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शनिवार, 29 सितंबर 2012

बागवान परेशान


दिगम्बर नासवा जी के ब्लॉग पर ग़ज़ल का सबसे छोटा रूप देखा...वैसा उत्कृष्ट तो नहीं लिख सकती पर कोशिश करने में हर्ज़ क्या है...त्रुटियों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ|

बागवान
परेशान

बँगला है
आलीशान

भरा हुआ
सामान

बेटी वाले
भाग्यवान

पुत्र निकला
पाषाण

हृदय का
वियाबान

खाली दिमाग
शैतान

मन में नहीं
सम्मान

शरीर चाहे
विश्राम

जान है तो
जहान

वृद्ध का कमरा
सुनसान

उसे जाना है
श्मशान

ऊपर में
भगवान

धरती पर
इंसान

गाएँ अपनी
दास्तान

ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

इस प्रेम का क्या नाम दूँ...





एक प्रेम के कई रूप हैं
कहीं छांव यह कहीं धूप है
कहीं ये भक्ति कहीं है शक्ति
कहीं विरक्ति तो कहीं आसक्ति|

चमक रही थी चपल दामिनी
अनवरत बारिशों की झड़ी थी
पुत्र-प्रेम में वासुदेव ने
यमुना में ज्यों पांव धरे थे
यमुना क्यों उपलाई थी
पग कान्हा के छूकर उसने
अपनी प्यास बुझाई थी|
वात्सल्य-प्रेम में कान्हा के
यशोदा भी हरषाई थी|
कौन सा था प्रीत कान्हा
कौन सा वह राग था
शायद मधुर सी रागिनी से
बह रहा अनुराग था
बेबस बनी थी राधा प्यारी
लोक-लाज भूली थी सारी|
भक्ति में डूबी थी मीरा
महलों की वह रानी थी
मन के ही एहसास थे उनके
बन गई कृष्ण-दीवानी थीं|

निष्ठुर बने थे मोहन प्यारे
वृंदावन को छोड़ चले
विकल गोपियाँ सुध-बुध खोईं
किस प्रेम में वे थीं रोई|

पितृ-प्रेम में रामचन्द्र ने
वनवास भी स्वीकार किया
परिणीता सीता का पति-प्रेम था
दुर्गम वन अंगीकार किया
भ्रातृ-प्रेम से लक्ष्मण न चूके
उर्मि को विरह का भार दिया|

देख पति की आसक्ति
हाड़ा-रानी विचलित हुई
देश-प्रेम की खातिर उसने
अपने सिर का उपहार दिया
मनु ने झाँसी के प्रेम में
वीरांगना-भेष धार लिया|

पेड़ों से चिपक बहुगुणा ने
वृक्ष-प्रेम का दिया परिचय
जीवों से प्रेम करने का
मनेका का था निश्चय|

संयुक्ता को ले गए स्वयंवर से
प्रेम में कई समर हुए
मन-मंदिर में बसा इक दूजे को
लैला-मजनू अमर हुए|

अमृता की कविता इमरोज
इमरोज के चित्र में अमृता
इस प्रेम का क्या नाम होगा?
नाम से परे
यह एक एहसास है
दूर रहकर भी लगे
वह हमारे पास है
रूह से महसूस करो
चल रही जब तक सांस है
प्रेम की पराकाष्ठा
बन जाता उच्छवास है

प्रभु को प्रेम है कण-कण से
हर जन से हर मन से
प्रेम की बातें मधुरतम
सिर्फ वो ही जानते
जो प्रेम से बढ़कर जगत में
और कुछ ना मानते|

ऋता शेखर मधु
[चित्र गूगल से साभार]


रश्मि दी ने इसे नीचे की लिंक पर लगाया है--
http://vyakhyaa.blogspot.in/2012/09/2.html

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी क्यों मनाते हैं !!




हरितालिका तीज

 यह व्रत भाद्रपद मास की शुक्लपक्ष की तृतीया को किया जाता है|
सुहागिन स्त्रियाँ ही इस व्रत को करती हैं| इस व्रत में शंकर पार्वती
का पूजन करने का विधान है| सुहागिनें इस व्रत को बड़े उल्लास से
मनाती हैं| इस व्रत की कथा इस प्रकार है|
    एक बार पार्वती जी ने शिव जी का वरण करने के लिए
हिमालय पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या आरम्भ की| उनकी तपस्या
को देख नारद मुनि ने जाकर उनके पिता हिमालय से कहा कि
भगवीन विष्णु उनकी कन्या से विवाह करना चाहते हैं| हिमालय ने
इस बात को सच माना और विवाह के लिए हामी भर दी| जब पार्वती जी
को यह बात पता चली तो उन्हें बहुत दुख हुआ| वह विलाप करने लगीं|
उनकी सहेली ने विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने सारी बात बताई
और शिव से विवाह करने का अपना संकल्प दोहराया| अपनी सखी की
सहायता से वह घोरवन में चली गईं और कठिन तपस्या करने लगीं|
भाद्रपद शुक्ल तृतीया को बालू से शिवजी बनाकर पूजा अर्चना कीं| उनकी
तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने दर्शन दिया और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार
करने का वचन दिया| तभी हिमालयराज भी आ गए| उन्होंने भी पुत्री के
जिद को मान लिया और शिव से उनका विवाह करने के लिए तैयार हो गए|
चूंकि पार्वती जी को उनकी सखी हरण कर वन में ले गई थी इसलिए इस
व्रत का नाम हरित-आलिंक पड़ा जो अब हरितालिका व्रत के नाम से जाना जाता है|
उस दिन शिव जी ने यह भी वचन दिया कि भाद्र शुक्ल तृतीया को जो भी सुहागिन स्त्रियाँ इस व्रत को करेंगी उन्हें वे अखंड सौभाग्य का वरदान देंगे|
अतएव सुहागिन स्त्रियाँ इस व्रत का पालन अवश्य करती हैं|
मूलरूप से यह व्रत उत्तर भारत में प्रचलित है|

गणेश चतुर्थी

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चौथी तिथि को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है| इस दिन व्रत रखा जाता है| इस व्रत के करने से सभी प्रकार की बाधाएँ मिट जाती हैं|
इस व्रत की कथा इस प्रकार है-
एक बार भगवान शंकर हिमालय से भीमबली नामक स्थान पर गए|वहाँ पार्वती जी पहले से रह रही थीं| पार्वती जी ने वहाँ एक पुतला बनाकर उसे सजीव कर दिया था और उसका नाम गणेश रखा था| गणेश को उन्होंने गुफा के द्वार पर पहरे पर यह कहकर बिठा दिया था कि कोई अन्दर न आने पाए|
जब भगवान शंकर वहाँ पहुँचे तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया क्योंकि वे उन्हें पहचानते नहीं थे| इसपर शंकर कुपित हो गए| उन्होंने गणेश का सिर काट दिया और अन्दर चले गए| उन्हें अन्दर देख पार्वती जी को आश्चर्य हुआ| उन्होंने शंकर जी से गणेश के बारे में पूछा| शंकर जी ने कहा कि वह बालक धृष्ट था इसलिए उन्होंने उसका सिर काट दिया| यह सुन पार्वती जी विलाप करने लगीं| उन्होंने शंकर जी को बताया कि गणेश उनके पुत्र थे|
शंकर जी चिन्ता में पड़ गए| संयोग से उसी वक्त एक हथिनी ने एक बच्चे को जन्म दिया था| शंकर भगवान ने उसी बच्चे का सिर काट लिया और गणेश के सिर पर जोड़ दिया| गणेश जी का पुनर्जन्म हो गया| यह घटना भाद्र शुक्ल चतुर्थी की है| तभी से इस दिन को गणेश जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है|
                                                    
                                       ऋता शेखर मधु

रविवार, 16 सितंबर 2012

मैं बाहर आने से डरता हूँ




मैं तुम्हारे सपनों का सपना
मैं बाहर आने से डरता हूँ
मुझे ख्वाबों में ही रहने दो|
यथार्थ का धरातल है पथरीला
गिरा, चकनाचूर हो जाऊँगा|
जीवन समुद्र के बड़े भँवर में
फँसा, चक्कर खा जाऊँगा|
जीवन पथ है बड़ा कंटीला
चला, लहुलुहान हो जाऊँगा|
जीवन पथ पर खड़े तुंग हैं
टकरा, औंधे मुँह गिर जाऊँगा|
निराशा की घटा है काली
मिली, अश्रु बन टपक जाऊँगा|
विषाद की पीड़ा बड़ी घनेरी
झेल, सुबक सुबक
सिसकी बन जाऊँगा|
जीवन नैया है हल्की फुल्की
डगमग, लहरों में बह जाऊँगा|
मुझे ख्वाबों में ही रहने दो|
मैं बाहर आने से डरता हूँ|


मैं तुम्हारे सपनों का सपना
मुझे ख्वाबों में ही रहने दो|
निर्मम निष्ठुर पल में खिड़की से
झाँक तुम्हे लुभाऊँगा|
किसी घनघोर विषम घड़ी में
आशा की ज्योत जलाऊँगा|
तोड़ असफलताओ की श्रृंखला
मैं जिगीषा बन जाऊँगा|
बर्बर की उग्रता सह-सह कर
निडरता का पाठ पढ़ाऊँगा|
गरल अपमान का पी-पी कर
पीयुष तुम्हें बनाऊँगा|
अभिराम क्षण में विस्मृत पल
स्मरण करा तुम्हें गुदगुदाऊँगा|
जीवन के वानप्रस्थ में
मैं मुमुक्षु बन जाऊँगा|
मुझे ख्वाबों में ही रहने दो||

           ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

एक साक्षात्कार- हिन्दी रानी से




एक साक्षात्कार- हिन्दी रानी से
हिन्दी रानी भारतवर्ष में रहती हैं। इनकी पहुँच भारतीय संविधान से लेकर घर-घर जन-जन तक है। आम जनता में ये बहुत लोकप्रिय हैं। ये सदियों से यहाँ विराज मान हैं।
हिन्दी रानी के सम्मान और अवहेलना को लेकर हमेशा ही सवाल उठाए जाते रहे हैं।
हिन्दी दिवस के अवसर पर मैंने सोचा कि क्यों न मैं उनसे ही बातें कर लूँ। यह विचार आते ही मैंने झटपट उनसे साक्षात्कार की तिथि निश्चित कर ली। १३ सितम्बर की तिथि निश्चित हुई। मैं उनके घर पहुँची और कॉलबेल दबाया।
दरवाजा खुला और बहुत ही ओजस्वी, गरिमामयी और सुसंस्कृत हिन्दी रानी का पदार्पण हुआ। मैं ने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया। हिन्दी रानी ने भी अतिथि देवो भवः की परम्परा को निभाते हुए मीठी मुस्कान से स्वागत किया।
मैंने बातचीत का सिलसिला शुरू करते हुए कहा-
कल आपका जन्मदिन है, बहुत-बहुत बधाई!
धन्यवाद
आपकी उम्र क्या होगी?’
बासठ वर्ष
सिर्फ़ बासठ वर्ष, किन्तु आप तो यहाँ सदियों से हैं।
सही कहा आपने, भारतीय संविधान में मुझे राजभाषा के रूप में १४ सितम्बर १९४९ को शामिल किया गया, इसलिए मैंने अपनी उम्र बासठ साल बताई।
ओह, फ़िर ठीक है। इस तिथि को आपका जन्मदिवस मनाने का फ़ैसला किसने लिया।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,वर्धा ने १९५३ में सरकार से इसकी अनुमति माँगी, तबसे यह दिन मेरे जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है।
राजभाषा के रूप में आपको शामिल करने की बात संविधान के किस धारा में वर्णित है।
भाग १७ के अध्याय की धारा ३४३(१) में
आपको लिखने के लिए कौन सी लिपि का इस्तेमाल किया जाता है।
देवनागरी लिपि का
विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा में आप किस स्थान पर हैं।
तीसरे स्थान पर
अच्छा, अब आप यह बताएँ कि क्या आपका प्रयोग अंक लिखने के लिए किया जाता है?’
नहीं, हिन्दी प्रेमी अंक लिखने के लिए मेरा इस्तेमाल करते हैं किन्तु संविधान के अनुसार अंतरराष्ट्रीय अंक ही प्रयोग करने का नियम है।
भारतवर्ष में आपका सम्मान होता है या अवहेलना होती है, इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगी।
अब हिन्दी रानी कुछ देर के लिए रूकीं। फ़िर मन्द मुस्कान के साथ बोलने लगीं-
भारतवर्ष में मैं अपनी स्थिति से संतुष्ट हूँ। सर्वप्रथम मनोरंजन की दुनिया को ही लीजिए हिन्दी सिनेमा और दूरदर्शन पर हिन्दी धारावाहिकों के माध्यम से मैं छाई रहती हूँ। ज्यादातर हिन्दी-समाचार चैनल ही देखे जाते हैं, समाचार-पत्रों में हिन्दी समाचार-पत्र ज्यादा लोकप्रिय हैं, साहित्य-जगत में हिन्दी-साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है।
फिर लोग क्यों कहते हैं कि देश में हिन्दी की अवहेलना होती है और हिन्दी उपेक्षित है।
एक बात मैं कहना चाहती हूँ कि जब कुछ लोग आपस में बातें करते हैं, तो जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हैं उनके लिए सामने वाले की आँखों में इज्ज़त का भाव उभरता है, उस समय स्वयं को उपेक्षित महसूस करती हूँ।
उच्च शिक्षा की किताबें भी अंग्रेजी में होती हैं, इस बारे में आपका क्या ख्याल है।
मैं यह मानती हूँ कि मैं थोड़ी जटिल हूँ, इसलिए उच्चशिक्षा में अंग्रेजी से मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
अपने जन्मदिन के अवसर पर आप देश की जनता को क्या सन्देश देना चाहेंगी।
मैं यह कहना चाहती हूँ कि आप जितना सहज अपनी मातृभाषा में रह पाते हैं उतना किसी और भाषा में नहीं। फिर क्यों अपनी भाषा बोलते हुए शर्माते हैं। अपनी भाषा को ससम्मान अपनाइए। मैं प्रवासी भारतीयों की शुक्रगुज़ार हूँ जो विदेश में रहकर भी मुझे सप्रेम अपनाते हैं।
क्या आप अपने प्रचार-प्रसार के लिए किसी को धन्यवाद कहना चाहेंगी।
आधुनिक तकनीक में मैं हिन्दी चिट्ठाकारों(ब्लॉगर्स) को धन्यवाद कहना चाहती हूँ जो बड़े मन से मेरे प्रचार- प्रसार में लगे हैं।
मेरे प्रश्न ख़त्म हो चुके थे।बातें समाप्त करते हुए मैंने कहा,
अच्छा, अब इज़ाज़त दीजिए, हैप्पी बर्थडे टु यू।
जन्मदिन मुबारक हो, कहिए।
मैं मन ही मन शर्मिंदा हो गई।
सॉरीमैंने कहा।
मुझे खेद है, कहिए।हिन्दी रानी ने फिर से भूल सुधार किया।
अब मैंने वहाँ से जाने में ही भलाई समझी।
तभी पीछे से आवाज़ आई, ‘गुड नाइट। हिन्दी रानी मुस्कुरा रही थीं।
मैंने हँसकर शुभ रात्रि कहा और आगे बढ़ गई।
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ऋता शेखर मधु
http://www.rachanakar.org/2011/09/blog-post_6895.html
आगे पढ़ें: रचनाकार: ऋता शेखर मधुकी हिंदी दिवस विशेष रचना : एक साक्षात्कार- हिन्दी रानी से http://www.rachanakar.org/2011/09/blog-post_6895.html#ixzz24a7CQ9p4

रविवार, 9 सितंबर 2012

कैसे बिगाड़ूँ...




कैसे बिगाड़ूँ...

एक बार परमनारायण विष्णु एवं ब्रह्मा जी के सुपुत्र नारद जी भ्रमण के लिए पृथ्वीलोक पधारे| पृथ्वी पर पूजा-पाठ की कमी नहीं थी| हर ओर विष्णु-लक्ष्मी और शिव की पूजा-अर्चना चल रही थी|घर-घर में ओम् जय लक्ष्मी माता एवं ओम् जय जगदीश हरे की आरती हो रही थी|क्या अमीर, क्या गरीब ,सभी पूजा में लिप्त थे| विष्णु भगवान यह सब देख-देख कर प्रसन्न हो रहे थे| खुश होकर उन्होंने सिक्कों से भरी एक थैली एक धनवान सेठ के यहाँ रख दिया| उसके बाद एक गरीब के घर से गुजरे| यहाँ पर उन्होंने उस गरीब को सिर्फ आशीर्वाद दे दिया| नारद मुनि को यह बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी|जो पहले से ही धनवान है उसे ही और धन किसलिए, जबकि धन की आवश्यकता तो गरीब को थी| आखिर उन्हें नहीं समझ में आया तो उन्होंने विष्णु जी से पूछ ही लिया| विष्णु जी के मुख पर मंद मुसकान छा गई| उस वक्त वे कुछ नहीं बोले और आगे बढ़ गए| चलते-चलते जब थक गए तो एक स्थान पर रुक गए| वहाँ पर बैठने के लिए कुछ नहीं था| विष्णु भगवान ने नारद जी को आदेश दिया कि बैठने के लिए कहीं से ईंट लेकर आएँ| नारद जी ईंट की खोज में निकले| कुछ दूर जाने पर उन्हें दो कुएँ मिले| एक कुआँ बहुत सुन्दरता से बना हुआ था, उसकी मुँडेर अच्छी बनी हुई थी| दूसरा कुआँ थोड़ा टूटा-फूटा था|मुँडेर पर जगह जगह पर ईंट निकली हुई थी| नारद मुनि ने टूटे कुएँ से ईंट निकाली और बैठने के लिए ले आए| अब इत्मिनान से दोनों बैठ गए| विष्णु भगवान ने पूछा कि टूटे कुएँ से ही उन्होंने ईंट क्यों निकाला| नारद जी ने कहा-अच्छे कुएँ से ईंट निकालने का मन नहीं हुआ,वहाँ से ईंट निकलते ही उस कुएँ की सुन्दरता खराब हो जाती| टूटे कुएँ से एक ईंट और निकल गया तो क्या हुआ|
अब विष्णु भगवान ने कहा कि तुमने मुझसे जो प्रश्न किया था उसका उत्तर तुम्हे मिल गया| बनी-बनाई चीज को हानि पहुँचाने से पहले हमें भी सोचना पड़ता है| नारद जी ने फिर कुछ नहीं कहा|
ऋता शेखर मधु

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

दूजा धन लागे भला,खरच किया बिन मोह-दोहा ग़ज़ल




माता-पिता वृद्ध हुए, पुत्र समंदर-पार
बना आज दस्तूर यही, छिन जाता आधार|

बरगद की छाया बने, छौने पर दिन-रात
कुलाँचे भर भाग चला, भूला ममता-प्यार|

बूढ़ी काया है विकल, लगी द्वार पर आँख
कुल-दीपक के वास्ते, देखे पंथ निहार|

दूजा धन लागे भला, खरच किया बिन मोह
निज- धन पर गाँठ सत्तर, माया मोह अपार|

तन्हा राहों पर मिले, चन्द कदम का साथ
बिन अहं के साथ चलो, यह जीवन का सार|

ऋता शेखर मधु

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

मेरे शिक्षक




भूल

बात उस समय की है जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती थी|
हम तीन छात्राओं के बीच एक-एक अंक को लेकर मारधाड़
मची रहती थी क्योंकि हम तीनों ही प्रथम स्थान पाने के लिए
प्रयत्नशील रहते थे|

फ़ाइनल परीक्षा शुरु हो चुकी थी|उस दिन अंग्रेजी की परीक्षा थी|
मेरे कमरे में मेरे जीवविज्ञान के शिक्षक गार्डिंग कर रहे थे|मेरा
पेपर लगभग पूरा हो चुका था|प्रश्नपत्र में एक शब्द था ऐट औल,
जिस पर वाक्य बनाना था|मुझे उसका अर्थ नहीं पता था|सिर्फ़
पाँच मिनट समय बच गया था|मैं दो अंक का वह वाक्य गँवाने
के लिए तैयार नहीं थी|मैं ने सर से उसका अर्थ पूछा|वे यह बोलते
हुए निकल गए- आई डोन्ट नो इंगलिश ऐट औल|
मैं ने हड़बड़ाहट में ऐट औलशब्द पर ध्यान नहीं दिया|मुझे लगा
कि उन्होंने साफ़ ही मना कर दिया कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती|

जब मैं घर आई तो मेरे पापा ने मुझसे परीक्षा के बारे में पूछा|
मैंने सारी बात बताई|पापा ने वह वाक्य पूछा जो सर ने कहे थे|
उसे सुन वे हँसने लगे और बताया कि सर ने तो मेरी मदद की थी|
मैं ही नहीं समझ पाई थी|मैं अपनी बेवकूफ़ी पर मुस्कुरा उठी|
दो अंक गँवाने की कसक लिए मैं सो गई|

यह बात मुझे किसी की बात को धैर्यपूर्वक सुनने और समझने
की शिक्षा दे गई| मैं आज भी सर को हर शिक्षक दिवस के दिन
आदरपूर्वक याद करती हूँ|
                                    ऋता शेखर मधु