बुधवार, 6 जुलाई 2016

सफेद झूठ - लघुकथा

सफेद झूठ

कम्पनी की ओर से आशु को दो वर्षों के लिए विदेश भेजा गया था| पिता अनिकेत और पुत्र आशु विडियो कॉल से ही बातें करते|

इधर कई दिनों से अनिकेत की बात बेटे आशु से नहीं हो पा रही थीं| फोन पर भी एक दो शब्दों में आशु का जवाब देना अनिकेत को सशंकित कर रहा था| 
आज अनिकेत से नहीं रहा गया तो उसने विडियो कॉल पर आशु को बुलाया| रात के आठ बज रहे थे और सोफे पर पसरा आशु पेट पर ही लैपटॉप रखकर बातें करने लगा| 

कुशलक्षेम पूछने के बाद अचानक अनिकेत ने कहा,''बेटे, नौकरी करते हुए तुम्हें पाँच वर्ष हो गए| अब विवाह कर लेना चाहिए तुम्हें| कोई लड़की पसन्द है तो बता दो , या हम यहाँ लड़की देखें|''

''पापा, मैं आपलोगों की पसन्द की लड़की से ही शादी करूँगा| पर जब मैं वापस आऊँ तभी बात बढ़ाना|'' आशु हड़बड़ी में बोल गया| 

आशु को दादी माँ की हिदायत याद आ गई थी कि शादी के लिए उन्होंने लड़की देख रखी है |

अनिकेत ने यह कहकर कॉल समाप्त कर दिया,'' बेटा, वापस लौटना तो बहु को साथ लेकर आना|''

पापा ने ऐसा क्यों कहा, यह सोचते हुए आशु उठा तो पीछे की मेज पर सजी उसकी और माही की युगल फोटो पर उसका ध्यान गया|

'सॉरी पापा', आशु ने तुरंत अनिकेत को फोन लगाया| 

''किसलिए'', अनिकेत ने जानबूझ कर अनजान बनने का नाटक किया|

'' आपने मेरी और माही की पेअर फोटो देख ली न| मैं बताने ही वाला था...''

''एक मधुर सच पर तुम्हारे झूठ ने अविश्वास की चादर डाल दी'' आशु जबतक कुछ बोलता, फोन कट चुका था|
--ऋता शेखर 'मधु'

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-07-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2396 दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'आत्मविश्वास से चमकती शबनम और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. इन पंक्तियों में लेखक की संवेदनशीलता झलकती है. हालाँकि ऐसे अनेकों शबनम प्रतिदिन सडकों पर किसी न किसी रूप में नजर आ ही जाती है.

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  4. आजकल यही हो रहा है, बच्चे माँ बाप से सफ़ेद झूठ बोलना सीख गए हैं. आपकी लघुकथा ऑंखें खोलनेवाली है. माँ बाप बेटे से ज्यादा अनुभवी तो होते ही हैं!

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