माटी के कण-कण में देखो, हुआ सुवासित चंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम, सुंदर सभी दिशाएँ।
अरुणोदय या हो अस्ताचल, दृश्य मनोहर लाएँ।।
जहाँ खड़ा है अटल हिमालय, गङ्गा बहती है पावन।
हर मौसम है यहाँ सुहावन, रहे शरद या सावन।।
सागर की लहरें भरती हैं, पग में शीतल स्पंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
वेद पुराण हमें सिखलाते, सरल मार्ग अपनाना।
रामायण से हमने अपने, आदर्शों को जाना।।
श्लोकों के हर बीज मंत्र में, ऊर्जा अमित समायी।
दया धर्म का पाठ पढ़ाकर, मानवता ले आयी।।
कहते कृष्ण सार जीवन का, मानो इसे न क्रंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
ओज भरी वीरों की धरती, सदियों से हम पाए।
सम्राटों के किस्से सुनकर, गौरव गाथा गाए।।
संस्कारित शिक्षित मानवता, जन जन के मन जागे।
सब मिलकर जब कदम बढ़ाएं, होगा भारत आगे।।
लहराए सब ओर तिरंगा, ऐसा हो अभिनंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।
ऋता शेखर 'मधु'