शनिवार, 23 जून 2012

यही काल-चक्र है...



समेट लेती
टिक टिक ये घड़ी
कई लम्हों को
कुछ खुशी के पल
कुछ दर्दे-दास्ताँ
यही काल-चक्र है|

संजो के रखा
किस्से रामायण के
पति की प्यारी
पतिव्रता नारी ही
अग्नि-परीक्षा देती
यही काल-चक्र है|

महाभारत
लगा दिया दाँव पे
नारी-वस्तु को
पाँच पतियों वाली
नहीं थी सुरक्षित
यही काल-चक्र है|

अजातशत्रु
निन्यान्वे भाइयों को
मौत दे दिया
बौद्ध-धर्म के पीछे
अहिंसा अपनाया
यही काल-चक्र है|

 गाँधी हैं गौण
अहिंसा के देश में
हिंसा है हावी
आतंक के शिकार
बिलख रहे घर
यही काल-चक्र है|

धन-अर्जन
धर्म-गुरु ने किया
सिखाया धर्म
खुद किए अधर्म
कहीं नहीं विश्वास
यही काल-चक्र है|

कहते रहे
बेटियाँ होतीं लक्ष्मी
दुर्गा सावित्री
पूजते हैं उनको
पर आने न देते
यही काल-चक्र है|

ऋता शेखर मधु

13 टिप्‍पणियां:

  1. सच है ऋता ये कालचक्र कब किस पर भारी पड़ जाय पता नहीं....बहुत सटीक रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर ऋता जी.......
    गहन भाव समेटे है आपकी रचना........
    बहुत बढ़िया.
    सस्नेह.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर व सटीक प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  5. कैसा है ये काल चक्र
    जिसकी धुरी पर ऐसे हादसे होते हैं ... किस सीख के लिए ?

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है...फिर सीख का स्कोप कहाँ है..पता नहीं !

      हटाएं
  6. सुन्दर संवेदनशील अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर व सटीक प्रस्तुति।
    नई पोस्ट .....मैं लिखता हूँ पर आपका स्वगत है

    उत्तर देंहटाएं
  8. स्त्रीविमर्श पर सार्थक रचनाएं..

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर गहन भाव समेटे रचना......
    :-)

    उत्तर देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है...कृपया इससे वंचित न करें...आभार !!!