रविवार, 26 अक्तूबर 2014

सुनो पथिक अनजाने तुम



 


कविताओं में "तुम " शब्द का प्रयोग कविता को व्यापक विस्तार देता है...उसी विषय पर आधारित रचना...

सुनो पथिक अनजाने तुम
लगते बड़े सुहाने तुम

कविताओं में आते हो
अपनी बात सुनाने तुम

जब भी आँखें नम होतीं
आ जाते थपकाने तुम

कभी ममता या ईश हो
दुआओं के बहाने तुम

शामिल होते मेघों में 
शीतलता बरसाने तुम

मन एकाकी जब होता
आते हो मुसकाने तुम

तुम ही तो सबल स्वप्न हो
होते नहीं पुराने तुम

*ऋता शेखर 'मधु'*

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (28-10-2014) को "माँ का आँचल प्यार भरा" (चर्चा मंच-1780) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    छठ पूजा की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!