रविवार, 15 फ़रवरी 2015

चुनरी फैली भोर की

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28.
आए हैं ऋतुराज अब, हुलस रहे हैं बाग़
कलियाँ सब खिलने लगीं, भँवरे गाएँ राग
भँवरे गाएँ राग, फूलती सरसो पीली
अनुरागी हैं सूर्य , पंचमी बनी सुरीली
उड़ते हैं पुखराज, फाग राग सुनाए हैं
भर देने को रंग, बसंतराज आए हैं

27.
शहनाई की गूँज में, कैसा है आह्वान
जन गण मन का गान, या, है बिटिया का दान
है बिटिया का दान, जनक का दिल भर आता
एक विकल अहसास, नैन में यह धर जाता
दिल पर करती राज, रागिनी की गहराई
जीवन के हर रंग , व्यक्त करती शहनाई
26.
मेघ-रजाई में छुपा, सूरज भोरम भोर
चादर गहरे धुंध की, फैली चारो ओर
फैली चारो ओर, हवा ठण्डी बर्फीली
काँप रहे हैं हाथ, अग्नि है सीली सीली
ठिठुरन को अब छोड़, झाँकना सूरज भाई
चमक उठेगी रश्मि, हटा कर मेघ-रजाई
25.
चुनरी फैली भोर की, खग ने खाया गान
मंदिर की घंटी बजी, भिक्षुक माँगे दान
भिक्षुक माँगे दान, भक्त आगे बढ़ जाते
प्रभु चरणों में भोग, चढ़ा के छप्पन आते
दया भाव के बीज, हंस पाखी तू चुन री
उनको देना छींट, आज फैले जब चुनरी
24.
सूरज को आतिश कहें, या ऊर्जा की खान
अपनी अपनी बुद्धि से, देते हम पहचान
देते हम पहचान, सरल को विरल बनाते
शव हो या फिर देव, सुमन का हार चढ़ाते
सत् जन देते सीख, कभी ना खोना धीरज
जग में भरो प्रकाश,सीख देता है सूरज

1 टिप्पणी:

  1. पाँचो कुण्डलियाँ हैं ,

    एक से बढ़कर एक

    है सन्देश भरा सब में ही

    पढ़ के तू इनको देख

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