शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

जलता दीपक द्वारे द्वारे

राम सिया अरु लखन पधारे
जलता दीपक द्वारे द्वारे

अवधपुरी में मनी दिवाली
उजली हुई जो निशा थी काली
रघुवर जी को राह दिखाने
झूम रही थी लौ मतवाली

बने घरौंदे प्यारे प्यारे
सजे खिलौने न्यारे न्यारे
जलता दीपक द्वारे द्वारे

नीली हरी लाल रंगोली
घर की चौखट भी खुश हो ली
कुलिया चुकिया लावा फरही
ले हाथौं में मुनिया डोली

अम्बर जैसे चाँद सितारे
आज धरा पर निखरे सारे
जलता दीपक द्वारे द्वारे

दीपों की पाँतें झूम रहीं
अँगना में चकरी घूम रहीं
जगमग जगमग कंदीलों पर
कीटें भी लौ को चूम रहीं

पावन निर्मल पर्व हमारे
ध्रुवतारा भी हमें निहारे
जलता दीपक द्वारे द्वारे

मन के भीतर हो उजियारा
जीवन पथ पर तम भी हारा
ज्ञान ध्यान की लगन लगी है
कहाँ टिकेगा फिर अँधियारा

लछमी पूजन साँझ सकारे
संध्या दीपक सुबह सँवारे
जलता दीपक द्वारे द्वारे
*ऋता शेखर 'मधु'*
अनुभूति पर दीपावली विशेषांक में यह गीत प्रकाशित है........लिंक नीचे है.....

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-12-2014) को "बिलखता बचपन...उलझते सपने" (चर्चा-1834) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुंदर दीपावली गीत इस मौसम मे कुछ गरमाहट दे गया।

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