शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

ये तुम कौन




ये तुम कौन
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इस संध्या की बेला में,

जब निपट अकेला बैठा मैं
पर भगदड़ के बीचों इस मौन 
में अठ्ठहासी ये तुम कौन?


पल ये कितने चले गए
अनंत अर्णव में बिखर गए
बीत गया जो पहर ये पौन
फिर भी जाने मन क्यों गौण...

ध्यान से परे कैसा ये खेल
विषाद भी है और है अठखेल
चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
फिर मन में सन्यासी कौन?

कट कट कर बहता है चित्त
मृत नहीं - अत्यंत विचित्र
लथपथ पड़ा बिचारा जौन
उसी के कारण मन ये मौन...



शिशिर शेखर......मेरे सुपुत्र






मेरी नकल कर रहा हैः)

37 टिप्‍पणियां:

  1. वाह उम्दा प्रस्तुति ये पंक्तियाँ तो लाजवाब हैं
    ध्यान से परे कैसा ये खेल
    विषाद भी है और है अठखेल
    चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
    फिर मन में सन्यासी कौन

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  2. नक़ल इतनी उत्कृष्ट,इतनी गहरी .... उस छाया के प्रति उठता प्रश्न उसे देखने का प्रमाण है, उसे समझ पाने की बुनियाद है . यथार्थ में मन समाहित हो तो कई उत्तर मिल जाते हैं रास्तों में

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    1. दी, फ़ेसबुक पर आपका आशीर्वाद पाकर वह बहुत खुश है|

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  3. क्या बात कर रही हैं ऋता जी...
    ये बेटे ने लिखी है???
    बहुत बहुत सुन्दर....आपके गुण झलक रहे हैं स्पष्ट!!!
    (नक़ल कभी कभी असल से प्यारी होती है....:-))
    शुभकामनाएं शिशिर को..
    सस्नेह
    अनु

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    1. आप जैसी प्यारी मासी के गुण भी झलक रहे हैः)
      शुक्रिया अनु!!

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  4. ध्यान से परे कैसा ये खेल
    विषाद भी है और है अठखेल
    चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
    फिर मन में सन्यासी कौन?,,,,सुंदर पंक्तियाँ,,,,,

    शिशिर शेखर जी, को हिदी में उम्दा लेखन के लिये बहुत२ शुभकामनाये,,,,

    MY RECENT POST: माँ,,,

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    1. शुक्रिया सर !!आपका आशीर्वाद बना रहे...

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  5. अरे वाह:..बेटे ने लिखी है..? माँ के संस्कार कहाँ जाएगे..?बहुत बढ़िया लिखा है.शिशिर शेखर को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं..

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  6. इतनी गहन कविता लिखने के लिये शिशिर को बधाई

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  7. बहुत ही अच्‍छा लिखा है शिशिर ने ... बधाई सहित शुभकामनाएं

    साझा करने के लिये आभार आपका

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  8. :).... sahi sannidhya asar dikhata hai....
    tabhi to abhineta ka beta abhineta banta hai
    hai na

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (13-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. आपका आशीर्वाद पाकर कृतार्थ हुए...आभार!!!

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  10. ध्यान से परे कैसा ये खेल
    विषाद भी है और है अठखेल
    चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
    फिर मन में सन्यासी कौन?
    kya baat hai sunder
    bete ji nakal kar rahe hai yahi bahut hai achchhi chij ka nakal karna achchha hai

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    1. बेटा धन्य हुआ मासी का आशीर्वाद पाकर!!
      रचना जी...इस ब्लॉग की प्रथम पोस्ट से आप हमारे साथ हैं
      आज भी आपका इन्तजार रहता है

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  11. बहुत सुंदर रचना बेटा शिशिर
    बहुत सारी शुभकामनाएं

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  12. बहुत सुंदर गीत. शिशिर को बहुत बहुत बधाई हिंदी में योगदान करने के लिये.

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    1. शुक्रिया रचना जी...उत्साहवर्धन के लोए हार्दिक आभार!!

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  13. कल 14/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  14. सुंदर भावपूर्ण कविता । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है। धन्यवाद।

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  15. सुंदर भाव... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

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  16. सुंदर भाव... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

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  17. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना.बहुत बधाई आपको

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  18. ध्यान से परे कैसा ये खेल
    विषाद भी है और है अठखेल
    चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
    फिर मन में सन्यासी कौन?

    बहुत सुंदर .... शिशिर को बधाई ....

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  19. मन क्यूँ है गौण .........
    मन में छिपा सन्यासी कौन ....बेहद खूबसूरत अंतर्मन अभिव्यक्ति

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  20. ध्यान से परे कैसा ये खेल
    विषाद भी है और है अठखेल
    चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
    फिर मन में सन्यासी कौन?
    बहुत ही सुन्दर रचना ....
    बेहद अर्थपूर्ण !!!

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  21. बहुत ही बेहतरीन कविता लिखी है शिशिर ने..
    शिशिर को बहुत-बहुत बधाई..
    और ढेरों शुभकामनाएँ....
    :-)

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  22. ध्यान से परे कैसा ये खेल
    विषाद भी है और है अठखेल
    चहुँ ओर तो सिर्फ हैं रौन
    फिर मन में सन्यासी कौन?

    इतनी गहन सोच... कमाल है. शिशिर को ढेरों बधाईयाँ और आशीष!

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