शनिवार, 16 जून 2012

आखर-मोती बिखरें - माहिया




आखर-मोती बिखरें
मधुरिम भाव सजे
मन अम्बर-सा निखरे|१|

है जग की रीत यही
मीठी वाणी से
दिल में है प्रीत बही|२|

कुछ खर्च नहीं होता
मीठा बोल सदा
स्नेहिल रिश्ते बोता|३|

ओ बादल मतवाले
प्यासी है धरती
आ, उसको अपना ले|४|

किरणें रवि की आईं
खिलखिल करता दिन
कलियाँ भी मुसकाईं|५|

दो हाथ जुड़े रहते
बल और विनय का
हैं भाव सदा कहते|६|

अंक बराबर पाते
कर्म-गणित में तो
ना होते हैं नाते|७|

तितली उड़ती जाती
फूल भरी चुनरी
धरती की लहराती|८|

चाह रखो चलने की
हारेगी बाधा
राह मिले खिलने की|९|

ऋता शेखर मधु

13 टिप्‍पणियां:

  1. चाह रखो चलने की
    हारेगी बाधा
    राह मिले खिलने की|
    बिल्‍कुल सच कहा ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  2. ऋता ! सभी बोल बहुत सुन्दर और सार्थक है..

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  3. चाह रखो चलने की
    हारेगी बाधा
    राह मिले खिलने की,,,,

    बहुत बेहतरीन मधुर रचना के लिये बधाई ,,,,,मधु जी

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. बहुत ही सुंदर माहिया ...
    मन खुश हुअ पढ़्कर ...!
    शुभकामनायें

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  6. वाणी हो "मधु" सी सरस, बसे हृदय में प्रीत |
    चलने की चाहत रखो, खूब "ऋता" की रीत |

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  7. मीठे बोल से क्यूँ परहेज ... बहुत ताकत है इसमें

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  8. तितली उड़ती जाती
    फूल भरी चुनरी
    धरती की लहराती

    सभी रचनाएं बहुत अच्छी लगीं।

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