लगाते
मैं ना बोलूँ तो सर खुजाते।

सुबह सवेरे दादी आती
ना चाहूँ तो भी उठाती
घंटों बैठी मालिश करती
शरीर मोड़ व्यायाम कराती
यह बात मुझे जरा नहीं भाती।

ममा उठते ही दूध बनाती
खाओ पिओ का राग सुनाती
पेट है मेरा छोटा सा
उसको वह नाद समझती
मैं ना खाऊँ रुआँसी हो जाती
सुबक सुबक सबको बतलाती।

पापा मुझको विद्वान समझते
न्यूटन आर्किमिडिज बताते
चेकोस्लाविया मुझको बुलवाते
मैं नासमझ आँखें झपकाता
अपनी नासमझी पर वह खिसियाते।

चाचा मुझको गेंद समझते
झट से ऊपर उछला देते
मेरा दिल धक्-धक् हो जाता
उनका दिल गद्-गद् हो जाता।

भइया मेरा बड़ा ही नटखट
खिलौने लेकर भागता सरपट
देख ममा को छुप जाता झटपट
मेरी उससे रहती है खटपट।

सबसे प्यारी मेरी बहना
बैठ बगल में मुझे निहारती
कोमल हाथों से मुझे सहलाती
मेरी किलकारी पर खूब मुसकाती
मेरी मूक भाषा समझती
अपनी मरज़ी नहीं है थोपती।

दीदी को देख मेरा दिल गाता
“ फूलों का तारों का
सबका कहना है
एक हजा़रों में
मेरी बहना है।”

--
ऋता शेखर मधु

 रचनाकार: ऋता शेखर ‘मधु’ की बाल कविता - शिशु बेचारा http://www.rachanakar.org/2011/07/blog-post_8693.html#ixzz1s0YHyqYl

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

परी देश की शहज़ादी





परी देश की शहज़ादी
दूर देश से आई थी
मधुर-मधुर सी थिरकन को
पांवों में भरकर लाई थी
मंद स्मित मुस्कानों को
होठों से छलकाई थी
मिश्री सी वाणी की उसने
रागिनी फैलाई थी
दौड़-दौड़ घर उपवन में
तितली सी हरषायी थी
पापा-मम्मी की प्यारी बिटिया
अपने घर की धड़कन थी
वक्त को पर लगे होते
अब वह प्यारी दुल्हन थी|

आँखों में रंगीले ख़्वाब लिए
सोने के पिंजड़े में कैद हुई
पायल की बेड़ी ऐसी बंधी
थिरकन उसकी थम  गई
व्यंग्य बाणों से बिंध-बिंध कर
होठों पर मायूसी थी
तान नहीं,
ताने सुन-सुन कर
स्वर में अब खामोशी थी
अब भी वह सुंदर लगती थी
पर सोन तीलियों से टकरा-टकरा
पंख टूट गए थे उसके
अरमानों के चीथड़े चुनती
अब वह सुखी गृहिणी थी|

ऋता शेखर मधु

दूर से सुखी, संतुष्ट और खुश दिखने वाली गृहिणियों के दिलों में झाँक कर देखा है,तब इसे लिखा है.

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मनवाँ उनका थिरक रहा...





मनवाँ उनका थिरक रहा
मिल गया इस लोक में
वो पथ
जिसे
किसी ने
सजाया सँवारा
सुवासित फूलों को बिछाया
बस कदम धर चल दिए
श्रम के मोती जरा न बहे

खुश किस्मत हैं वो
मिल जाते जिन्हें
बने बनाए रास्ते
किन्तु उस पथ की तो सोचो
जो ले जाएँगे उस लोक
उसे तो स्वयं ही है सजाना
सुकुसुमित विचार है बिछाना
सद्‌भावों के इत्र छिड़क
प्यार की गंगा है बहाना
उस पथ का हमराही न कोई
बस साथ चलेंगे
अपने ही कर्म अपने ही धर्म
निश्छलता और निःस्वार्थता
स्वर्ग द्वार के दो पट नाम
इन्हें यहाँ है अपनाना
फल वहाँ है पाना|

ऋता शेखर मधु

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

क्यूँ कभी-कभी...उलझनों की दास्ताँ




क्यूँ कभी-कभी
उमड़ आते भाव
भिगोते जाते
हृदय की परतों को
कई भूली यादों को|१|

क्यूँ कभी-कभी
छलक उठते हैं
धैर्यहीन से
अँखियों के गागर
दिखलाते सागर|२|

क्यूँ कभी-कभी
मन भटकता है
किसी खोज में
करूँ कुछ तो ऐसा
यादगार जो बने||३|

क्यूँ कभी-कभी
हथेली मसलते
बेबस बन
छूट रहा हो जैसे
किसी निज का साथ|४|

क्यूँ कभी-कभी
होकर भी न होते
सबके साथ
पथराई सी आँखें
देखती हैं सन्नाटे|५|

क्यूँ कभी-कभी
सँभल नहीं पाते
रिश्तों की डोर
न अहं अहंकार
फिर भी टूट जाते|६|

क्यूँ कभी-कभी
निर्दोष होकर भी
खुद को पाते
कटघरे में स्तब्ध
बन जाते निःशब्द|७|

क्यूँ कभी-कभी
होता है एहसास
वक्त जा रहा
कर न पाए वह
जो दिल ने चाहा था|८|

क्यूँ कभी-कभी
सुँदर सा सपना
लगे जीवन
कभी डरावना सा
विकट अँधेरा सा|९|

क्यूँ कभी-कभी
हमें कैद करते
प्रश्नों के घेरे
बहुत सारे ऐसे
जो हैं अनुत्तरित|१०|

क्यूँ कभी-कभी
दुनियादारी नहीं
आ जाते भाव
दार्शनिकता भरे
जग बेमानी लगे|११|

क्यूँ कभी-कभी
मन बनता जाता
अँधरी गुफ़ा
उलझनों की दास्ताँ
हो नहीं पाता बयाँ|१२|

ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

हे प्रभु! उन्हें माफ कर...





हे प्रभु!
हे यीशु!
सदियों पहले
आवाज़ उठाई थी तुमने
अंधविश्वास के ख़िलाफ़
और ठोक दिए गए थे
कीलों से
सलीब पर,
तुम प्रभु थे
तुम्हें मालूम था
आने वाले समय में
हर वो मनुष्य ठुकने वाला है
जो आवाज उठाएगा
अराजकता के खिलाफ़
बेईमानी के खिलाफ़
हिंसा के ख़िलाफ़
झूठ के ख़िलाफ़
सलीब पर चढ़ा
वो कुछ कर न पाएगा
क्योंकि
सच्चाई विनीत होती है
ईमानदारी नम्र होती है
नैतिकता सर झुकाए रहती है
उनके पास वो गरल नहीं
जो सज़ा दे पाए
वो भी हाथ जोड़े
सिर्फ़ यही दोहराएगा
हे प्रभु ! उन्हें माफ़ कर!
उन्हें माफ़ कर!

ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

समीक्षा


दिलबाग विर्क जी की मार्च में प्रकाशित हाइकु संग्रह-''माला के मोती " में मेरी समीक्षात्मक भूमिका

श्री दिलबाग विर्क को मैं अंतरजाल के माध्यम से जानती हूँ अंतरजाल पर उनके अपने ब्लॉग्स हैं इसके अलावा वे कई अन्य साझा ब्लॉग्स पर सक्रियता से योगदान देते हैं मैं उनकी रचनाएँ अंतरजाल पर पढ़ती रहती हूँ जो मुझे बेहद पसंद आती हैं लगभग हर विधा जैसे छंद ग़जल कविता समीक्षा लघुकथा हाइकु ताँका इत्यादि में उन्हें महारथ हासिल हैं|


प्रस्तुत पुस्तक 'माला के मोतीएक हाइकु संग्रह है इसमें हाइकुओं की संख्या 518 है  अपने नाम के अनुरूप इस हाइकु संग्रह रूपी माला में हर हाइकु चमकीला मोती है विचारों के गहरे सागर से निकला हर एक मोती अपनी चमक की ओर आकर्षित कर लेता है बहुत सारे भावों से सजे हर मोती के अपने ही रंग हैं जो हर वर्ग के पाठकों को अवश्य पसंद आएँगे ऐसा मुझे विश्वास है मैंने विर्क जी के हाइकुओं पर आधारित हाइगा बनाया है उनके हाइकु इतने सारगर्भित होते हैं कि मुझे उसके अनुसार उच्च कोटि के चित्र बहुत ढूँढने पर ही मिल पाते हैं जीवन और समाज के हर पहलु पर लिखे गए उनके हाइकु बहुत बड़े बड़े भाव प्रकट करते हैं |
1)सर्वप्रथम मैं उन हाइकुओं का जिक्र करना चाहू्गी जिनसे उनकी देशभक्ति की प्रबल भावना प्रकट होती है ------
     भारतीयता हमारी जाति भी है और धर्म भी |
     भारतीय हो/ गर्व करना सदा/इसके लिए |
     भारत मेरा/ ये कहने का हक/ न छीनों तुम |
     देशवासियो/ मर मिटना सदा/ देश के लिए |
 2)राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम की बानगी देखिए-----
     नहीं स्वीकार्य/ हिंदी के मूल्य पर/ मातृभाषा भी |
     भाषा जोडती/ लोगों को आपस में/ तोडती नहीं |
     माला के मोती/ हैं राज्य भारत के/ हिंदी का धागा |
3)राजनीति के प्रति उनके बेबाक हाइकु बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करते हैं -------
     हर शाख पे/ बैठ गए हैं उल्लू/ खुदा ! खैर हो |
     बुरे हैं नेता/ हैरानी किसलिए/ आदमी वे भी |
     विकल्प कहाँ/ जनता के सामने/ राजनीति में |
     अच्छे व्यक्ति थे/ राजनीति में कूदे/ बुरे हो गए |
     न कर्म में है/ न शुचिता सोच में/ वस्त्र सफेद |
     मिले सबको/ वो हाथ जोडकर/ नेता ही होगा |
     खादी जारी है/ फैंक चुके चरखा/ कूड़ेदान में |
4)हाइकु में प्रयोग किए गए उनके प्राकृतिक बिम्ब इतने सटीक होते हैं जो सीधे मन में उतर जाते हैं-
     बदलो सोच/ पंक न देखकर/ पंकज देखो |
     मीठा बोलना/ कोयल की कुहुक/ देती ये संदेश |
     नियमों पर/ चलती पूरी सृष्टि/हम क्यों नहीं ?
5) न्याय व्यवस्था पर करारा प्रहार किया है  जो वस्तुस्थिति को बिल्कुल स्पष्ट कर देते हैं -------
     न्याय न कहो/ देर से मिला न्याय/ अन्याय ही है |
     नौ दिन बीते/ चला देश का न्याय/ अढाई कोस |
6) निराश मन को वे हाइकु में इस तरह से समझाते हैं ---------
     पलायन तो/ समाधान नहीं है/ समस्याओं का |
     बनो निडर/ जीतने से रोकता/ हारने का डर |
     अवसर को/ बटोरना सीख लो/ दोनों हाथों से |
     पास जिसके/ हिम्मत की बैसाखी/ अपंग नहीं |
7)इस हाइकु में बोन्साई शब्द का अनूठा प्रयोग उनकी साहित्यिक कला को बखूबी दर्शाता है -----
     मानव मूल्य/ वर्तमान युग में/ बोन्साई हुए |
8)गरीबों के जीवन का कितनी सहजता से वर्णन किया है-ये देखिए --------
     जमीं बिस्तर/ छत्त आसमान है/ ये भी जीवन |
9)मानव स्वभाव को वर्णित करते ये हाइकु कितने सटीक हैं इन्हें देखकर पता चलता है ---------
     गीता पढता/ फल की चिंता मन/ छोड़ता नहीं |
         ये दुनिया है/ झुकते पलड़े की/ तेरी न मेरी |
10) उनकी सकारात्मक सोच का उदाहरण हैं ये हाइकु -------
     कैसे आएँगी/ बंद दरवाजों से/ सूर्य रश्मियाँ |
     अधिकार हैं/ तो कर्तव्य भी होंगे/ याद रखना |
     आधा भरा था/ दिखा है आधा खाली/ बात सोच की |
     कलाकार वो/ पत्थरों में ढूंढता/ कलाकृति जो |
     खौफखतरे/ सिर्फ डराते नहीं/ जगाते भी हैं |
         खुदा पाना है ?/ काफी एक योग्यता/ मैं को मारना |
     भारी पड़ता/ अँधेरी रात पर / एक चिराग |
 11) एक सपाटबयानी देखिए --------
      खोया हमने/ भविष्य की खातिर/वर्तमान को |
12) इस छोटी सी हाइकु कविता में कितना बड़ा आवाहन छुपा है -----
     ओ परदेसी/ लौट आओ वतन/ पुकारें रास्ते |
13) किसानों के सपने नई फसल के साथ किस तरह जुड़े रहते हैं वह इस हाइकु से स्पष्ट है------
     लहलहाई/ गेंहूँ की वल्लरियाँ/जागे स्वप्न |
14) कुछ भावपूर्ण हाइकुओं पर भी नजर डाल लेते हैं -------
     ले अंगडाई/ बसंत में जीवन/फूटें कोंपलें |
     बरसने दो/ दिल की जमीं पर/ प्यार की बूँदें |
15)बुजुर्गों की और राष्ट्र  की उपेक्षा बताता है यह हाइकु-----
     पेड़ को भूले/ टहनियों से प्यार/ कितने मूर्ख ?
16) नारी जीवन सदियों से नारी होने का मूल्य पुरुष-प्रधान समाज में चुकाती आई है|
सामाजिक कुरीतियों का शिकार होती आई हैये हाइकु इसका स्पष्ट उदाहरण हैं -------
     न मारो बेटी/ वधू भी तो होती है/ किसी की बेटी |
     घट रही है/लडकियों की संख्या/ दोषी है कौन ?
     नारी को न्याय/ राम भी न दे पाया/ देखो दुर्भाग्य |
     भ्रूण की हत्या/ है मातृत्व की हत्या /क्यों चुप है माँ ?
17)अन्त में वह हाइकु जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया --------
     आरक्षण हो/ जातिवाद न रहे/ कैसे संभव ?
     मन्दिर में है/ प्रतिरूप खुदा का/ बच्चे में खुद |
                        स्थान सीमित है और कहना बहुत कुछ है तो अब मैं नहीं कहूँगीकहेंगे दिलबाग विर्क जी के हाइकु|
                                   नमस्कार
                                  ऋता शेखर मधु