रविवार, 23 मार्च 2014

वतन का राग गाएँ हम


ख्वाबों में कभी जिसने सेहरा भी पहनाया होगा,
स्वप्न बहु से स्वप्न  में पाँव भी छुलवाया होगा|
नम दृगों से नमन करें उन शहीदों की जननी को,
सुत-मिलन पर जिसने श्रद्धा सुमन चढ़ाया होगा||


देख गुलामी की जंजीरें मन उनका आहत हो गया ,
निज माटी पर मर मिटना केवल उनका मत हो गया |
फिर सुभाष ने बना लिया आजाद हिन्द की फौज को,
मुक्त कराने वह भारत ,कुर्बानी को रत हो गया ||

वतन का राग गाएँ हम,
सितारे भी सजाएँ हम|
शहीदों की मज़ारों पर,
च़राग़ें भी जलाएँ हम||

भ्रमर ने गीत जब गाया,
पपीहा हूक तब लाया|
शिखी के भी कदम थिरके,
सखी री, फाग अब छाया ||

रीती अँखियाँ चुनरी कोरी,
बिन कान्हा के भाय न होरी|
ब्रज की गलियों में ढूँढ रही,
श्याम को वृषभान की छोरी||
.............ऋता

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (24-03-2014) को लेख़न की अलग अलग विधाएँ (चर्चामंच-1561) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शहीदों को नमन के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. नमन है अमर वीरों को ... जोश से लबरेज मुक्तक, छंद ...

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