रविवार, 20 अप्रैल 2014

मन वैरागी

दस तांका --- ऋता शेखर 'मधु'
१.
हृदय गंगोत्री
प्रेम की गंगा बही
धारा पावन 
समेट रही छल
जीत रही है बल|
२.
मन वैरागी
स्मृतियों का कानन
करे मगन
चुनो सुहाने पल
महकेगा आँचल|
३.
लेखनी हंस
मन मानसरोवर
शब्दों के मोती
चुगता निरंतर
खोल रहा अंतस|
४.
सूरज हँसा
धरा गई निखर
जागा जीवन
खुशी गई बिखर
दिन लागे प्रखर|
५.
धरा की नमी
नभ दृग में बसी
छेड़ो न उसे
वो बरस जो जाए
भीगे दिल सभी का|
६.
जागे अम्बर
चाँद चाँदनी संग
पल शीतल
सूरज से छुपाये
राग मधुर गाए|
७.
तेज आँधी थी
बुझा पाई न दिया
ऐसा लगा है
दुआ सच्चे दिल की
रब ने कुबूल की|
८.
चमकी लाली
प्राची ने माँग भरी
ले अँगड़ाई 
अरुण वर उठा
कौंधा नव जीवन|
९.
क्या करे कोई
एक ओर हो खाई
दूजी में कुआँ
बढ़ाना पग-नाप
पार हो जाना भाई|
१०.
जीवन रेल
भागती सरपट
कई पड़ाव
साथ हैं मुसाफिर
अलग हैं मंजिलें|

...........ऋता शेखर 'मधु'

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना मंगलवार 22 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. सभी ताके एक से बढ़ कर एक है...ये नई विधा है.?इसके क्या नियम हैं ?

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (21-04-2014) को "गल्तियों से आपके पाठक रूठ जायेंगे" (चर्चा मंच-1589) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. क्या बात है, दी ! बहुत सुंदर :)

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  5. तेज आँधी थी
    बुझा पाई न दिया
    ऐसा लगा है
    दुआ सच्चे दिल की
    रब ने कुबूल की....बहुत सुंदर...

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  6. एक से बढ़ कर एक ....... :)
    ये सर्वश्रेष्ठ
    क्या करे कोई
    एक ओर हो खाई
    दूजी में कुआँ
    बढ़ाना पग-नाप
    पार हो जाना भाई|

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