गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

कैसे जाऊँ पार


ढाई आखर प्रेम का, पढ़ती बारम्बार|

मक्कारी की बाड़ है, कैसे जाऊँ पार||१


भव सागर में तैरती, जा पहुँची मँझधार|

लहरों का विस्तार है, कैसे जाऊँ पार||२


बड़ी विकट है यह घड़ी, मेरे पालनहार|

कुछ तो राह सुझाइए, कैसे जाऊँ पार||३


लोभ मोह में कट गए, जीवन के दिन चार|

मोक्ष क्षितिज पर है खड़ा, कैसे जाऊँ पार||४


सूरत से सीरत भली, यही हृदय का सार|

बिन दया या धर्म किए, कैसे जाऊँ पार||५

............................ऋता

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (04-04-2014) को "मिथकों में प्रकृति और पृथ्वी" (चर्चा अंक-1572) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चैत्र नवरात्रों की शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।..ऋता

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    साझा करने के लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं

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