सोमवार, 4 जून 2012

स्वतंत्र राष्ट्र के परतंत्र बच्चे


बाल श्रम
वर्तमान का दरवाजा खोल
निकलता है भविष्य सुनहरा
कैसे निकल पाए भविष्य
लगा हो जब वर्तमान पर पहरा|
जिस बचपन को होना था
ममता की धार से सिंचित
क्यों वह हो रहा है
प्यार की बौछार से वंचित|
उत्साह उमंगों सपनों का
जीवित पुँज है बालक
मजदूरी की बेदी पर क्यों
होम कर देते उनके पालक|
बालकों में निहित होती
सफल राष्ट्र की संभावना
बाल श्रम से यह मिट जाती
कैसी है यह विडम्बना|
असमय छिन जाता है बचपन
बालश्रम है मानवाधिकारों का हनन|
ऐसा हर वो कार्य
बालश्रम की परिधि में आते हैं,
जो बच्चों के बौद्धिक मानसिक
शैक्षिक नैतिक विकास में
बाधक बन जाते हैं|
कहीं लालच कहीं है मजबूरी
करना पड़ता बालकों को मजदूरी|

जिस उम्र को करनी थी पढ़ाई
कारखानों में बुनते कालीन चटाई|
बचपन उनका झुलस जाता
ईंट  के  भट्टों  में
श्वास जहरीली हो जाती
बारूद के पटाख़ों में|
जिन मासूमों का होना था पोषण
खरीद उन्हें होता है शोषण|
होना था जिस पीठ पर बस्ता
कूड़े के ढेर से वह
काँच लोहे प्लास्टिक बीनता|
छोटे कंधों पर बड़े बोझ हैं
घरेलू कामों में लगे रोज हैं|

बाल मन है बड़ा ही कोमल
वह भी सपने संजोता है
सुन मालिकों की लानत झिड़की
मन ही मन वह रोता है|
अक्ल बुद्धि उम्र के कच्चे
स्वतंत्र राष्ट्र के परतंत्र बच्चे
जहाँ होती उनकी दुर्गति
वह राष्ट्र करे कैसे प्रगति|
बाल श्रम उन्मूलन दिवस
वर्ष में एक दिन आता है
हर दिन का जो बने प्रयास
दूर हो यह सामाजिक अभिशाप|

  ऋता शेखर मधु

11 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्‍कुल सही ... सार्थक व सटीक अभिव्‍यक्ति ।

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  2. बहुत सार्थक बात कही आपने इस रचना के माध्यम से....
    हमें भी देखना होगा कि हमारे आसपास ही तो नहीं है बाल मजबूर.....
    बाई नहीं आई तो उसकी बच्ची से क्या हम बर्तन नहीं धुलवाते????

    सस्नेह.

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  3. बाल श्रम उन्मूलन दिवस वर्ष में एक दिन आता है हर दिन का जो बने प्रयास दूर हो यह सामाजिक अभिशाप|

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना,,,,,,

    RECENT POST .... काव्यान्जलि ...: अकेलापन,,,,,

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  4. बहुत ही सार्थक और सटीक रचना....उदंती पर इस रचना के प्रकाशन के लिए बधाई...ऋता

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  5. आपकी इस उत्कृष्ठ प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 29/5/12 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी |

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  6. बाल श्रम की समस्या पे बहुत ही प्रभावी रचना लिखी है आपने ...
    बाल मजदूर के प्रति समाज का व्यवहार भी चिंतनीय है .. देश के क़ानून के अलावा सामाजिक स्तर पर इस समस्या का हल संभव है ...

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  7. आसान नहीं इस मुद्दे को सुलझाना .... सबके पीछे भी एक और योजना है

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  8. महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर बहुत प्रभावी रचना....
    सादर.

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  9. सार्थक व सटीक अभिव्‍यक्ति.

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  10. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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