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गुरुवार, 30 जून 2016

निर्जला - लघुकथा

निर्जला ...
निर्जला व्रत करने की घोषणा की थी घर में कल्याणी देवी ने।
" मगर यह गलत बात है। आपको ब्लड प्रेशर और थाइराइड की समस्या है जिसकी दवा सवेरे खाली पेट में लेनी होती है। तबियत बिगड़ गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे।" कल्याणी देवी के पति महेश बाबू ने समझाने की कोशिश की।
" नहीं जी, मैं कर लूँगी।" सीनियर सिटीजन पत्नी के दृढ निश्चय के सामने उनकी एक न चली।
महेश बाबू का डर निराधार नहीं था। भीषण गर्मी और भीमसेनी एकादशी का निर्जला व्रत, दिन भर एक बूँद जल भी न लेने के कारण कल्याणी देवी परेशानी महसूस कर रही थीं। मन में शांति न थी पर अपनी बात से डिगना भी नहीं चाहती थीं।
वे चुपचाप सोने चली गईं। कुछ देर बाद महेश बाबू ने आवाज़ लगाई तो कोई उत्तर न मिला। घबड़ाकर उन्होंने डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर ने पानी चढ़वाने की व्यवस्था की।
कुछ देर में कल्याणी देवी को होश आ गया।
होश में आते ही उन्होंने पूछा- " किसी ने मेरे मुँह में जल डालकर मेंरा व्रत तो भंग नहीं किया।
डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा-" पानी तो मैंने बाहर से चढ़ाया।"
" तब ठीक है।" निश्चिन्त होकर कल्याणी देवी ने आँखे बंद कर लीं।
-----------ऋता शेखर "मधु"----------

रविवार, 26 जून 2016

गोलट - लघुकथा

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गोलट



पूरे परिवार के लोग घर की बैठक में इकट्ठे हो चुके थे| एक निर्णय होना था जो राशिदा की जिंदगी को पूरी तरह बदल कर रख देता|

राशिदा और दानिश बहन भाई थे| उनकी गोलट शादी रौनक और इमरान के साथ हुई थी| समय के साथ राशिदा के दो बच्चे हुए किन्तु रौनक माँ न बन सकी| इसी कारण दानिश ने रौनक को तलाक दे दिया था और वह मायके आ गई थी| भाई दानिश के इस कदम से राशिदा पर आफत आ गई| घरवालों ने इमरान पर दबाव बनाना शुरु कर दिया था कि वह भी राशिदा को तलाक दे दे|

इमरान क्या फैसला लेगा इसका इल्म किसी को नहीं था| बैठक में राशिदा बदहवाश सी दोनों बच्चों को कलेजे से लगाए बैठी थी|
बस इमरान के आने का इन्तेजार था|
----ऋता शेखर ‘मधु’----

बुधवार, 22 जून 2016

पत्थर की खुशबू - लघुकथा



पत्थर की खुशबू-
''मैं नन बनना चाहती हूँ|'' नैन्सी ने ट्विट किया था|
यह पढ़ते ही थॉमस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई|
मैनेजमेंट की पढ़ाई साथ साथ करते हुए नैन्सी का भावहीन चेहरा क्यों उसे आकर्षित करता था, वह नहीं समझ पाता|
''ओ गॉड, मैं उसे खोना नहीं चाहता|'' थॉमस बुदबुदाया| 
थॉमस ने नैन्सी को फोन करके अपने घर बुलाया| नैन्सी जाने से पहले अपने दोस्त को दुखी नहीं करना चाहती थी इसलिए वह तैयार हो गई|
घर में थॉमस ने उसका परिचय अपनी बहन जूली से करवाया| वह व्हील चेयर पर बैठी थी| थॉमस नाश्ता और कॉफी का इन्तेजाम करने बाहर चला गया| 
'' भाई हमेशा तुम्हारी बातें करता है नैन्सी| वह तुम्हें चाहता है पर कह नहीं पाता|''
'' नहीं, मैं नन बनना चाहती हूँ,'' नैन्सी एकाएक कठोर हो गई|
'' पर क्यों''
''मैं जब पाँच साल की थी तभी मेरे पिता मेरे लिए ढेर सारे खिलौने लाने का वादा करके विदेश चले गए| मुझे बड़ा करने के लिए माँ ने बहुत मेहनत किया| उनका छुपछुप कर आँसू बहाना मैं देख लेती थी| हमें आज भी उनका इन्तेजार बना रहता यदि मैं फेसबुक पर उन्हें न देख लेती| वे अपनी दूसरी पत्नी और बेटी के साथ बहुत खुश नजर आ रहे थे| मैं नफरत करती हूँ पुरुष जाति से...'' 
भावना का सैलाब उमड़ने ही वाला था कि एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने कमरे में प्रवेश किया|
''जूली, माई बेबी, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लेकर आया|''
''क्या पापा''
''लैपटॉप, अब मेरा बेबी सारी दुनिया से जुड़कर रहेगा| है न !''
जूली के चेहरे पर मुस्कान आ गई- ''पापा, यही नैन्सी है|''
जूली ने इस अंदाज से कहा जैसे उसके पापा जूली को अच्छी तरह से जानते हों|
''कैसे हो बेटी'' स्नेह से नैन्सी के सिर पर हाथ फेरते हुए वे बाहर चले गए|
''मैं भी जाती हूँ'' कहकर नैन्सी ज्योंहि जाने के लिए मुड़ी, जूली ने उसका हाथ थाम लिया| जाने कैसा आग्रह था उसकी नजरों में कि वह सामना नहीं कर पाई| धीरे से हाथ छुड़ाकर मंद चाल से बाहर चली गई|
आधे घंटे बाद नैन्सी ने ट्विटर पर लिखा,''पिता अपनी बेटियों से बहुत प्यार करते हैं|''
पत्थर की खुशबू महसूस करते ही जूली ने नैन्सी को विडियो चैट के लिए आमंत्रित किया|
विडियो चलाते ही सामने थॉमस खड़ा था कॉफी की मग लेकर|
''तुम कॉफी पिए बिना चली गई नैन्सी, यह तुमने अच्छा नहीं किया|''
नैन्सी के गुलाबी पड़ गए चेहरे को देखकर थॉमस और जूली, दोनों के चेहरे खिल गए|
--ऋता शेखर 'मधु'

रविवार, 19 जून 2016

पिता


पिता.......गीत विधा में

उनके कदमों पर चलकर अब
उनकी ही भाषा बोल रहे
जिनकी बातें तब ना समझे
आदर्श वही अनमोल रहे

हाथ पकड़ हटिया में जाते
चनाचूर जी भर के खाते
रंग बिरंगी हवा मिठाई
हँसकर पापा हमें दिलाते

निर्मल मन की निर्मल थाती
नित नित जीवन में तोल रहे
आदर्श वही अनमोल रहे

क्रोध कभी ना करते देखा
झूठ कभी ना कहते देखा
विनीत सत्याग्रही पिता को
अन्याय भी न सहते देखा

दीवारों पर सजे चित्र को
धीरे धीरे हम खोल रहे
आदर्श वही अनमोल रहे

वे बरगद बनकर छाँव बने
शीतल मनहर सुख गाँव बने
ढक तपन चुभन के छालों को
टूटे सपनों के पाँव बने

इम्तेहान वाले विषयों के
इंग्लिश हिसाब भूगोल रहे
आदर्श वही अनमोल रहे
-----ऋता शेखर 'मधु'.....

शनिवार, 18 जून 2016

मोहपाश-लघुकथा

 मोह पाश
आज घर में बहुत चहलपहल थी। विदेश से छोटा बेटा और बहु आ चुके थे। आवभगत में कोई कमी न रहे उसके लिए सासु माँ एक पैर पर खड़ी थी। बड़ी बहु और बेटा भी बड़े शौक से अगवानी कर रहे थे।
बुआ जी ने हँसते हँसते कहा- क्या बात है भाभी, बहु पर कितना प्यार लुटाओगी।
सासु माँ ने बड़े प्यार से कहा- यह बिचारी तो कभी कभी आती है। सालों भर तो यह प्यार बड़ी के हिस्से आता है।
मुस्कुरा कर बड़ी बहु ने सर हिलाया।
खा-पी कर सभी आराम करने चले गए।
तनिक देर बाद सासु माँ की आवाज आई-बहु , एक गिलास पानी देना जरा।
बिलकुल शांति छाई रही। सासु माँ ने दुबारे आवाज लगाई।

बड़ी पानी लेकर गई और प्यार से बोली- माँ जी, मैंने सोचा कि बिचारी कभी कभी आती है तो सास की सेवा का पुण्य उसे भी मिलना चाहिए, यह पुण्य तो मैं साल भर बटोरती ही रहती हूँ।
सासु माँ निःशब्द रह गई।
------ऋता शेखर मधु-------

गुरुवार, 16 जून 2016

काला तोहफा-लघुकथा

काला तोहफा
" देखो निम्मी, आज मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ|''
''क्या,'' प्रश्न भरी निगाहों से निर्मला ने अंकित को देखा|
अंकित ने बिस्तर पर हल्के नीले रंग की काँजीवरम की साड़ी फैला दी और उसपर एक नेकलेस रख दिया जिसके लॉकेट पर हीरे का सुन्दर सा नग चमक रहा था|
निर्मला की आँखें खुशी से दमक गईं| उसने टैग पर कीमत देखी और अगले ही पल बुझ सी गई|
''क्या हुआ निम्मी,'' अंकित ने उसके चेहरे के उतार चढ़ाव को भाँपते हुए कहा|
''मैंने कब कहा कि मुझे यह सब चाहिए| बचपन से मैंने सीखा है कि पाँव उतना ही पसारो जितनी बड़ी चादर हो| मैं यह जानती हूँ कि घर चलाने के लिए तुम कितनी मेहनत करते हो| मैं और बच्चे तुम्हारी आमदनी से बिल्कुल संतुष्ट हैं|'' निम्मी ने बड़े ही सहज ढ़ग से कहा|
'' जब भी मैं तुम्हें साड़ी या जेवर के दुकान में हसरत से इन चीजों को देखते हुए देखता था तो न दिला पाने की ग्लानि होती थी मुझे|''- शांत स्वर में अंकित बोल रहा था|
'' तो क्या हुआ, चीजें तो दुकान में ही देखी जाती हैं| इसका अर्थ यह नहीं कि हम उन्हें खरीद ही लें|'' 
उसने ध्यान से निर्मला को देखा| उसके मुखमण्डल पर सिंदूरी आभा गहराती जा रही थी|
अंकित ने सामान समेटते हुए सोचा कि जमीर बेचकर खरीदे गए काले तोहफे से वह इस दिव्यता को धूमिल नहीं कर सकता|
-ऋता शेखर 'मधु' 

सोमवार, 13 जून 2016

नया दरवाजा-लघुकथा

 नया दरवाजा--

तिरंगे में लिपटे शहीद पति के शव के पास वह पथराई आँखों से खड़ी थी|
'' अभी हाथों की मेंहदी भी न छूटी और ये दिन देखने पड़े|''
''पहाड़ सी जिन्दगी अकेले कैसे काटेगी |''
''इसका दूसरा ब्याह कर देना चाहिए|''
''देखो तो, एक बूँद आँसू भी नहीं है आँखों में|''
''किस्मत की बुलंद होती तो यूँ न विधवा हो जाती|''
''अब सासरे में खटते हुए जीवन काटेगी बेचारी|''
''मायके चले जाना चाहिए|''
''नहीं, चार दिनों की आवभगत के बाद बोझ लगेगी|''
यह सब बातें उसे कहीं दूर से आती महसूस हो रही थीं क्योंकि उस वक्त उसका मस्तिष्क चुपचाप कुछ निर्णय ले रहा था| 
अग्नि संस्कार के बाद वह धीरे धीरे चलकर सेना के उच्च पदाधिकारी के पास अपने चूड़ी विहीन हाथों को जोड़कर खड़ी हो गई|
''सर, मुझे फौज में भरती होना है|''
उस सख्त जाँबाज ऑफिसर की नम आँखें उसके सम्मान में झुक गईं|
एक क्षण को नवविवाहिता विधवा ने महसूस किया कि उसका बहादुर पति कानों में कह रहा था - 
''समाज द्वारा तय किए गए सारे दरवाजे को बंद करके नया दरवाजा खोला है तुमने| मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं|''
ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 8 जून 2016

मुक्ति-लघुकथा

मुक्ति-

कंपकंपाते हाथो से मकान के लोन की अंतिम किश्त पर हस्ताक्षर करते हुए सुरेश बाबू की आँखों से दो बूँद आँसू टपक पड़े।
" यह क्या, आज तो आपको खुश होना चाहिए कि आप कर्ज से मुक्त हो गए।" बैंक मैनेजर ने आत्मीयता से सुरेश बाबू से हाथ मिलते हुए कहा।
" जी, मैं बहुत खुश हूँ कि जिंदगी ने यह मौका दिया कि मैं बेटे पर कर्ज का भार छोड़कर नहीं जा रहा।"
घर लौटते हुए पत्नी के लिए चूड़ियाँ लेते हुए उन बंधनमुक्त कलाइयों पर खनकती चूड़ियों की कल्पना कर बरबस मुस्कुरा उठे सुरेश बाबू।
-ऋता

रविवार, 5 जून 2016

शाकाहारी एग करी-रसोईघर-4

भेज एग करी
माध्यम आकार के दो आलू लेकर उसके छिलके उतार लें।
बीच से दो टुकड़ों में काट लें। आलू के मध्य भाग में चाकू से कटोरी जैसा बना लें। इनमे हल्दी और नमक लगा दें और डीप फ्राई करके पका लें।
अब दो कप दूध को नींबू या सिरका से फाड़कर सारा पानी अलग कर दें और सूखा छेना बना लें। छेना में नमक , हरी मिर्च, किशमिश स्वादानुसार मिला लें। इसे पके आलू की कटोरी में भर दें।
करी बनाने के लिए एक कटा प्याज, कटा टमाटर, 5-6 कली लहसुन को मिक्सी में पीस लें। कड़ाही में एक चम्मच तेल में जीरा, एक सूखी लाल मिर्च, तेजपत्ता से छौंक लगाकर पिसा मसाला डाल दें।तेल छोड़ने तक धीमी आंच पर मसाले को भूनें। हल्दी ,नमक और एक चम्मच गरम मसाला डालकर कुछ देर चलाकर पानी डाल दें एक कप। 2 उबाल आने पर गैस बन्द कर दें।
परोसते समय प्लेट में छेना वाले आलू रखकर करी ऊपर से डालें। गर्म बिरियानी के साथ परोसें और तारीफ़ पाएं।

शनिवार, 4 जून 2016

सुप्रभाती दोहे - 4

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आनत लतिका गुच्छ से, छनकर आती घूप
ज्यों पातें हैं डोलतीं, छाँह बदलती रूप 40

खग मानस अरु पौध को, खुशियाँ बाँटे नित्य
कर ले मेघ लाख जतन, चमकेगा आदित्य

दुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कान
प्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहान

लेकर गठरी आग की, वह चलता दिन रात
बदले में नभ दे रहा, तारों की सौगात

नित दिन ही चलता रहे, नियमित जीवन चक्र
बोली में जब व्यंग्य हो, ग्रहण सूर्य हो वक्र

सौरमंडल बना रहा, इक कर्मठ सरकार
सूरज तो सिरमौर है, मेघ खा रहे खार

ब्रम्हांड में गूँज रहा, कपालभाति का ओम्
बड़ी अनोखी है ख़ुशी, झूम रहा है व्योम

जब जब ये सूरज करे, तपते दिन का ज़िक्र
तब तब होती चाँद को, शीतलता की फ़िक्र

सूरज की हर इक किरण, रच देती है गीत
नारंगी में वीर रस, नील श्याम की प्रीत 

लेखन में लेकर चलें, सूरज जैसा ओज
शीतल मन की चाँदनी, पूर्ण करे हर खोज
-----ऋता....

गुरुवार, 2 जून 2016

रसोईघर-3-पतोड़

रविवारी डिश...
अरवी लीव्स विथ ग्रेवी - पतोड़
अरवी के 10 साबूत पत्ते धोकर रख लें।
अब एक कटोरे में 1 कप सूजी, 1 कप बेसन, 1 चम्मच हल्दी,अंदाज़ से नमक,2 चम्मच सब्जी मसाला, 3 चम्मच अमचूर या 2 नीम्बुओं का रस मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनायें। गैस पर बड़े बर्तन में पूरा से पानी चढ़ा दें।
अब अरवी के सीधे पत्ते पर पेस्ट फैला दें। उसके ऊपर दूसरा पत्ता रखें और उसपर भी पेस्ट फैला दें। इस तरह से 5 पत्ते एक पर एक जमा लें। उसे सावधानी से रोल करें और धीरे से खौलते पानी में डाल दें ताकि पत्ते खुलें नहीं। रोल बनाकर धागा से बाँध भी सकती हैं।
खौलते पानी में 10 मिनट उबाल ले।
अब रोल को बाहर निकले। 5 मिनट ठंडा होने दें फिर टुकड़ों में काट लें। सभी टुकड़ों को डीप फ्राई कर लें।
इसे सूखा भी खा सकते है और चाहें तो मनचाही ग्रेवी बनाकर उसमें तले हुए टुकड़ों को डाल दें।
नोट-मसाले में कोई खट्टी चीज़ अवश्य डालें, क्योंकि इसमें थोडा गुण ओल के जैसा होता है जिसे देशज भाषा में मुँह काटना कहते है। ग्रेवी में नींबू का रास डाल सकते है।