मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

जल है तो कल है

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जल है तो कल है
1.
तरसे हैं इक बूँद को, महानगर के प्रांत
सूखी धरती चीखती, नदिया पड़ी है शांत
नदिया पड़ी है शांत, विकल हैं पौधे सारे
सिसके प्यासे कंठ, वृद्ध बालक भिनसारे
गगन रहा है ताक, मेघ बिन कैसे बरसे
हरियाली से हीन, मनुज पानी को तरसे
2.
मोटर को देते चला, फिर जाते हैं भूल
व्यर्थ बहे जल धार बन, हो जाता निर्मूल
हो जाता निर्मूल, कहीं पड़ता है सूखा
बाँझ बने हैं खेत, कृषक रह जाता भूखा
हम से ही है देश, हमीं हैं सच्चे वोटर
जाया ना हों नीर, चलाएँ ऐसे मोटर
3.
भइया जी ने आज से ,दिया नहाना छोड़
लम्बी कतार में मची, पानी पाने की होड़
पानी पाने की होड़, लड़ाई की जड़ होती
बलवानों की जीत, यहाँ अपनापन खोती
फेल हुई सरकार, हिली है उसकी नइया
मिल पाए ना नीर, नहा पाए ना भइया
4.
रूठे हैं बादल यहाँ, बरस न पाए नीर
धरती तप्त तवा बनी, कहें दरारें पीर
कहें दरारें पीर, नमी को किस विधि खींचे
सुप्त पड़ा है कोख, बीज फिर कैसे सींचे
इतना रखना याद, पेट भरते ना जूठे
बहुतायत हो पेड़, रहें ना बादल रूठे
-ऋता शेखर 'मधु'

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21 - 04 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2319 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. बहुत बुरी स्थि‍ति‍ है। समसामयि‍क बहुत अच्‍छा लि‍खा आपने।


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