मंगलवार, 26 जून 2012

चपल दामिनी हँस पड़ी, बादल करता शोर...दोहा छंद



बूँद-बूँद तरसी धरा, ताक रही आकाश|
मेघ, अब आओ जरा, मिलने की है आस|१|

मतवाले बादल चले, घोड़े-सी है चाल|
हौले मस्त हवा चली, झूमे तरु के डाल|२|

घटा घनघोर छा रही, नाच रहा है मोर|
चपल दामिनी हँस पड़ी, बादल करता शोर|३|

घन-घन करके गरजता, इन्द्रदेव का दूत|
माँ के आँचल जा छुपा, उसका डरा सपूत|४|

प्रचण्ड-वेग हवा बहे, झुकते ताड़-खजूर|
धूल-भरी हैं आँधियाँ, उड़े फूस-छत दूर|५|

बादलों से गगन ढका, है बारिश की थाप|
भोर निशा-सी लग रही, सूरज है चुपचाप|६|

टिप-टिप बरसा नीर जब, खुशबू सोंधी उड़ी|
तन-मन ज्यूँ पुलकित हुए, लगी नाचने कुड़ी|७|
[खुशबू सोंधी उड़ रही, टप टप बरसा नीर
तन मन पुलकित हो गए, चलो ताल के तीर|] 

बारिश की धारा बही, छप-छप करते पाँव|
कतारों में हैं सजते, कागज के सब नाव|८|

मुसलाधार बारिश में, सजा राग मल्हार|
पकौड़ियाँ छनने लगीं, छाई हँसी-बहार|९|

नदी- ताल- पोखर भरे, बारिशों का कमाल|
टर-टर से गूँजा शहर, मेढकों का धमाल|१०|

बूदें नभ में टँग गईं, करतीं परावर्तन|
सातों रंग छिटक पड़े, इन्द्रधनु दे दर्शन|११|

मेंहदी लगी हाथ में , मुखड़ा होता लाल|
मंद- मधुर मुस्कान से, सखियाँ करें सवाल|१२|

ऋता शेखर मधु

25 टिप्‍पणियां:

  1. टिप-टिप बरसा नीर जब, खुशबू सोंधी उड़ी|
    तन-मन ज्यूँ पुलकित हुए, लगी नाचने कुड़ी|७|………वाह वाह वाह ……अति सुन्दर प्रस्तुति ने मन मोह लिया

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  2. बहुत ही खूबसूरत छंद|
    वाह आपने तो छंद मे भी महारथ हासिल कर ली|

    घटा घनघोर छा रही, नाच रहा है मोर|
    चपल दामिनी हँस पड़ी, बादल करता शोर|३|

    अति सुन्दर प्रस्तुति..बधाई...

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  3. बादलों से गगन ढका, है बारिश की थाप|
    भोर निशा-सी लग रही, सूरज है चुपचाप|

    बेहतरीन दोहे,मन मोहक सुंदर प्रस्तुति,,,,ऋतू जी,बधाई,,,,,

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  4. बारिश की धारा बही, छप-छप करते पाँव|
    कतारों में हैं सजते, कागज के सब नाव|८|

    Bahut Sunder

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  5. प्रकृति का सारा सौंदर्य उमड़ रहा है इस बारिश में ... बहुत ही सोंधी सोंधी अभिव्यक्ति

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  6. वाह: बहुत सुन्दर प्रस्तुति..बधाई... ऋता ..

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  7. इन दोहों ने बरखा का सा आनंद दे दिया .... बहुत सुंदर

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  8. बहुत सुन्दर दोहे...यद्यपि बारिस तो नहीं आयी है यहाँ अभी, लेकिन आपके सुन्दर दोहों ने मन को भिगो दिया...

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  9. मेघ, अब आओ जरा, मिलने की है आस...

    :) :) हम भी यही कह रहे हैं :)

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  10. वाह ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  11. बहुत खूब..
    बारिश का मौसम याद आ गया पर पकौडियां ..

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  12. ऋता शेखर जी मजा आ गया दोहे पढ़ कर सभी एक से बढ़कर एक |आपको बहुत बधाई सातवें दोहे जो टिप टिप से शुरू होता है उसके अंतिम चरण में आपने शायद गलती से लघु गुरु कर दिया उसको ठीक कर लें

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    1. आ० राजेश जी,
      दोहे प्रकाशित करने के बाद मेरा ध्यान उस दोहे पर गया...तबतक वन्दना जी की टिप्पणी आ गई थी और उन्होंने उस दोहे को पसन्द किया था, इसलिए मैंने उसे रहने दिया| फिर भूल सुधार करते हुए उस दोहे के स्वरूप को थोड़ा सा बदलकर अन्त में गुरू लघु कर दिया और दोहा न०-७ के नीचे ही उसे रखा है:)
      ध्यान दिलाने के लिए हार्दिक आभार !!

      सादर

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  13. भीगी रुत के हरियाले दोहे

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  14. अनुपम और अनमोल प्रस्तुति.
    इतने सुन्दर भावों की बरसात कर दी
    है आपने कि मन भावबिभोर हो सराबोर हो गया है.

    देखतें हैं कब तलक रिमझिम बरसात
    इस तरफ अपना रुख करती है.

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  15. घन.घन करके गरज रहा, इन्द्रदेव का दूत।
    माँ के आँचल जा छुपा, उसका डरा सपूत।

    बारिश का स्वागत करते सुंदर दोहे।

    कुछ दोहों में मात्राएं कम-ज्यादा हो गई हैं।

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    1. आभार...रिवीजन करके ठीक किया है...पुनः आभार !!

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  16. सुन्दर प्रस्तुति... आभार। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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  17. बरखा के रंगों कों मधुरता से बाँधा है इन दोहों में ...
    सुन्दर ... अति सुन्दर ...

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  18. बहुत सुन्दर मनभावन दोहे...
    :-)

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    1. रीना मौर्य जी,
      ब्लॉग पर आपका स्वागत हैः)
      दोहे पसन्द करने के लिए हार्दिक आभार !!
      सस्नेह

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