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रविवार, 19 जून 2016

पिता


पिता.......गीत विधा में

उनके कदमों पर चलकर अब
उनकी ही भाषा बोल रहे
जिनकी बातें तब ना समझे
आदर्श वही अनमोल रहे

हाथ पकड़ हटिया में जाते
चनाचूर जी भर के खाते
रंग बिरंगी हवा मिठाई
हँसकर पापा हमें दिलाते

निर्मल मन की निर्मल थाती
नित नित जीवन में तोल रहे
आदर्श वही अनमोल रहे

क्रोध कभी ना करते देखा
झूठ कभी ना कहते देखा
विनीत सत्याग्रही पिता को
अन्याय भी न सहते देखा

दीवारों पर सजे चित्र को
धीरे धीरे हम खोल रहे
आदर्श वही अनमोल रहे

वे बरगद बनकर छाँव बने
शीतल मनहर सुख गाँव बने
ढक तपन चुभन के छालों को
टूटे सपनों के पाँव बने

इम्तेहान वाले विषयों के
इंग्लिश हिसाब भूगोल रहे
आदर्श वही अनमोल रहे
-----ऋता शेखर 'मधु'.....

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (21-06-2016) को "योग भगाए रोग" (चर्चा अंक-2380)) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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