रविवार, 3 जुलाई 2016

पक्की छत - लघुकथा

पक्की  छत
आने वाले बरसात के लिए हरिया परिवार के साथ मिलकर नई छप्पर बना रहा था। सब आपस में बोलते बतियाते काम पर लगे थे।

हरिया की पत्नी ने पूछा- " गोलू के बापू, सहर में तो बड़ी ऊँच ऊँच इमारत बनत रहे। तुहनी सब मिलके हुआँ भी काम करत रहन। एक बार पक्का छत बन जाए से बार बार के मुसीबत खतम हो जा ला। उ घर में रहे वाला आदमियन के कोनो परेसानी न लगत होइ, चाहे कोई मौसम आये जाए।"

" अरी ना री, ओहि से तो उ लोग आपस में परिवारो से नहीं मिलते हैं। छप्पर चुएगा तबहिये तो छप्पर छाने के लिए सब एकजुट होएँगे। सब मसीन जइसन लगते हैं वहाँ। न कोनो हंसी मजाक, न चेहरा पर कोई हंसी मुस्कान। अइसे कहो तो इहाँ भी पक्का छत बना दें"- मुस्कुराते हुए हरिया ने कहा।

" न बाबा, ई फूस के छप्पर ठीक हई। सब आदमियन जिन्दा जइसन तो लग अ हई।- कहकर खिलखिला उठी रामकली।
-----ऋता शेखर मधु--------

5 टिप्‍पणियां:

  1. दिल कच्चे तो घर के छत पक्का कैसे ..
    वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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  2. जन्म दिन की अशेष शुभकामनाएँ
    सादर
    यशोदा

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  3. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 04 जुलाई 2016 को लिंक की गई है............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-07-2016) को "गूगल आपके बारे में जानता है क्या?" (चर्चा अंक-2393) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. छत कच्ची चलेगी लेकिन परिवार में सभी लोग मिलजुलकर र्हना चाहिए। सुंदर प्रस्तुति।

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