शुक्रवार, 1 जून 2012

इन थरथराते से लबों पर अनकही इक बात है – हरिगीतिका छंद


शादियों के मौसम के लिए...

गोरी सजी दुल्हन बनी है, नैन शर्मीले बने|
लाली हया की छा रही है, हाथ बर्फीले बने||

जाना सजन के संग में है, यह विदा की रात है|
इन थरथराते से लबों पर, अनकही इक बात है|१|

बाबुल नजर के सामने हैं, नत नयन से वह खड़ी|
जाना जरूरी क्यों बताओ, कौन सी आई घड़ी||

लाडो नियम संसार का यह, अब वही तेरा जहाँ|
माता-पिता की लाज रखना, खुश सदा रहना वहाँ|२|

भाई हृदय की ही परत पर, नेह-पाती लिख रहा|
आँखें उदासी से भरी हैं, खुश मगर वह दिख रहा||

जब खिलेगा चाँद सावन, दूज का ही मास होगा|
बहना पिरोना स्नेह-मोती, वह महीना खास होगा|३|

सुनसान आँगन कर चली है, लाडली नाजों पली|
कैसे रहेगी दूर माँ से, बोल ऐ नाजुक कली||

इन मौन आँखों में नमी है, दिल हुलस कर कह रहा|
आबाद हो संसार तेरा, नीर खुशी के बह रहा|४|

देता दिलासा वह सभी को, मीत को लेकर चला|
शोभा बनेगी यह हमारी, आस भी देकर चला||

हौले दबाया हाथ उसका, लाज से पानी हुई|
ले प्यार सबका वह चली है, प्रीत दीवानी हुई|५|

ऋता शेखर मधु

13 टिप्‍पणियां:

  1. लाडो नियम संसार का यह, अब वही तेरा जहाँ|
    माता-पिता की लाज रखना, खुश सदा रहना वहाँ|२|

    बहुत बढ़िया बेटी को सीख देती सुंदर रचना,,,,,

    RECENT POST ,,,, काव्यान्जलि ,,,, अकेलापन ,,,,

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  2. इन थरथराते से लबों पर, अनकही इक बात है|१| ..... बहुत खुबसूरत प्रस्तुति,,ऋता

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  3. बहुत प्यारी रचना ऋता जी.....
    मन भावुक सा हो गया......
    सस्नेह

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  4. बहुत सुन्दर ..... बेटी की विदाई याद आ गयी ,,,

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  5. आपने तो भावुक कर दिया ………आँख भर आयी

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  6. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. सुंदर सजे हैं भाव कोमल, छंद मधुरम बन पड़े।

    बहुत सुंदर हरिगीतिका छंद... वाह!
    सादर बधाई।

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  8. बहुत ही सुन्दर भावयुक्त जबरदस्त प्रस्तुति

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