रविवार, 18 दिसंबर 2011

५.श्रीराम की किशोरावस्था और विश्वामित्र की याचना-ऋता की कविता में

आज मैं श्रीराम कथा की पाँचवीं कविता लेकर प्रस्तुत हूँ|आपकी छोटी -सी प्रतिक्रिया भी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है और मुझमें नए उत्साह का संचार करती है|

श्रीराम की किशोरावस्था

बाल्यावस्था  बीत गई, श्रीराम  हुए  किशोर
यगोपवीत संस्कार हुआ, चले गुरुकुल की ओर|

श्वास और स्वभाव में जिनके, बसते चारो वेद
वही  गए  विद्याध्ययन को, अद्भुत है ये भेद|

अल्प समय में हो गए, विद्या विनय में निपुण
सीखने  लगे  बड़े  मन  से, राजाओं  के  गुण|

शोभा और निखर जाती, लेकर धनुष और बाण
कोशलपुरवासी के बसते थे, श्रीरामचंद्र में प्राण|

बन्धुओं संग शिकार खेलना, प्रतिदिन का था कृत्य
पवित्र  मृग  ही  मारते, राजा  को  दिखाते नित्य|

श्रीराम  के  बाण से, पवित्र मृग जो सिधारते
मुक्ति उनको मिल जाती, स्वर्गलोक को जाते|

संग  अनुजों  मित्रों  के, भोजन करते श्रीराम
गुरुजनों के आज्ञाकारी, प्रसन्न रखना था काम|

बड़े  ध्यान  से श्रवण करते, पुराणों की गाथा
पुन: अनुजों को कहते, समझाकर उनकी कथा|

नित्य ही प्रात: करते, मात- पिता गुरु को प्रणाम
लेकर उनकी आज्ञा, आरम्भ करते नगर का काम|

सर्वव्यापक कलारहित, इच्छारहित निर्गुण निराकार
अद्भुत  लीलाओं  से  करते, मानव- जन्म साकार|

विश्वामित्र की याचना

एक ऋषि  थे  महाज्ञानी, नाम  था  विश्वामित्र
वन में करते थे निवास, आश्रम था पावन पवित्र|

जप  यज्ञ  योग  में सदा, रहा करते थे लीन
उपद्रवी असुर निर्भय हो, करते यज्ञ को क्षीण|

महर्षि आहत हो जाते, करूँ क्या मैं उपाय
श्रीराम हैं प्रभु के अवतार, होंगे वही सहाय|

बिन ईश्वर पापी न मरेंगे, हो गई ऐसी सोच
दर्शन कर प्रभु को लाऊँ, तज कर के संकोच|

विचार कर चल दिए, किया सरयू में स्नान
दशरथ के दरबार में, मिला बहुत सम्मान|

मुनिवर के आगमन को, राजा ने माना सौभाग्य
श्रीराम  की  शोभा  देख, मुनि भूले सारा वैराग्य|

राजन  के  अनुरोध  पर, मुनि ने बताई बात
अवधराज सन्न रह गए, जैसे आया झंझावात|

विकल व्यथित हो, अनुनय कर बोले
दिल  की  बात,  संकोच  से  खोले|

पृथ्वी गौ कोष सेना, सब न्योछावर कर दूँगा
बुढ़ापे  में  पुत्र  मिले,  उनको मैं नहीं दूँगा|

सारे  पुत्र  हैं  प्राण  समान, सबसे  प्रिय  हैं  राम
सुन्दर छोटा सा पुत्र मेरा, कैसे करेगा यह विकट काम|

राजगुरू ने जब समझाया, राजा का दूर हुआ सन्देह
विश्वामित्र  प्रसन्न  हुए, पाकर राम- लक्ष्मण सदेह|

सप्रेम पुत्रों को बुलाया, और दे दी यह शिक्षा
ऋषि ही हैं पिता तुम्हारे, देनी है विकट परीक्षा|

प्रसन्नवदन राम-लक्ष्मण चले, छोड़ पिता का घर
पीताम्बर  में  सजे  थे, तरकश  था  पीठ  पर|

एक  श्याम  एक  गौरवर्ण, सुन्दर  थी  जोड़ी
लोभ निहारने का, मुनि की आँखों ने नहीं छोड़ी|

मार्ग में मिली राक्षसी ताड़का, राम ने कर दिया उसका वध
तर  गई  वह  इस  संसार  से, मिल  गया राम का पद|

अस्त्र-शस्त्र राम को सौंप मुनि बोले, बढ़े आपका बल
भूख-प्यास पर विजय पाएँ, समझें  असुरों  का  छल|

क्रोधी असुर मारीच सुबाहु, आए पैदा करने विघ्न
आश्वासन दिया राम ने, पूरा होगा यज्ञ निर्विघ्न|

फरहीन बाण चलाया, मारीच गिरा समुद्र के पार
श्रीराम के अग्नितीर से, सुबाहु गया प्राण को हार|

अनुज  लक्ष्मण  ने  किया, असुर  कटक  का  संहार
देव मुनीश्वर प्रसन्नमन से, करने लगे स्तुति बारम्बार||

ऋता शेखर ‘मधु’



12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर भावमय और भक्तिमय प्रस्तुति है आपकी.
    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

    कभी मौका मिले तो मेरी पोस्ट 'रामजन्म-आध्यात्मिक चिंतन-२'भी पढियेगा.ताड़का आदि को आध्यात्मिक रूप से समझने की कोशिश की है मैंने.यह पोस्ट मेरी लोकप्रिय पोस्टों में से एक है.

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  2. एक श्याम एक गौरवर्ण, सुन्दर थी जोड़ी
    लोभ निहारने का, मुनि की आँखों ने नहीं छोड़ी|... bahut priy varnan hai yah

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  3. । आनन्दमयी भावमयी प्रस्तुति………… आनन्द विभोर कर गयी………आभार

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  4. आप प्रशंसनीय कार्य कर रही हैं।
    शुभकामनाएं।

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  5. अतिसुन्दर बधाई की परिधि से बाहर

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  6. श्वास और स्वभाव में जिनके, बसते चारो वेद
    वही गए विद्याध्ययन को, अद्भुत है ये भेद|

    यही तो विशेषता होती है कालजयी चरित्रों की, बहुत खूब। राम भगवान के चरित्र को प्रस्तुत करने के लिए आभार।

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  7. …आनन्दित करती भावमयी प्रस्तुति.....

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  8. बहुत ख़ूबसूरत और भक्ति से परिपूर्ण बेहतरीन प्रस्तुती!

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  9. bahut kamaal ki lekhni hai aapki. sampurn ramcharitmanas ko aap dohe ka roop de rahi hain. bahut badhaai.

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  10. आप मेरे ब्लॉग पर आयीं,बहुत अच्छा लगा.
    मेरी नई पोस्ट 'हनुमान लीला भाग-२'पर
    आपका स्वागत है.

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