बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

कुछ नया-लघुकथा

कुछ नया
‘हरिहर प्राथमिक विद्यालय’ के उद्घाटन समारोह में नरेन भी आया था| वहाँ कई अवकाशप्राप्त वरिष्ठ  योगदान देने को इच्छुक थे|
नरेन को एक साल पहले की बात याद आ गई|
‘पापा, आपको रिटायरमेंट के जो पैसे मिले हैं उससे तीन बेडरूम का फ्लैट ले लेते हैं|’ नरेन की आवाज में परामर्श से अधिक आदेश झलक रहा था|
‘और इस घर का क्या करेंगे,’ थोड़े अचम्भे से हरि बाबू ने पूछा|
‘इसे किराया पर लगा देंगे’
‘मतलब मेरे पैसों का हिसाब किताब तुम लगाओगे,’ हरि बाबू ने थोड़ी तल्ख़ी से कहा|
‘आप उस पैसे का क्या करेंगे’ छुपाते छुपाते भी नाराजगी उजागर हो गई नरेन की|
‘बेटे, मैंने अपनी कमाई का उपयोग कभी खुद के लिए नहीं किया| तुम्हे उच्च स्तर का लालन पालन दिया| मँहगे स्कूल से लेकर अच्छी फीस वाली यूनिवर्सिटी में पढ़ाया| पाई पाई बचाकर घर और गाड़ी खरीदी ताकि बीबी बच्चे शान से रह सकें|’
‘अपने परिवार के लिए सभी यह करते हैं| आपने नया क्या किया,’ नरेन की बातें नश्तर की तरह चुभ गई हरि बाबू को|
‘तो बेटे, अब नया करूँगा| मैं जा रहा हूँ अपना सपना पूरा करने|’
आज पापा के साकार स्वप्न को देख नरेन डबडबाई आँखों से देख रहा था और उनकी व्था का अनुभव भी कर रहा था|

--ऋता शेखर ‘मधु’

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत भावमयी लघु कथा . इस नरेन् ने तो समझ ली पिता की व्यथा बाकी नरेन् भी समझ पायें काश .

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    1. शादर धन्यवाद संगीता जी| सभी नरेन नहीं समझ सकते, यह सही है|

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 6-10-16 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2487 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. बहुत ही बढ़िया लघुकथा. आज सभी के समझने योग्य .माता पिता को भी और सन्तान को भी ..

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    1. जी गिरिजा जी, नई सोच से बहुत कुछ सकारात्मक बदलाव सम्भव है|

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