शनिवार, 13 दिसंबर 2014

एक मुट्ठी आसमान ....

एक मुट्ठी आसमान ....
कल रात सपने में मिला
मेरे हिस्से का आसमान
भगवान ने कहा, 
यहाँ जो भी सजाना चाहो
जैसे भी सजाना चाहो
वह तुम्हारी मर्जी है
मैंने झट से सूरज उठाया
उसे टाँगकर सोचा
अब कभी रात न होगी
फिर अगले ही पल लगा
हमेशा दिन रहेगा तो
हमेशा काम भी करना होगा
फिर आराम का क्या होगा?
मैंने उठा लिया चाँद भी
इसका होना जरूरी है
दिनभर का थका आदमी
चाँदनी की शीतलता में सोकर
तरोताजा हो जाएगा
आसपास पड़े सितारे
टिम टिम कर ठुनकने लगे
हम बच्चों को प्यारे
हमको बच्चे प्यारे
बड़े जतन से हमने
उनको भी टिकाया
तभी बादल का एक टुकड़ा
तरह तरह की आकृतियाँ बनाता
गुहार करने लगा अपने स्थान के लिए
रूई के फाहे जैसे मेघ को
आकाश पर बैठा दिया
ताकि बनी रहे रिमझिम फुहार
धरती को ठंढ़ाने के लिए
इस तरह हमने फिर से
वैसा ही आसमान बना लिया
जैसा उस प्रभु ने दिया था
जिनके सामने हम
शिकायतों की ढेर लगाते हैं
और माँगते हैं अपने लिए
एक मुट्ठी आसमान !!
*ऋता *

3 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है .....बहुत अच्छी पंक्तियाँ!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (15-12-2014) को "कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू" (चर्चा-1828) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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