गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

ठनी लड़ाई




ठनी लड़ाई

आज मेरी गणपति की सवारी के साथ ठन गई| गणपति के सामने लड्डुओं से भरा थाल रखा था| उन लड्डुओं पर भक्त होने के नाते मैं अपना अधिकार समझ रही थी और वह मूषक अपना...आखिर गणेश का प्रिय जो था| मेहनत की कमाई से लाए लड्डुओं को लुचकने के लिए वह तैयार बैठा था| चूहों की तरह कान खडे करके गोल-गोल आँखें मटकाता दूर से ही वह सतर्क था कि मैं कब अपनी आँखें बन्द करके ध्यान में डूबूँ और वह लड्डुओं पर हाथ साफ करे| मैं भी कब दोनों आँखें बन्द करने वाली थी| एक आँख बन्द करके गणेश जी को खुश किया और दूसरी आँख खुली रखकर चूहे पर नजर रखी| किन्तु ये भी कोई पूजा हुई भला...देवता से ज्यादा ध्यान चूहे पर!
पल भर के लिए सीन बदल गया| थाल में लड्डुओं की जगह मेहनत की कमाई दिख रही थी और चूहे में वह भ्रष्टाचारी जो एरियर का बिल बनाने के लिए पैसों पर नजर जमाए बैठा था| फिर तो मैंने भी ठान लिया...उस चूहे को एक भी लड्डू नहीं लेने दूँगी|


ऋता शेखर मधु

21 टिप्‍पणियां:

  1. :):) बढ़िया है .... काश सब भ्रष्टाचारी रूपी चूहे पर नज़र रखें ।

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  2. छोटी सी कहानी बड़ा सा सुझाव....
    सुन्दर पोस्ट....
    :-)

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  3. .... फिर तो मैंने भी ठान लिया...उस चूहे को एक भी लड्डू नहीं लेने दूँगी|

    यही संकल्प लेने की जरूरत है

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  4. शुरूआत चूहे से ही करना ठीक। शेर तक पहुंचने का साहस वहीं से पैदा हो सकता है।

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  5. शुरूआत चूहे से ही करना ठीक। शेर तक पहुंचने का साहस वहीं से पैदा होता है।

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  6. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. बढ़िया व्यंजना .बढ़िया रूपक चूहे का .

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  8. बढ़िया व्यंजना .बढ़िया रूपक चूहे का .


    ठनी लड़ाई

    आज मेरी गणपति की सवारी के साथ ठन गई| गणपति के सामने लड्डुओं से भरा थाल रखा था| उन लड्डुओं पर भक्त होने के नाते मैं अपना अधिकार समझ रही थी और वह मूषक अपना...आखिर गणेश का प्रिय जो था| मेहनत की कमाई से लाए लड्डुओं को लुचकने के लिए वह तैयार बैठा था| चूहों की तरह कान खडे करके गोल-गोल आँखें मटकाता दूर से ही वह सतर्क था कि मैं कब अपनी आँखें बन्द करके ध्यान में डूबूँ और वह लड्डुओं पर हाथ साफ करे| मैं भी कब दोनों आँखें बन्द करने वाली थी| एक आँख बन्द करके गणेश जी को खुश किया और दूसरी आँख खुली रखकर चूहे पर नजर रखी| किन्तु ये भी कोई पूजा हुई भला...देवता से ज्यादा ध्यान चूहे पर!
    पल भर के लिए सीन बदल गया| थाल में लड्डुओं की जगह मेहनत की कमाई दिख रही थी और चूहे में वह भ्रष्टाचारी जो एरियर का बिल बनाने के लिए पैसों पर नजर जमाए बैठा था| फिर तो मैंने भी ठान लिया...उस चूहे को एक भी लड्डू नहीं लेने दूँगी|

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  9. चूहे के माध्यम से सच को दर्शाती आपकी यह पोस्ट अच्छी लगी। धन्यवाद।

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  10. ये चूहा तो इन्कोमेताक्स काट रहा था. उसे रोकना ठीक नहीं नहीं तो गणेश जी नाराज़ हो या ना हों चिदंबरम साहब जरुर नाराज हो जायेंगे.

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