शनिवार, 1 मार्च 2014

कहमुकरी



कहमुकरी पर प्रयास

१.
बिन उसके मन हरदम तरसे
सावन में बूँदें बन बरसे
आँखों से बह जाए काजल
का सखि साजन
ना सखि बादल|

२.
उमड़ घुमड़ कर प्रेम जताए
मन का पोखर भरि भरि जाए
देख देख उसको मन हर्षा
का सखि साजन
ना सखि वर्षा|

३.
उसका मन है विस्तृत निर्मल
नीरद सा बन जाए शीतल
घन घन श्यामल जैसे रघुवर
का सखि साजन
ना सखि अम्बर||
............ऋता

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुरत ही सुन्दर ... बहुत समय बाद ऐसे छंद पढ़ रहा हूँ ...
    लाजवाब ...

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  2. विलुप्त विधा को जीवंत करने के भागीरथ प्रयास की जितनी भी तारीफ की जाये कम है।

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