गुरुवार, 20 सितंबर 2018

देह का तिलस्म - कहानी


देह का तिलस्म

चारों ओर निशा पसरी हुई थी| निशा के स्याह आँचल पर नन्हें नन्हें सितारे जगमग कर उसकी सुन्दरता बढ़ा रहे थे| एक पूरा चाँद मुस्कुराता हुआ निशा के साँवले मुख को अलौकिक सुन्दरता प्रदान कर रहा था| सृष्टि के निर्माता ब्रम्हा जी धरती पर सागर के किनारे एकांत में बैठे विचारमग्न थे| सिर्फ धरती का कठौर तल, हहराते सागर, चमकता सूर्य, लुभावने सितारे. शातल चाँद के अलावा भी कुछ चाहिए था जो पूरी सृष्टि को मनभावन और चलायमान बना सके| यह सोचते हुए ब्रम्हा जी हाथों में भीगे रेत लेकर सके गोले बनाने लगे| उसे विभिन्न आकार देकर कुछ को धरती पर रहने लायक गढ़ते, कुछ आकार जो समुद्र में रह सकें और कुछ को आसमान में उड़ने लायक बनाया| अब उनकी कल्पना में वे सारे आकार चलने , उड़ने और तैरने लगे| हर गढ़न में अब उन्हें यह ख्याल भी रखना था कि वे शरीर की वृद्धि करें और बाद में खुद जैसे जीवों का निर्माण भी करें ताकि उनकी कृतियों का अस्तित्व बना रहे| अब सवाल यह था कि इन सभी कृतियों में जीवन कैसे भरें| ये तो मात्र देह का निर्माण हुआ था| सोचते सोचते उन्होंने एक प्रकाश पुंज का निर्माण किया| वह पुंज ब्रम्हा जी के सामने आकर पूछने लगा,’प्रभु, मेरे अवतरण का प्रयोजन क्या है’

‘तुम सभी अदृश्य टुकड़ों में विभाजित हो जाओ और अपने पसंद की आकृतियों में समा जाओ| तुम्हारे समाहित होने से ये सभी आकृतियाँ जीवित हो जाएँगी|’’

‘’ लेकिन प्रभु, हम उन आकृतियों में कब तक कैद रहेंगे?’’

‘’सभी आकृतियों का निश्चित जीवन काल होगा| उसके बाद तुम्हें शरीर से मुक्ति मिल जाएगी| ज्योंहि तुम बाहर निकलोगे, वे आकृतियाँ मृत कहलाएँगी| जब तक तुम देह के अन्दर रहोगे, आत्मा या प्राण कहलाओगे|’’

‘’हे प्रभु! इतना बता दीजिए कि हम देह में समाने के बाद क्या व्यवहार करेंगे|’’

‘’पहले तुम सभी आत्माएँ अपनी देह धारण करो| उस देह के अनुरूप जो आचरण उचित होगा वही करना|’’

सभी आत्माओं ने एक एक आकृति ले ली| अब उस निर्जीव निस्तब्ध स्थान पर हलचल मच गयी|तरह तरह की ध्वनियाँ वातावरण में गुँजायमान हो गईं| कुछ वहीं धरती पर उछल कूद करने लगे, कुछ सागर में उतरकर मजे से तैरने लगीं| कुछ ने पंखों का इस्तेमाल किया और आकाश में उड़ गए| ब्रह्मा जी सब देखकर आनंदित होने लगे| तभी एक देह ने दूसरे पर हमला किया और उसकी देह को क्षत विक्षत कर दिया| उस देह के अन्दर की आत्मा आजाद हो गई| किन्तु वह दुखी भी थी क्योंकि आजाद होने के क्रम में देह ने जो यातना झेली वह असहनीय थी| ब्रह्मा जी ने हमलावर प्राणी को बुलाया और पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया|

‘’प्रभु, मुझे जो आकृति मिली उसे पेट भरने के लिए दूसरे पशु की देह चाहिए थी,’ इसलिए मैंने उस अनुरूप आचरण किया|ब्रह्मा जी चुप रह गए क्योंकि इसमें उस शिकारी देह की कोई गल्ती नहीं थी| उसके निर्माता तो वही थे| उधर आसमान में उड़ने वाली एक देह ने अपने से छोटी देह वाली एक आकृति को गिरा दिया था| सृजन के साथ विध्वंस का सिलसिला होते देख ब्रह्मा जी चिंतामग्न हो गए|

अब वे ऐसी आकृति का निर्माण करना चाहते थे जो आपस में प्यार से रह सकें| इसी क्रम में दो नन्हीं आकृतियाँ गढ़ी गयीं जो बिल्कुल एक समान थीं| उन्हें समान बुद्धि और समान ताकत भर दिए| एक खासियत और दी कि वह अपनी जिह्वा का उपयोग करके तरह तरह की आवाजें निकाल सकते थे| अपनी इस कृति पर ब्रह्मा जी निहाल हो गए| उन्हें पूरा विश्वास था कि इन देहों में जाने वाले प्राण प्यार से रहेंगे| अब उन्होंने सृष्टि को आगे बढ़ाने के ख्याल से उनकी काया में थोढ़ा सुधार किया और दोनों मिलकर सृष्टि को आगे बढ़ा सकें, इसके लिए थोड़े से अंग परिवर्तन कर दिए| अब उन्होंने आत्माओं को आज्ञा दी कि अपनी पसंद की किसी देह में प्रविष्ट हो जाओ| आत्माओं ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और देः में प्रविष्ट हो गए| देह और आत्मा का यह साथ अत्यंत आह्लादकारी साबित हुआ| दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए और प्रेमपूर्वक रमणीय स्थल चुनकर रहने लगे|

अब ब्रह्मा जी निश्चिंत हो गए कि उनका काम पूरा हो गया| आखिरकार उन्होंने देह और आत्मा का सुन्दर समायोजन कर लिया था|

दिन बीत चले समय आने पर दोनों काया ने मिलकर नयी काया का निर्माण किया| जिस काया ने नन्ही काया को खुद में समेटकर रखा था वह उसकी देखरेख में व्यस्त हो गई| स्वयं को उपेक्षित होता देख दूसरी काया नाराजगी जाहिर करने लगी| अब उनके बीच उपालम्भों का आदान प्रदान होने लगा| जब बात असह्य होने लगीतो दोनों अपनी शिकायतें लेकर प्रभु के पास पहुँचे| प्रभु ने उनकी बातें सुनी और कहा,’ तुम दोनों ने मेरी उम्मीद को धराशायी कर दिया| आखिर ये शिकायतें कैसी|’

‘प्रभु, आपने एक काया में ममता भरी और वह नम्रता सीख गयी| दूसरे में ताकत थी, वह अहंकारी हो गया,’ममतामयी काया कह उठी|

‘प्रभु, अब यह सवाल जवाब करने लगी है| उसने बुद्धि का उपयोग शुरू कर दिया है| मैं उसे तर्क से नहीं बल्कि ताकत से ही हरा सकता हूँ,’ये अहंकारी देह की आवाज थी|

‘क्या तुम दोनों आत्माएँ प्रेमपूर्वक नहीं रह सकतीं,’ प्रभु अपनी ही बनायी रचना के सामने विनीत भाव से बोले|

‘रह सकते हैं, जब हम इस देहरूपी बंधन से आजाद हो जाएँगे| जब तक हम दोनों के पास काया, वाणी और बुद्धि रहेगी, तर्क वितर्क चलते रहेंगे| इन सबके बावजूद भी हम एक दूसरे का ख्याल रखेंगे| यह देह का तिलस्म है प्रभु जी| अब आप भी इसमें कुछ नहीं कर सकते,’यह कहकर दोनों आत्माएँ ब्रह्मा को उनके ही तिलस्म में हैरान करके

एक दूसरे का हाथ पकड़कर मुस्कुराती हुई ओझल हो गईं|

-ऋता शेखर ‘मधु’

मानव तभी तक जीवित है जब तक उसके शरीर में आत्मा का वास है...वरना मृत है| आत्माओं का व्यवहार देह पाने के बाद बदल क्यों जाता है...चिंतन से उपजी एक कहानी आपको भी अवश्य पसंद आएगी|अपनी राय देंगे तो लेखन में सुधार जारी रहेगा, धन्यवाद मित्रों|

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

पसंदगी की रेंज

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‘हलो, मिस्टर वर्मा, मैने शादी डॉट कॉम पर आपके पुत्र के बारे में पढ़ा| आपको मैं अपनी बेटी की आई डी भेजती हूँ| आप देख लें और पसन्द आए तो हमलोग रिश्ते के बारे में सोच सकते हैं,’ ऊधर से मधुर आवाज में एक महिला बोल रही थीं|

‘जी, बताइए, मैं अपनी ओर से देख ही लेता हूँ क्योंकि अभी ऑनलाइन हूँ| आप चाहें तो कुछ देर लाइन पर बनी रह सकती हैं,’ वर्मा जी ने कहा और साथ ही दिए गए आई डी पर क्लिक भी किया| वहाँ एक प्यारी सी लड़की मोहक मुसक्न से सजी दिख रही थी| पूरी प्रोफ़ाइल देखने के बाद वर्मा जी ने कहा’’, मैडम,लड़की मुझे तो पसन्द आ रही| अब आप अपनी बिटिया का मोबाइल नम्बर दीजिए|’’

‘क्या !,’उधर से अचंभित स्वर उभरा|

‘देखिए मैडम, वह जमाना गया जब माता पिता शादियाँ तय करते थे और बाद में बच्चों की राय ली जाती थी| बच्चे भी ज्यादा विरोध नहीं करते थे| अब बच्चे चुनाव करते हैं, बाद में माता पिता की राय ली जाती है| आप बिटिया का नम्बर दें, मैं अपने पुत्र आशु को दे दूँगा| अपनी सुविधा से दोनों बात कर लेंगे| यदि दोनों ने एक दूसरे के विचारों को पसन्द किया तो फिर हमलोग आगे की बात कर लेंगे| दोनों ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में उच्च पदों पर हैं| उनकी पसन्द ही सर्वोपरि है,’ थोड़े से आहत स्वर में मिस्टर वर्मा बोल रहे थे|

इसके पहले भी दो जगहों पर बात आगे बढ़ी थी| एक जगह लड़की ने छोड़ा क्योंकि उसे घर में किसी भी बड़े बुज़ुर्ग को रखना स्वीकार्य नहीं था| एक जगह लड़के ने छोड़ा क्योंकि लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी| मिस्टर वर्मा के अनुसार ये दोनों ही बातें कोई मायने नहीं रखती थीं|

“लड़की किसी के साथ नहीं रहना चाहती तो न रहे| समय के साथ और जरूरतों के अनुसार स्वयं सब ठीक हो जाता है| हर बात को गणित की तराजू पर तौलने से क्या डंडी सीथी मिलेगी ? नहीं न, पहले की शादियों में सामंजस्य बिठा ही लिया जाता था|”

“लेकिन पापा, हम सामंजस्य क्यों बिठाएँ| जब विचार ही नहीं मिलेंगे तो साथ कैसे रहेंगे,”वर्मा जी किसी भी दलील से पुत्र को नहीं समझा पाए|

‘आशु, जिस लड़की ने अँग्रेजी स्कूल से शिक्षा नहीं पाकर भी अपनी मेहनत के बल पर इतनी अच्छी नौकरी पाई है उसे तुम कमतर कैसे आँक सकते हो,’ उस दिन भी पिता पुत्र में वैचारिक मतभेद हो गया था| बाद में पिता ने ही चुप्पी का सहारा लिया|

मन में घुमड़ते हुए विचारों के समंदर में डूबे मिस्टर वर्मा यह भूल गए कि वह फ़ोन पर हैं|

“जी, मैं नम्बर दे देती हूँ,” यह सुनकर उनकी तन्द्रा टूटी|

उन्होंने नम्बर नोट किया और व्हाट्स एप पर आशु को भेज दिया| तुरन्त उभरी दो नीली रेखाओं ने संदेश पढ़ लिये जाने की चुगली कर दी| पहले इस तरह के संदेश पर आशु बिना विलम्ब के फ़ोन करता था किन्तु इस बार इन्तेज़ार के बाद भी उसने फ़ोन नहीं किया|

‘ अच्छा ही है, स्वयं बात कर लेगा तो बताएगा’, यह सोचकर वर्मा जी अपने काम में व्यस्त हो गए|

हर दिन बातें होतीं आशु से, पर उस लड़की के बारे में न पिता ने पूछा और न ही पुत्र ने बताया| एक दिन आशु ने कहा,”पापा, मैं एक महीने से लगातार उस लड़की से बात कर रहा हूँ| लगभग सभी विषयों पर हमारे विचार मिलते हैं| मुझे लगता है कि अब हमें आमने-सामने एक दूसरे से मिल लेना चाहिए| आप उसकी माँ को कहिए कि वह भी आ जाएँ और आप भी चलिए|”

सीधे सपाट शब्दों में कही गई बात वर्मा जी को अच्छी लगी| बेकार की संवेदनाओं में बहकर तो हमारी पीढ़ी बात करती थी| घर में ग़लत को कभी ग़लत कहने की हिम्मत नहीं होती थी|

दिन , समय, स्थान निश्चित किया गया| नियत समय पर सभी पहुँच गए| लड़की जैसी फ़ोटो में थी वैसी ही दिख रही थी| कुछ देर तक बातें हुई , उसके बाद आशु और वह लड़की थोड़ा अलग हट कर बातें करने लगे| वर्मा जी और लड़की की माँ ने तबतक विवाह की सारी रूपरेखा तय ली| घर में मण्डप सजेगा, शहनाइयाँ बजेंगी, इसकी प्रसन्नाता दोनों अभिभावकों को आह्लादित कर रही थी|

थोड़ी देर बाद दोनों वापस आ गए| दोनों के चेहरे पर तनाव की रेखाएँ साफ दिख रही थीं| वर्मा जी का दिल धड़क उठा| लक्षण ठीक नहीं लग रहे थे|

“पापा, अभी हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकते| मैं अपना देश नहीं छोड़ सकता| यदि हमारे देश में कुछ कमी है तो हम सभी मिलकर सुधार सकते हैं| देश को हम सभी की जरूरत है| ये क्या बात हुई कि पढ़े लिखे हैं अपने भारत में और सपनों का घर सजाएँ विदेश की धरती पर| यह मुझसे नहीं होगा|”

लड़की सिर झुकाए सुन रही थी| उसने कुछ नहीं कहा| माँ भी कुछ कह पाने में असमर्थ थीं|

इस बार मिस्टर वर्मा ने पुत्र की पीठ को सराहना के भाव से थपथपा दिया| आज पुत्र को वह गर्व भरी दृष्टि से देख रहे थे| पूर्व के मतभेद की दीवार गिर चुकी थी|

औपचारिक अभिवादन के बाद सभी जाने के लिये दरवाजे की ओर बढ़े| आशु जल्दी ही वहाँ से निकल जाना चाहता था| उसका मन अपने आप से ही क्षुब्ध था| बातें करने के दौरान उसने कल्पना भी नहीं की थी कि विदेश में बस जाने का प्रस्ताव भी रखा जा सकता है वरना वह पहले ही नकार देता| उसका गणितीय समीकरण गलत साबित हो गया था पर पिता की थपथपाहट से कुछ शांति अनुभव कर रहा था|

“आशु, मैं तो बस तुम्हारी परीक्षा ले रही थी| मैं भी अपने देश से उतना ही प्यार करती हूँ जितना तुम|”

अचानक आई इस आवाज पर आशु ने पलट कर देखा| लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी| इधर समधी समधन एक दूसरे को बधाइयाँ दे रहे थे|

-ऋता शेखर “मधु”

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

हे अशोक


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हे अशोक !

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ

लूटपाट से सनी नगरिया
लगती मैली सबकी चदरिया
नैतिकता का उच्चार करो
सद्भावों का संचार करो

प्रीत नीर से
हे अशोक! तुम
जन जन को
नहला जाओ

जितने मुँह उतनी ही बातें
सहमा दिन चीखती रातें
मेघ हिचक जाते आने में
सूखी धरती वीराने में

हेमपुष्प से
हे अशोक! तुम
हर मन को
बहला जाओ

नकली मेहँदी नकली भोजन
पल में पाट रहे अब योजन
झूठ के धागे काते तकली
आँसू भी हो जाते नकली

हरित पात से
हे अशोक! तुम
कण कण को
सहला जाओ

भूमिजा को मिली थी छाया
रावण उसके पास न आया
फिर उपवन का निर्माण करो
हर बाला का सम्मान करो

वापस आकर
हे अशोक! तुम
शोकहरण
कहला जाओ
-ऋता शेखर ‘मधु’
यह रचना अनुभूति के अशोक विशेषांक पर प्रकाशित है...
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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

पुत्रीरत्न

नवरात्र की पूजा पर बैठी नंदिनी ने मोबाइल बजते ही तत्परता से उठाया और बोल पड़ी,
" हलो, पापा, क्या हुआ है?"
"बेटा,बहुत बहुत बधाई ! तू बुआ बन गयी, काजल की रस्म के लिए यहाँ आने की तैयारी कर।"
" अरे वाह ! आपको भी दादा बनने की बहुत बधाई पापा। भाभी कैसी है और वो दोनों छुटकू किस रूप में अवतरित हुए हैं, ये भी बताइये।"
"एक पुत्ररत्न और एक लक्ष्मी, सोमेश की फ़ैमिली पूरी हो गई। बहुत प्यारा परिवार बन गया नन्दिनी," पापा ने नन्दिनी को जुड़वाँ जन्म लिए बच्चों के बारे में बताया।
" अरे वाह ! पर मैं आपसे नाराज हूँ पापा। आपने नवजात शिशुओं का परिचय ठीक से नहीं दिया|"
"अच्छा, तो यह बता दो क्या ग़लत कहा|"
"पुत्र को गणेश नहीं कहा पर बिटिया को लक्ष्मी कहकर अभी से ही देवी बना दिया आपने। पापा, नवरात्रि के पाठ से यह समझ पा रही हूँ कि स्त्री जीवन स्वयं एक चुनौती है जिसे वह साधारण मानवी के रूप में ही स्वीकार करता है। पढ़ाई, कमाई और सृष्टि निर्माण की शक्ति के समय उसे देवियों के रूप में जाना जा सकता है, पर अभी से क्यो?"
शायद पापा को भी यह बात तर्कसंगत लगी थी तभी  पूछे,"तो क्या कहकर परिचय देता"
"पुत्रीरत्न कहना था," कहकर नन्दिनी खिलखिला उठी।
"समझ गया, तू आरती कर देवियों की और फ़ोन जरा दामाद जी को दे।"
नन्दिनी ने स्पीकर ऑन किया तब पति को फोन दिया।
"सोमेश के जुड़वाँ बच्चों के जन्मोत्सव में आप और नन्दिनी आमन्त्रित हैं, अवश्य आइयेगा" पापा ने कहा।
"जी अवश्य, पर शिशुओं के परिचय तो दीजिये पापा जी।"
"एक पुत्ररत्न और एक पुत्रीरत्न",
यह सुनते ही नन्दिनी का चेहरा खिल गया और वह घंटी बजाकर गाने लगी, "जय अम्बे गौरी.....
-ऋता शेखर 'मधु'