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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

बागों में पतझर का हो रहा श्रृंगार...


फूलों की डोली ले आया है बहार

बागों में पतझर का हो रहा श्रृंगार 

गुँथे हैं चम्पई गेंदों के पुष्प हार

माँ शारदे, तुझे नमन है बारम्बार !


पीत वसन मुख चंद्र सा है

कर में वीणा रसरंग सा है

बैर, मक्को,कंद का चढ़ रहा आहार

धूप चंदन से सुगंधित हुआ है वंदनवार!


खिल रही हैं वाटिका मे अनगिनत कलियाँ

गूँज उठे भँवरों के स्वर मँडरायी तितलियाँ


खेत भी इतरा रहा कर सरसो  संग विहार

नव कोंपल भी धरती को देखें निहार निहार !


श्रृंगारित है नायिका ले पिया मिलन की आस

कँगना की झंकार में भरा हुआ विश्वास

कहीं विरह की ज्वाला दहके है बार बार

हवा बासंती चूम रही पँखुड़ियों को सँवार !

...............ऋता