शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

व्यवस्था का नकाब-लघुकथा

. व्यवस्था का नकाब

व्यवस्था सभी काम सुव्यवस्थित तरीके से करना चाहती थी पर हो नहीं पाता था| इसी परेशानी में वह दफ़्तर की कुर्सी पर बैठी थी कि उसे सुखद आश्चर्य हुआ जब उसने सामने अपनी पुरानी सहेली नकाब को देखा|

‘’क्या बात है भई, बड़ी परेशान दिख रही हो,’’ नकाब ने हँसते हुए पूछा|

‘’ देखो न सखी, मैं चाहती हूँ कि सब कर्मचारी सही समय पर आएँ और पूरी लगन, इमानदारी और निष्ठा से काम करें| लेकिन यह मुमकिन नहीं हो पाता| कोई देर से आता है और कोई समय से आकर भी गप्पें हाँकता रहता है|  मैं अपने से ऊपर वाले पदाधिकारी को क्या जवाब दूँगी,’’ माथे पर हाथ रखकर व्यवस्था कह रही थी|

‘’ क्या यहाँ कोई मेहनती और सत्यवादी नहीं|’’

‘’ हाँ, एक बेचारा भला आदमी है जो कर्तव्यनिष्ठ है|’’

‘’ फिर तो बात बन गई| जब कोई पदाधिकारी आए तो उसे सामने कर दे और वह सत्यनिष्ठ नकाब का काम करेगा और तेरी सारी अव्यवस्था को अपने भीतर छुपा लेगा,’’ मुस्कुराते हुए नकाब ने कहा|

व्यवस्था न चाहते हुए भी मान गई क्योंकि व्यवस्था ही कुछ ऐसी थी|


-ऋता शेखर ‘मधु’ 

2 टिप्‍पणियां:

  1. व्यवस्था न चाहते हुए भी मान गई क्योंकि व्यवस्था ही कुछ ऐसी थी| ..
    ..सच है न चाहते हुए भी व्यवस्था का अंग बन ही जाता है आज कोई भी आदमी ...वृदावन में रहना है तो राधे-राधे कहना ही पड़ता है ...

    बहुत सुन्दर

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-08-2016) को "धरा ने अपना रूप सँवारा" (चर्चा अंक-2427) पर भी होगी।
    --
    हरियाली तीज और नाग पञ्चमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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